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डिजिटल अर्थव्यवस्था का स्याह पक्ष

Bhola Tiwari Oct 20, 2019, 8:35 AM IST कॉलमलिस्ट
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भरत झुनझुनवाला

देश की आर्थिक विकास दर ढीली पड़ी हुई है। इस दुर्गति को बनाने में सरकार के डिजिटल इकोनोमी को बढ़ाने के प्रयासों ने योगदान किया है, जिनमें नोटबंदी प्रमुख है। नोटबंदी का सबसे बड़ा उद्देश्य काले धन पर अंकुश लगाना था। आतंकवाद, बंगलादेशियों का गैर-कानूनी प्रवेश तथा टैक्स की चोरी में लेन-देन अधिकतर नगद में होते हैं। पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर नकली भारतीय नोटों को छापा जा रहा था। इन नकली नोटों से कश्मीर में आतंकवाद को पोषित किया जा रहा था। नोटबंदी से इस नकद लेन-देन पर रोक लगी है। लेकिन खबर है कि 50 रुपये के जाली नये नोट जम्मू में आज उपलब्ध हो गए हैं जबकि अभी रिजर्व बैंक द्वारा देश के बैंकों में ये कम ही डाले गए हैं। दूसरी तरफ यह भी सही है कि बंगलादेश से जाली नोटों के प्रवेश में इस वर्ष भारी कमी आई है। जानकार बताते हैं कि नोटबंदी के पहले बंगलादेश में भारत के जाली नोट आसानी से उपलब्ध थे। लगभग 2 लाख के जाली नोटों को लेकर आगन्तुक भारत में प्रवेश करते थे। यहां 40 प्रतिशत डिस्काउन्ट पर वे 1,20,000 के भारत के सच्चे नोटों में इन्हें बदल लेते थे। एक लाख की घूस देकर वे भारत का आधार कार्ड बनवा लेते थे और यहां स्थाई निवास का अधिकार प्राप्त कर लेते थे। नोटबंदी के बाद यह सिलसिला बहुत कम हो गया है। अनुमान है कि समय क्रम में इस रास्ते जाली नोटों का प्रवेश पुनः शुरू हो जाएगा जैसा कि जम्मू में 50 रुपये के फर्जी नोटों की उपलब्धता से संकेत मिलते हैं। अतः नोटबंदी से आतंकवाद एवं गैर-कानूनी प्रवेश पर रोक लगी है, जिसके लिए सरकार को बधाई दी जानी चाहिए। परन्तु यह प्रभाव अल्पकालीन सिद्ध हो सकता है। नये आकार के जाली नोट पुनः प्रचलन में आ ही जाएंगे।

नोटबंदी का दूसरा सुप्रभाव है कि टैक्स वसूली में वृद्धि हुई है। तमाम लोगों ने अपनी नं. 2 की कमाई को पुराने नोटों में नगद रखा था। नोटबंदी के कारण इन्हें इस रकम को बैंक में जमा करना पड़ा था। इस कार्यवाही में इनके तमाम पैंतरे अपनाए गए। जैसे कुछ उद्यमियों ने अपने कर्मियों के खातों में ढाई-ढाई लाख रुपए जमा करा दिए। इस रकम पर इन्हें इनकम टैक्स अदा करना पड़ सकता है। इनकम टैक्स विभाग द्वारा ऐसे तमाम लोगों को नोटिस जारी किए गए हैं। इससे अर्थव्यवस्था में स्वच्छता आई है। लेकिन इस कदम का अंतिम प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि नं. 2 का धंधा पुन चालू होता है या नहीं। नोटबंदी के मात्र 4 माह बाद मेरे एक जानकार ने गाजियाबाद में एक मकान का नवीनीकरण कराया। उन्हें नं. 2 में प्लाइवुड, पेन्ट, एल्युमीिनयम आदि सब उपलब्ध हो गया। यही कहानी दूसरे लोगों ने भी बताई है। जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था में नए नोट आए हैं उसी क्रम में नं. 2 का धंधा पुनः चालू हो गया है।

वर्तमान में तमाम वस्तुओं पर 18 प्रतिशत की दर से जीएसटी लागू है। पूर्व में एक्साइज तथा सेल टैक्स का भार लगभग इतना ही था। यह बड़ी रकम है। पूर्व में उद्यमी तथा व्यापारी इस रकम की बचत करने के लिए नं. 2 में यानी नगद में धंधा करते थे। नगद में एक समानान्तर अर्थव्यवस्था चलती थी। वह व्यवस्था पुनर्स्थापित हो गई है, ऐसे संकेत मिल रहे हैं। पूर्व में एक्साइज तथा सेल टैक्स की चोरी होती थी चूंकि टैक्स प्रशासन भ्रष्ट था। वही अधिकारी आज जीएसटी को लागू कर रहे हैं। अतः वे जीएसटी की चोरी को भी नहीं रोक पाएंगे। अनुमान है कि नं. 2 की समानान्तर व्यवस्था लगभग स्थापित हो चुकी है अथवा हो रही है। यहां भी नोटबंदी का सुप्रभाव अल्पकालिक रहा है।

डिजिटल लेन-देन से अर्थव्यवस्था की गति तीव्र होती है। पूर्व में एक लाख रुपया नगद एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाने में समय एवं खर्च ज्यादा लगता था एवं खतरा रहता था। बैंक के माध्यम से रकम भेजने के लिए पहले अपने बैंक में रकम जमा कराकर बैंक ड्राफ्ट बनाना पड़ता था। फिर बैंक ड्राफ्ट को डाक से दूसरी पार्टी को भेजना होता था। फिर दूसरी पार्टी अपने बैंक में जमा कराती थी। फिर 2 दिन बाद क्लीयरिंग से पैसा मेजबान पार्टी के खाते में आता था। पूरी प्रक्रिया में 5-6 दिन न्यूनतम लगते थे। डिजिटल माध्यम से आज रकम दूसरी पार्टी के खाते में 4 घंटे में पहुंच जाती है। यह नोटबंदी का दीर्घकालिक सुप्रभाव है।

लेकिन छोटे लेनदेन की परिस्थिति बिल्कुल भिन्न है। मान लीजिए आपको 100 रुपए सब्जी विक्रेता को देना है। इस रकम को नगद देने में 15 सेकेन्ड का समय लगेगा। खतरा भी विशेष नहीं है। इसी रकम का डिजिटल पेमेंट करने के लिए आपको पहले अपने बैंक खाते से डिजिटल खाते में कुछ रकम डालनी होगी। मान लीजिए आपने 500 रुपए डाल दिए। आपको मोबाइल फोन लेना होगा। अब आपको सब्जी वाले से उसका फोन नं. पूछना होगा। फिर अपने फोन से 100 रुपए सब्जी वाले के फोन पर डालना होगा। तब सब्जी वाला अपने फोन पर देखकर पुष्टि करेगा कि उसके खाते में पैसा आ गया है या नहीं। इस प्रक्रिया के लिए आपको कुछ पैसा फोन में जमा कराना होगा जिस पर आपको ब्याज का घाटा लगेगा। आपको मोबाइल फोन खरीदना होगा। लेन-देन में आपका समय जाया होगा। इसलिए छोटे लेन-देन के लिए डिजिटल पेमेंट महंगे एवं नगद पेमेंट उपयुक्त होते हैं। अतः बड़े लेन-देन को डिजिटल माध्यम से करना सफल है जबकि छोटे लेन-देन असफल हैं। बड़े लेन-देन नोटबंदी के पहले ही डिजिटल माध्यम से किए जाने लगे थे। छोटे लेन-देन नोटबंदी के बाद कुछ समय तक डिजिटल माध्यम से किए गए। अब ये पुनः नगद में होने लगे हैं। इसलिए देश में डिजिटल लेन-देन का बढ़ावा देने में नोटबंदी का न्यून सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।

नोटबंदी का एक और प्रभाव छोटे उद्योगों पर हुआ है। जैसे मूंगफली बेचने वाले की स्थिति पर विचार करें। एक माह तक नगद की तंगी से उसके ग्राहक पैकेट बंद नमकीन का सेवन करने लगे जो कि डिजिटल पेमेंट से खरीदे जा सकते थे। मंूगफली बेचने वाले के पास डिजिटल खाता नहीं था कि वह डिजिटल पेमेंट ले सके। कुछ समय बाद नगद उपलब्ध हो गया। परन्तु सभी ग्राहक वापस मूंगफली पर नहीं आए। कई ने स्थाई रूप से डिजिटल पेमेंट को अपना लिया। इस प्रकार डिजिटल पेमेंट छोटे उद्योगों के लिए स्थाई रूप से हानिप्रद हो गया है।

नोटबंदी का समग्र आकलन इस प्रकार है। आंतकवाद एवं नं. 2 के धंधे पर अल्प समय के लिए अंकुश हुआ है। बड़ी रकम का लेन-देन डिजिटल माध्यम से बढ़ा है। यह नोटबंदी का दीर्घकालिक सकारात्मक प्रभाव है। छोटे उद्यमियों पर डिजिटल प्रयास का दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। डिजिटल पेमेंट का दीर्घकालिक सकारात्मक प्रभाव न्यून तथा छोटे उद्योगों पर दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव अधिक पड़ा है, इसलिए अर्थव्यवस्था की गति कमजोर बनी हुई है और कमजोर बनी रहने की संभावना है।

(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं।)

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