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अब जब फैसला सन्निकट तो मध्यस्थता की बात बेमानी

Bhola Tiwari Oct 13, 2019, 10:25 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

भारत में मुसलमानों की सबसे बडी नीति निर्धारक संस्था "आँल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड" की लखनऊ में हुई बैठक में ये फैसला लिया गया कि अब मध्यस्थता की बात करना जब मामला सुप्रीमकोर्ट में फैसले की तरफ बढ़ रहा है,केवल सियासत के अलावा और कुछ नहीं है।पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा कि "बाबरी मस्जिद किसी भी मंदिर को तोड़कर नहीं बनाई गई,लिहाजा शरीयत कानून के हिसाब से यह जमीन न किसी और को हस्तांतरित की जा सकती है और न हीं किसी के हाथों बेची जा सकती है।शरीयत कानून हमें इसकी इजाजत नहीं देता।"

गौरतलब है कि "इंडियन मुस्लिम फाँर पीस" की एक बैठक में ये निर्णय लिया गया था कि अगर मुस्लिम पक्ष सुप्रीमकोर्ट से मुकदमा जीत भी जाता है तो उसे यह जमीन हिंदुओं को दे देनी चाहिए।इंडियन मुस्लिम फाँर पीस के सदस्यों का विचार ये था कि अयोध्या की विवादित जमीन भगवान राम का मंदिर बनाने के लिए दे दी जाए और मस्जिद बनाने के लिए मुस्लिमों को कोई दूसरी जगह दे दी जाए।

इस संस्था ने आँल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से ये भी गुजारिश की है कि अगर हम केस जीत भी जाते हैं तो भी हमें 2.77 एकड़ जमीन को हिंदुओं को भेंट कर देनी चाहिए,जिससे राममंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो सके।

आपको बता दें मुस्लिम बुद्धिजीवियों की संस्था "इंडियन मुस्लिम फाँर पीस" की इस बैठक में लेफ्टिनेंट जनरल जमीरउद्दीन शाह,मशहूर हृदय रोग विशेषज्ञ पद्मश्री डाँ मंसूर हसन,ब्रिग्रेडियर अहमद अली,पूर्व आईएएस अनीस अंसारी,पूर्व जज बीडी नकवी, डाँ कौसर उस्मान समेत सैकड़ों बुद्धिजीवियों ने भाग लिया था।

गौरतलब है कि आँल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड बहुसंख्यक सुन्नी मुसलमानों की सबसे बड़ी संस्था है और यही वह संस्था है जो मुसलमानों के हक की लडाई प्रमुखता से लड़ता है।आपको बता दूं देश के 90% सुन्नी मुसलमानों का पूर्ण विश्वास इस संस्था पर है।मुसलमानों पर लिये गये कोई भी निर्णय की समीक्षा इस संस्था की बैठक में किया जाता है।तीन तलाक पर सरकार द्वारा लाए कानून को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने गलत करार दिया है,यद्यपि अब ये कानून है मगर देश के बहुत कम मुसलमानों की इसमें सहमति है।

इंडियन मुस्लिम फाँर पीस ने एक महत्वपूर्ण बात कही है कि अगर सुप्रीमकोर्ट का फैसला मुसलमानों के पक्ष में भी आया तो वे वहाँ मस्जिद नहीं बना पाएंगे।मैं उनकी बातों से पूर्ण सहमत हूँ।मैंने इस विषय पर बहुत से लेख अखबारों में लिखे हैं,मेरा भी यही मानना है कि अगर फैसला मुस्लिम पक्षकारों के हक में आता है तो मुस्लिम समुदाय वहाँ मस्जिद नहीं बना सकेगी।इस लेख के पीछे मेरी किसी भी समुदाय से दुर्भावना नहीं है मगर ये भी सत्य है कि बहुसंख्यक आबादी सुप्रीमकोर्ट के आदेश के बावजूद वहाँ मस्जिद नहीं बनने देगा।कोर्ट केवल आदेश जारी कर सकता है, निर्णय का पालन सरकार को और आम जनता को करना पड़ता है।सरकार के सामने कानून व्यवस्था का प्रश्न होगा, करोड़ों लोगों की आस्था दाँव पर लगेगी।मैं नहीं समझता कोर्ट और सरकार के इस निर्णय को हिंदू समाज स्वीकार करेगा।अतीत में बहुत से मंदिर तोडें गए हैं,जिसकी कोई गिनती नहीं है।अतीत में बहुत कुछ गलत हुआ है मगर उसे देखने का अब समय नहीं है।करोड़ों हिंदुओं की आस्था की आस्था इस विवादित जमीन पर है।

बेहतर तो ये होता कि आँल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड खुद पहल कर ये जमीन हिंदू पक्षकारों को दे देता मगर अब मध्यस्थता की बात बेमानी है।अब देश के सभी नागरिकों को सुप्रीमकोर्ट का फैसला मानना चाहिए,जिससे विश्व में एक अच्छा संदेश जा सके।सुप्रीमकोर्ट में देश के सभी नागरिकों का विश्वास है और मुझे पूरी उम्मीद है सवोच्य न्यायालय एक न्यायोचित फैसला देगा।

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