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अयोध्या केस : मुस्लिम पक्ष की दलीलें पूरी, आज से हिंदू पक्ष की दलीलें

Bhola Tiwari Oct 15, 2019, 8:11 AM IST टॉप न्यूज़
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● अयोध्या मामले की सुनवाई अंतिम चरण में, फैसला सन्निकट

● एहतियातन अयोध्या में बढ़ाई गई सुरक्षा, 10 दिसंबर तक धारा 144 लागू

 

सिद्धार्थ सौरभ

नई दिल्ली : अयोध्या मामले में सुनवाई अपने अंतिम चरण में पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को केस की सुनवाई का 38वां दिन था। मुस्लिम पक्ष की तरफ से वकील राजीव धवन ने अपनी दलीलें रखी। आज मंगलवार से हिंदू पक्ष की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दलीलें रखी जाएंगी। आज मुस्लिम पक्षकारों के वकील राजीव धवन ने कोर्ट में कहा कि अदालत द्वारा सभी सवाल मुस्लिम पक्ष से ही किए गए हैं, जबकि हिंदू पक्ष से एक भी सवाल नहीं किया गया है। राजीव धवन ने कहा कि सुनवाई के दौरान उन्हें जवाब देने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला है, जो समय सीमा तय की गई है, वो काफी नहीं है। 

विदित हो कि अयोध्या केस में 17 अक्टूबर तक सुनवाई पूरी हो सकती है। वहीं नवंबर में अयोध्या केस में फैसला आने की उम्मीद जतायी जा रही है। दूसरी तरफ सुरक्षा की दृष्टि से अयोध्या में 10 दिसंबर तक के लिए धारा 144 लागू कर दी गई है। 


राजीव धवन ने अदालत में दलील देते हुए कहा कि इस बात के कोई सबूत नहीं दिए गए हैं, जिनसे पता चले कि केन्द्रीय गुंबद के नीचे ही राम का जन्म हुआ। वहीं श्रद्धालुओं के वहां फूल प्रसाद चढ़ाने का दावा भी सिद्ध नहीं किया गया है।

 मुस्लिम पक्ष की दलील

□ गुंबद के नीचे ट्रेसपासिंग कर लोग घुस आए थे। कभी भी मंदिर तोड़कर मस्जिद नहीं बनायी गई, वहां लगातार नमाज होती रही थी।

□  साल 1885 से 1889 के बीच हिंदू पक्ष द्वारा कभी जमीन पर दावा नहीं किया गया, जबकि साल 1854 से ही तत्कालीन ब्रिटिश सरकार द्वारा मस्जिद के रखरखाव का खर्च दिया जाता रहा था। 

□ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा भी कभी ये नहीं कहा गया कि मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनायी गई।

□ ‘वादी (हिंदू) विवादित भूमि का मालिक है, इस बात का भी कोई सबूत नहीं है। हिंदुओं को सिर्फ भूमि के उपयोगा का अधिकार था। उन्हें पूर्वी दरवाजे से प्रवेश करने और पूजा करने का अधिकार था, इससे ज्यादा कुछ नहीं।

वहीं राजीव धवन की दलील पर जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि साल 1858 के बाद के दस्तावेजों से पता चलता है कि राम चबूतरा की स्थापना की गई और उनके पास अधिकार था।राजीव धवन ने कोर्ट में कहा कि विश्वास, यात्रा, स्कंदपुराण उन्हें (हिंदुओं) को जमीन का मालिकाना हक नहीं दे सकते। मुसलमानों का कब्जा कभी संदेह में नहीं था। धवन ने कोर्ट में कहा कि मुस्लिम पक्ष की मांग है कि अयोध्या को फिर से 5 दिसंबर, 1992 जैसा बसाया जाए, जैसा कि बाबरी मस्जिद विध्वंस से पहले था।


दशहरे की छुट्टियों के बाद राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को एक बार फिर शुरू हुई। इस दौरान मुस्लिम पक्षकारों ने आरोप लगाया कि मामले में हिंदू पक्ष से नहीं नहीं बल्कि सिर्फ उन्हीं से ही लगातार सवाल किए जा रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष 38वें दिन की सुनवाई शुरू होने पर मुस्लिम पक्षकारों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने यह बात कही।इसी बीच विवादित स्थल पर अपना पक्ष रखते हुए उन्होंने कहा कि साल 1854 से ब्रिटिश सरकार मस्जिद के रखरखाव के लिए अनुदान दे रही थी मगर 1885 से 1989 तक हिंदू पक्षों ने कभी उसपर अपना दावा नहीं किया। उन्होंने कहा कि जहां मस्जिद है वहां मंदिर तोड़े जाने का कोई सबूत नहीं है। भारतीय सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) को भी जांच में कुछ नहीं मिला। इस बीच जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने राजीव धवन से पूछा कि वह बाहरी आंगन में हिंदू पक्ष के कब्जे के बारे में क्या कहेंगे। साल 1858 का दस्तावेजी सबूत राम चबूतरे की स्थापना को दर्शाता है। इसके जवाब में मुस्लिम पक्ष के वकील धवन ने कहा, ‘पूर्वी द्वार से मुस्लिम लगातार आते रहे हैं और एकमात्र अधिकार उनके पास प्रार्थना करने का था और कुछ नहीं।’ उल्लेखनीय है कि संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर शामिल हैं। धवन ने कहा, ‘माननीय न्यायाधीश ने दूसरे पक्ष से सवाल नहीं पूछे। सारे सवाल सिर्फ हमसे ही किए गए हैं। निश्चित ही हम उनका जवाब देंगे।’ धवन के इस कथन का राम लला का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता सी एस वैद्यनाथन ने जोरदार प्रतिवाद किया और कहा, ‘यह पूरी तरह से गैर जरुरी है।’ धवन ने यह टिप्पणी उस वक्त की जब संविधान पीठ ने कहा कि विवादित स्थल पर लोहे की ग्रिल लगाने का मकसद बाहरी बरामद से भीतरी बरामदे को अलग करना था।

 गौरतलब है कि संविधान पीठ अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित भूमि तीन पक्षकारों-सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला- के बीच बराबर बराबर बांटने का आदेश देने संबंधी इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सितंबर, 2010 के फैसले के खिलाफ दायर 14 अपीलों पर सुनवाई कर रही है।

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