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अयोध्या--एक रुका हुआ फैसला !!

Bhola Tiwari Oct 18, 2019, 10:19 AM IST टॉप न्यूज़
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 नीरज कृष्ण

माननीय सर्वोच्च न्यायालय की पीठ रामजन्मभूमि/बाबरी मस्जिद प्रकरण में मिल्कियत सम्बन्धी मुकदमें में अगले कुछ ही दिनों में निर्णायक एवं अहम फैसला सुनाने जा रही है। एक लंबे समय तक श्रीराम जन्मभूमि/बाबरी मस्जिद ने प्रकृति के खेलों और तूफ़ानों को बरदाश्त किया, लेकिन मनुष्यों की हिमाकतों और राजनीतिक वहशतों को सहना उससे भी अधिक कठिन था। फिलहाल- ‘ताजमहल मंदिर है’ तथा ’कुतुब मीनार हिन्दू स्थापत्य की विरासत है’ माननेवाले इतिहासकारों का एक छोटा-सा समूह देश में मौजूद है। 

लगभग चार सौ साल पुरानी घटना के साथ आप सीधी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कर सकते। उन दिनों के योद्धाओं से प्रेरणा ले सकते हैं लेकिन उनकी वीरता की वाहवाही हम नही ले सकते। उन दिनों की ग़लतियों को हम सुधार नहीं सकते, सिर्फ़ आगे के लिए सतर्क हो सकते हैं।’ इसी तरह उस युग के अपमानों का हम बदला नहीं ले सकते। 

‘तीन-चार सौ साल बाद किसी की कोई संतान भी नहीं रह जाती, सिर्फ़ वंशधर रह जाते हैं। किसी भी भाषा में ‘परदादा’ और ‘प्रपौत्र’ के आगे का संबंध जोड़ने वाला शब्द नहीं है। नाती, पोते, प्रपौत्र के आगे की स्मृति नष्ट हो जाती है। इसीलिए कबीलाई संस्कृति में भी बदला लेने का अधिकार नाती–पोते तक रहता है। 

युग बदलने से कर्म, विचार और भावनाओं का संदर्भ भी बदल जाता है। हमारे वर्तमान युग में मस्जिद के स्थान पर मंदिर बनाने का लक्ष्य हो नहीं सकता क्योंकि हमारे युग का संदर्भ भिन्न है।’ इतिहास और बदले के इस सिद्धांत को पाठ्य–पुस्तकों में नहीं लिखा गया है नतीजतन पढ़े–लिखे लोग भी भ्रमित हो जाते हैं। 

बाबरी मस्जिद का निर्माण यदि 1528 ईसवी में हुआ था तब वह भारत में मुगलों के आने के बाद की पहली इमारतों में रही होगी। बाबरनामा में स्पष्ट लिखा हुआ है कि बाबर ने निर्देश जरी किया था कि किसी भी धार्मिक ईमारत को ध्वस्त कर कोई ईमारत नहीं बनाई जाये। इसके पहले तुर्क–अफ़गान काल के स्थापत्य के नमूने उपलब्ध हैं और फिर बाद के मुगल काल के भी। इस खास तरह की वास्तुकला के विकास को समझने में यह मस्जिद एक महत्वपूर्ण कड़ी हो सकती थी, जो ढाह दिया गया।

यहाँ कुस्तुन्तुनिया की ’आया सूफ़िया’ मस्जिद का उल्लेख प्रासंगिक है। 7 अगस्त, 1935 को जवाहरलाल नेहरू ने एक लेख में इस विशिष्ट मस्जिद का इतिहास लिखा है। इस इमारत ने नौ सौ वर्ष तक ग्रीक धार्मिक गाने सुने। फिर चार सौ अस्सी वर्ष तक अरबी अजान की आवाज उसके कानों में आई और नमाज पढ़ने वालों की कतारें उसके पत्थरों पर खड़ी हुईं। 1935 में गाजी मुस्तफ़ा कमालपाशा ने अपने हुक्म से यह मस्जिद बाइजेन्टाइन कलाओं का संग्रहालय बना दी। बाइज्न्टाइन जमाना तुर्कों के आने के पहले का ईसाई जमाना था और यह समझा जाता था कि बाइजेन्टाइन कला खत्म हो गई है।

नेहरू जी ने इस लेख के अंत में लिखा है– ’फाटक पर संग्रहालय की तख़्ती लटकती है और दरबान बैठा है। उसको आप अपना छाता–छड़ी दीजिए, उनका टिकट लीजिए और अंदर जाकर इस प्रसिद्ध पुरानी कला के नमूने देखिए और देखते–देखते इस संसार के विचित्र इतिहास पर विचार कीजिए, अपने दिमाग को हजारों वर्ष आगे–पीछे दौड़ाइए। क्य–क्या तस्वीरें, क्या–क्या तमाशे, क्या–क्या जुल्म, क्या–क्या अत्याचार आपके सामने आते हैं। उन दीवारों से कहिए कि आपको कहानी सुनावें, अपने तजुरबे आपको दे दें। शायद कल और परसों जो गुजर गए, उन पर गौर करने से हम आज को समझें, शायद भविष्य के परदे को भी हटाकर हम झाँक सकें।’ लेकिन वे पत्थर और दीवारें खामोश हैं। जिन्होंने इतवार की ईसाई पूजा बहुत देखी और बहुत देखीं जुमे की नमाजें। अब हर दिन की नुमाइश है उनके साए में। दुनिया बदलती रही, लेकिन वे कायम हैं। उनके घिसे हुए चेहरे पर कुछ हल्की मुस्कराहट-सी मालूम होती है और धीमी आवाज-सी कानों में आती है– ’इंसान भी कितना बेवकूफ़ और जाहिल है कि वह हजारों वर्ष के तजुरबे से नहीं सीखता और बार–बार वही हिमाकतें करता है।’

हम भारतीय लोगों को कभी न तो तुलनात्मक इतिहास का अध्ययन ही करना सिखया गया न ही परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से तुलनात्मक अध्ययन। मैं बामपंथी/दक्षिणपंथी जैसे शब्दों का तो प्रयोग नहीं करूँगा इतिहासकारों के लिए, क्यूंकि मेरी स्पष्ट धारणा है कि इतिहास न तो बामपंथ होती है न ही दक्षिणपंथी। इतिहासकारों का दायित्व होता है कि उन्होंने जिस विषय को जिस रूप में देखा, महसूस किया उसे स्पष्ट रूप से अंकित करें। पर ‘इतिहास’ के साथ विडम्बना है कि उसे विजेताओं ने अपने अनुरूप लिखवाया।  

ऐसे बहुत कम लोग होंगे जिन्हें याद भी होगा कि रामजन्मभूमि/ बाबरी मस्जिद प्रकरण कब और क्यूँ और कैसे आज से लगभग 32 वर्षों पूर्व फैजाबाद की अदालत में कांग्रेस के द्वारा पहुंचाई गयी थी। एक बहुत ही गंभीर मुक़दमे(Writ) के आये हुए फैसले से उठने वाली किरकिरी को दबाने के लिए केंद्र की तात्कालिक सरकार ने तत्क्षण ही एक बड़े मुद्दे को अदालत तक पहुंचा दिया, ताकि अदालत द्वारा दिए गए निर्णायक फैसले को प्रभावहीन (जनता के सोच की दिशा) किया जा सके, और इस कुकृत्य में कांग्रेस पार्टी पूर्णतया सफल रही। ...... चूँकि अभी यह मुकदमा माननीय सर्वोच्च न्यायलय की पीठ के समक्ष लंबित है, अतः इस मुक़दमे की सच्चाई/तथ्यों के बारे में कुछ भी लिखना न्यायलय की अवमानना तो है ही साथ ही साथ तर्क संगत भी नहीं है। 

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