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हांगकांग की विधायिका ने आधिकारिक तौर पर "प्रत्यर्पण विधेयक" वापस लिया

Bhola Tiwari Oct 24, 2019, 7:05 PM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

बड़े और कड़े प्रर्दशनों से घबडाए हांगकांग की विधायिका ने आधिकारिक तौर पर "प्रत्यर्पण विधेयक" को वापस ले लिया है।हांगकांग की चीफ एजक्यूटीव कैरी लैम के प्रवक्ता ने ये जानकारी प्रर्दशनकारियों और प्रेस को दी।आपको बता दें कि करीब पांच महीने से हांगकांग की युवा और छात्रों की आबादी ने चीन के खिलाफ आंदोलन छेड़ रखा था,जिसमें लाखों लोग कई बार सड़कों पर उतरे थे।चीन ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए तमाम कोशिशें की मगर वह सफल नहीं हो सका।दस से पंद्रह लाख लोगों इस आंदोलन में अपनी भागीदारी सुनिश्चित किया था।ये तो तय मानिए अगर यह आंदोलन हजारों का होता तो साम्यवादी चीन जरूर इस आंदोलन को सैनिकों के बूटों तले कुचल दिया होता।ये जनआंदोलन था और बहुत बड़ा जनआंदोलन,जिसकी इतिहास में मिसाल मिलनी बेहद मुश्किल है।

अब ये जानना जरूरी है कि हांगकांग में ये आंदोलन कैसे शुरू हुआ?गौरतलब है कि हांगकांग के चान टोंग-काई(20) पर ये आरोप है कि उसने अपनी गर्भवती प्रेमिका की हत्या पिछले साल ताइवान में कर दी और वहाँ से भागकर हांगकांग आ गया।हांगकांग और ताइवान के बीच "प्रत्यर्पण संधि" नहीं है,जिस वजह से ताइवान के अनुरोध पर भी चान टोंग-काई को प्रत्यर्पित नहीं किया जा सका।इस घटना के बाद चीन समर्थित हांगकांग प्रशासन ने नया संशोधित कानून लागू करने की घोषणा कर दी।अभी तक के कानून में हांगकांग का कई देशों के साथ प्रत्यर्पण का समझौता नहीं है।इसके चलते अगर कोई व्यक्ति अपराध कर हांगकांग वापस आ जाता है तो उसे मामले की सुनवाई के लिए ऐसे देश में प्रत्यर्पित नहीं किया जा सकता जिसके साथ इसकी संधि नहीं है।चीन को भी अब तक प्रत्यर्पण संधि से बाहर रखा गया था लेकिन नया प्रस्तावित संसोधन इस कानून में विस्तार करेगा और ताइवान, मकाऊ और मेनलैंड चीन के साथ भी संदिग्धों को प्रत्यर्पित करने की अनुमति देगी।


हांगकांग की चीफ एजक्यूटीव कैरी लैम ने नये प्रत्यर्पण कानून को लागू करने के संबंध में ये कहा था कि ये बदलाव जरूरी है ताकि न्याय और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों को पूरा किया जा सके।अगर बदलाव नहीं होगा तो हांगकांग भगोड़ों का स्वर्ग बन जाएगा।

तकनीकी रूप से देखा जाए तो ये प्रत्यर्पण कानून सही है मगर हांगकांग निवासियों का मानना है कि इस कानून के पीछे चीन की मंशा गलत है।उनका कहना है कि प्रत्यर्पण बिल में किये गए संशोधन हांगकांग की स्वायत्तता को प्रभावित करेंगे।वे ये भी कहते हैं कि नया संशोधन हांगकांग के लोगों को भी चीन की दलदली न्यायिक व्यवस्था में ढ़केल देगा,जहां राजनीतिक विरोधियों पर आर्थिक अपराधों और गैर परिभाषित राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरों जैसे मामलों में आरोप लगाए जाते रहे हैं।उनका ये भी आरोप है कि एक बार आरोप लगा तो चीन के कड़े कानून के अनुसार बचना मुश्किल है।हांगकांग के बुद्धिजीवियों का कहना है कि कानून सही है मगर चीन की मंशा संदिग्ध है।

आपको मालूम हीं होगा हांगकांग ब्रिटेन का एक उपनिवेश था जिसे साल 1997 में चीन को स्वायत्तता की शर्त के साथ सौंपा गया था।"एक देश-दो व्यवस्था" की अवधारणा के साथ हांगकांग को अगले 50 साल के लिए अपनी स्वत्रंत्रता, सामाजिक, कानूनी और राजनीतिक व्यवस्था बनाए रखने की गारंटी दी गई थी।

चीन के कम्युनिस्ट शासन को चुनौती देने वाले हांगकांग के लोग मानते हैं कि साल 2012 में चीन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सत्ता में आने के बाद से हीं उनपर दवाब बढा है।साल 2015 में चीन समर्थित हांगकांग प्रशासन ने हांगकांग में किताब बेच रहे कई विक्रेताओं को इसलिए गिरफ्तार कर लिया कि वे लोकतंत्र को समर्थन करने वाले किताबों को बेंच रहे थे।वहीं साल 2014 में लोकतंत्र को समर्थन देने वाले "अंब्रेला मूवमेंट" से जुड़े नौ नेताओं को उपद्रव और अन्य मामलों का दोषी पाया गया।वहीं मई 2019 में जर्मनी में हांगकांग से भागे दो कार्यकर्ताओं को शरण देने से जुडी पुष्टि की थी।यह हाल के सालों का ऐसा पहला मामला था कि जब किसी पश्चिमी देश की सरकार ने हांगकांग से भागे राजनीतिक रिफ्यूजियों को शरण देने की बात कही हो।

इस पाँच महीने में हांगकांग ने बहुत बडे बडे प्रर्दशनों को देखा है।इससे पहले 2003 में भी दंगा संबंधी कानून के विरोध में हांगकांग में बडा प्रर्दशन हो चुका है।दंगा संबंधी कानून के तहत प्रावधान था कि चीन के खिलाफ किसी भी किस्म का दंगा भडकाने, साजिश करने या द्रोह करने पर दोषी को उम्रकैद तक हो सकती थी।इस कानून के विरोध में करीब पाँच लाख लोग सडकों पर उतरे थे और इसका असर ये हुआ था कि इस कानून को रद्द करना पडा था।इसके बाद 2014 के "अंब्रेला आंदोलन" में कुछ हजार लोग सड़कों पर उतरे थे लेकिन आखिरकार ये आंदोलन नाकाम हो गया था क्योंकि इसे नागरिकों के एक बडे वर्ग का समर्थन नहीं मिला था।

हांगकांग प्रशासन के ऐलान के बाद भी प्रर्दशन जारी है और लोग हांगकांग की चीफ एजक्यूटीव कैरी लैम की इस्तीफे की मांग कर रहें हैं।चार और मांगे हैं जिसके पूरे हुऐ बिना ये आंदोलन समाप्त होने वाला नहीं है।चीन अभी आंदोलन और अंतरराष्ट्रीय दवाब के आगे झुक गया है मगर वो मौके की तलाश में हमेशा रहेगा।आपको बता दें चीन ने हांगकांग में लोगों को बरगलाकर बहुत से नागरिकों को अपने पक्ष में कर भी लिया है।चीन, हांगकांग पर वर्चस्व कायम करने के लिये कितना बैचेन है इसकी एक बानगी 09 अगस्त,2019 को तब देखने को मिली जब ब्रिटेन के विदेशमंत्री डोमिनिक राब ने हांगकांग की हालातों पर हांगकांग की प्रशासक कैरी लैम से बातचीत की थी।

ब्रिटिश विदेशमंत्री के कैरी लैम बातचीत करने पर चीन भडक गया था।चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हुआ छुनयिंग ने एक बयान जारी कर कहा था कि ब्रिटेन हमारे मामलों में दखल न दे।चीन अपने घरेलू मामले में किसी भी विदेशी कार्रवाई को बंद करने की मांग करता है।

चीन भविष्य में हांगकांग पर वर्चस्व कायम करने के लिए क्या करेगा, ये तो भविष्य के गर्भ में छूपा है मगर तत्काल वहाँ शांति स्थापित हो जाएगी, सभी इसकी उम्मीद करते हैं।

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