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हरियाणा में खट्टर जाटों,दलितों और मुसलमानों का गुस्सा भांपने में नाकाम रहे

Bhola Tiwari Oct 25, 2019, 1:42 PM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले चुनाव में मनोहर लाल खट्टर को ये सोचकर मुख्यमंत्री बनाया था कि वे संघ की पृष्ठभूमि से हैं और सभी को साथ लेकर चलेंगे, मगर हुआ इसका ठीक उल्टा।हरियाणा की मनोहरलाल खट्टर सरकार धीरे धीरे जाटों और दलितों से दूर होती गई।जाटों और दलितों के आंदोलन को भी ठीक से हैंडल नहीं किया गया, हरियाणा के बीजेपी नेताओं को लगा कि मोदी के रहते उन्हें किस चीझ की फिक्र?"मोदी है तो मुमकिन है" के नारों के सहारे वैतरणी पार करना चाहते थे मगर नईया मझधार में हीं डूब गई।पहली बार ये देखने को मिला कि लगभग 75% उस क्षेत्र में भाजपा के उम्मीदवार हारे हैं जहाँ मोदी ने रैली की थी।हरियाणा के नेता अपने इज्ज़त में तो पतीला लगाया हीं,लगभग अपराजेय से हो चुके नरेंद्र मोदी के दामन में दाग लगा दिया।नरेंद्र मोदी ने जाट नेता सुभाष बराला को ये समझ कर प्रदेशाध्यक्ष बनाया था कि वे जाटों को साध लेंगे मगर वे पूरी तरह नाकामयाब हीं साबित हुऐ, प्रदेशाध्यक्ष अपनी विधानसभा सीट टोहना हारकर राष्ट्रीय नेतृत्व के मुँह पर कालिख पोत दिया है।अमित शाह की कडी फटकार के बाद सुभाष बराला ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।

हरियाणा और महाराष्ट्र में लोकल मुद्दे इतने हावी थे कि छद्म राष्ट्रवाद का मुद्दा परवान न चढ़ सका।आखिर कब तक काठ की हांडी चुल्हे पर चढ़ती।तीन तलाक जैसे मुद्दे को मुस्लिम एरिया में थोडी भी तहरीज नहीं मिली।मुसलमानों ने पिछले चुनाव में भी भाजपा को वोट नहीं दिया था, इस बार तो देने का सवाल हीं नहीं था क्योंकि मंत्रीमंडल के वरिष्ठ और बडबोले मंत्री अनिल विज ने मुसलमानों को कह दिया था कि पार्टी को उनके वोटों की जरूरत नहीं है।मुसलमानों के वोट उस समय महत्वपूर्ण और कारगर साबित हो गए जब जाट-दलित-मुसलमान गठबंधन बनाकर एक हो गए और भाजपा के खिलाफ हल्ला बोल दिया।एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी "सबका साथ-सबका विकास" का नारा बुलंद कर रहे थे तो दूसरी तरफ अनिल विज जैसे नेता उनके स्लोगन में बारूद भर रहे थे।

जाटों की नाराजगी आरक्षण को लेकर थी,हरियाणा में जाटों की आबादी कुल आबादी का 25% है,जबकि सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व 28.28% है।हर तरह से संपन्न जाटों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण चाहिए, जिसके लिए वो आंदोलनरत हैं।यद्यपि खट्टर सरकार ने आरक्षण के लिए प्रस्ताव पारित कर दिया है मगर सुप्रीमकोर्ट ने आरक्षण देने से मना कर दिया।मनोहरलाल खट्टर जाटों को ये समझाने में विफल रहे कि सरकार उनके साथ खडी है।हरियाणा में 21% दलित समाज के लोग रहते हैं,सरकार उनकी सुरक्षा करने में फेल रही।विभिन्न मामलों में सैकड़ों दलितों की हत्या कर दी गई या उन्हें प्रताडित किया गया।दलितों के धरना प्रदर्शन को बलपूर्वक दबा दिया गया।इसी रोष का परिणाम था कि जाटों के आग्रह पर वे गठबंधन में खुशी खुशी शामिल हो गए, जो भाजपा के पराभव में महत्वपूर्ण कारण बना।

"अबकी बार 75 पार" जैसे नारे लगाकर अगर चुनाव जीता जाता तो फिर समस्या हीं क्या थी।मगर निर्णायक लडाई मैदान में लडी जाती है और वहां लोकल मुद्दे, प्रत्याशियों के कामकाज के ऐवज में वोट मिलता है।हरियाणा की जनता ने पाकिस्तान,अनुच्छेद 370 और तीन तलाक जैसे मुद्दों को बिल्कुल नकार दिया है।भाजपा के लिए सबसे दुखदायी पहलू तो ये है कि करिश्माई नेता नरेंद्र मोदी के कुछ सेलेक्टिव चुनाव क्षेत्र में प्रचार के बावजूद वहां उम्मीदवार हार रहें हैं, जो पहले बहुत कम होता था।सुभाष बराला और कैप्टन अभिमन्यु सिंह इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

दुष्यंत चौटाला का उदय भाजपा के लिए खतरे की घंटी है।जिस प्रकार जाटों ने उन्हें एकतरफा प्यार दिया है, ऊपर से दलितों और मुसलमानों का साथ उन्हें बेहद मजबूत बना दिया है।आज सत्ता की चाभी दुष्यंत चौटाला के पास है और उनकी निजी महत्वाकांक्षा मुख्यमंत्री बनने की है।वे भाजपा और कांग्रेस दोनों से बारगेनिंग करेंगे, जो उन्हें इस समर्थन देगा,वही सत्तारूढ़ होगा।

राजनीति में करिश्मा हमेशा नहीं होता, हमेशा कोई व्यक्ति शीर्ष पर नहीं रह सकता।उत्थान और पतन राजनीति की महत्वपूर्ण शर्तें हैं और यही उनके शीर्ष नेतृत्व के साथ हो रहा है।प्रदेश के नेताओं को अपनी जिम्मेदारी भी समझनी होगी, नहीं तो इस तरह के परिणाम आम होंगे।

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