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इतना नाराज क्यों हैं डोनाल्ड ट्रंप "तुर्की" के ऊपर

Bhola Tiwari Oct 08, 2019, 4:21 PM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि उत्तरी सीरिया से अमरीकी फौजों के हटने के बाद अगर तुर्की "अपनी हदें पार करता है" तो वो उसकी अर्थव्यवस्था को तबाह कर देंगे।अमेरिका के पास खुफिया एलर्ट है कि अगर अमेरिकी सैनिक हटे तो तुर्की को सीमा के पास मौजूद कुर्द लडाकों के खिलाफ हमला बोलने का मौका मिल जाएगा।कुर्द लडाके सीरिया में इस्लामिक स्टेट के खिलाफ लडाई में अमरीका के प्रमुख सहयोगी रहे हैं।


आपको बता दें सीरिया ने पिछले साल 19 जनवरी को उत्तरी सीरिया के अफरीन और मनबीज इलाके के गाँवों पर भयंकर गोलाबारी की थी,जिसमें पंद्रह कुर्द सैनिक जो आईएसआईएस से लड़ रहे थे मारे गए।सीरिया ने 70 गोले इस गाँवों में डाले थे।

तकरीबन डेढ़ साल बाद तुर्की के राष्ट्रपति आर्दोआन उत्तरी सीरिया के अपने सीमा क्षेत्र के पास आक्रमण करने की फिराक में हैं।ये बातें अमेरिका की गुप्तचर विभाग को मालूम हो गई है, इस वजह से डोनाल्ड ट्रंप सीरिया से बेहद नाराज हैं और वो कह रहें हैं कि अगर सीरिया ने फिर ऐसी जुर्रत की तो वो सीरिया की अर्थव्यवस्था को प्रतिबंध लगाकर बरबाद कर देंगे।

कौन है कुर्द और उनका संगठन वाईपीजी?तुर्की के पहाडी इलाकों और सीमाई क्षेत्रों के साथ इराक, सीरिया, ईरान और अर्मेनिया में कुर्द रहते हैं।इनकी संख्या करीब ढ़ाई से साढ़े तीन करोड़ के बीच है और ये मध्यपूर्व की सबसे बड़े जातीय समूह हैं।ये सुन्नी मुसलमान हैं और बेहद नीडर होते हैं।सीरिया युद्ध में आईएसआईएस के खिलाफ अमेरिका ने कुर्द लडाकों को प्रशिक्षित कर उतारा था, जिस वजह से हीं आईएसआईएस का पूर्ण सफाया हो सका था।इतनी बड़ी जनसंख्या के बावजूद वे बिना देश के हैं।कुर्द अपनी स्वायत्तता के लिए सीरिया से लड़ रहें हैं।सीरिया से कुर्दों की लडाई नई नहीं है।20 वीं सदी के शुरुआत में कुर्दों ने अलग देश बनाने की पहल शुरू की थी।पहले विश्व युद्ध में आँटोमन साम्राज्य की हार के बाद पश्चिमी सहयोगी देशों ने 1920 में संधि कर कुर्दों के लिए अलग देश बनाने की बात की थी।1923 में आधुनिक तुर्की के संस्थापक "अतातुर्क" मुस्तफा कमाल पाशा ने इस संधि को खारिज कर दिया था।तुर्की सेना ने उसी दौरान कुर्दों के आंदोलन या यूँ कहिए उनके उभार को बुरी तरह कुचल दिया था।दरअसल कुर्द जनमानस "कुर्दिस्तान" नाम के एक अलग देश की मांग कर रहा था,जहाँ वे अपनी पहचान को सुरक्षित रख सकें।लुसान संधि में कुर्दों के लिए एक अलग देश का प्रावधान था मगर तुर्की की आक्रमकता ने उनकी मांग को दबा दिया।

गौरतलब है कि साल 2013 में इस्लामिक स्टेट ने उत्तरी सीरिया के सीमाई इलाकों में तीन कुर्दिश ठिकानों को निशाने पर लिया।इस हमले में बहुत से कुर्द मारे गए तब उन्होंने "पीपुल्स प्रोटेक्शन यूनिट्स" का गठन किया और मजबूत आईएसआईएस के लडाकों से लोहा लिया।बाद में अमेरिका ने इनकी क्षमता को पहचाना और इन्हें युद्ध के लिए आधुनिक हथियार और प्रशिक्षण दिया।

आपको बता दें तुर्की कुर्दों को आतंकी मानते हैं और उन्हें ये हमेशा भय बना रहता है कि अगर वे संगठित होकर मजबूत हो गए तो वे अपने लिए एक अलग देश की मांग करेंगे।तुर्की सरकार सीमा पर 30,000 सदस्यों वाले वाईपीजी(कुर्दों का संगठन)को भंग करना चाहती है जबकि अमेरिका इसके खिलाफ है।नाटो में तुर्की की सबसे बड़ी सेना है मगर चलती दूनिया के चौधरी अमेरिका की हीं है और वह चाहता है कि वो जबतक सीरिया युद्ध से बाहर न आ जाए,तुर्की उनपर कोई कार्रवाई नहीं करे।आईएएस की पराजय के बाद उसके बहुत से समर्थक और लडाके उन क्षेत्रों में छिपने का प्रयास कर रहे हैं, जो सीरियाई कुर्दी या सीरिया की सरकारी सेना के नियंत्रण में है।इसीलिए अमेरिका कम से कम कुर्दों के नियंत्रण वाले तुर्की की सीमा के पास के सीरियाई क्षेत्र में,आईएस के समर्थकों और भगोडों की घुसपैठ रोकने के लिए एक कुशल सीमारक्षक बल गठित करने में सीरियाई कुर्दों के मुक्ति मोर्चे "वाईपीजी" की सहायता कर रहा है जो तुर्की के राष्ट्रपति आर्दोआन को पसंद नहीं आ रहा है।अपनी जगह तुर्की भी सही है वो किसी भी सूरत में कुर्दों को मजबूत और संगठित होते देखना नहीं चाहता, वो इनके मजबूत होने का परिणाम जानता है।अमेरिका को सीरिया युद्ध से निकलना है,वो चाहता है कि मजबूत कुर्द आईएस के भगोडों को नियंत्रित करे।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चाहें तो तुर्की, सीरियाई और इराक कुर्द के इलाकों को मिलाकर "कुर्दिस्तान" बना सकते हैं, जो कुर्दों की 100 साल से भी पुरानी मांग है, मगर वो ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि उन्होंने कुर्दों को एक मिशन के तहत इकट्ठा किया है और मिशन के समाप्त होने के बाद कुर्दों को भी अफगानियों की तरह उनके भाग्य भरोसे पर छोड दिया जाएगा।

आपको बता दें प्रथम विश्व युद्ध के अंत के बाद अगस्त 1920 में सेब्रे संधि में कहा गया था कि तुर्की के उस्मानिया साम्राज्य के विघटन से जो नये देश बनेंगे, उसमें ईसाइयों और कुर्दों के लिए भी दो अलग देश होंगे।संधि की धारा 62,63 और 64 में अलग कुर्दिस्तान का उल्लेख है।अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार सेब्रे संधि आज भी वैध है और अंतरराष्ट्रीय कानून का हिस्सा है।ईसाइयों को तो पश्चिमी देशों ने आर्मेनिया नामक देश दे दिया मगर कुर्द ऐसे ही रह गए।

आपको बता दें तुर्की में कुर्दों की कुल आबादी सात करोड़ अठहत्तर लाख से भी ज्यादा है, जो तुर्की की कुल जनसंख्या का 18% है।साठ लाख की आबादी ईरान और इराक में है,बीस लाख कुर्द सीरिया में रहते हैं मगर इन्हें अपना देश मयस्सर नहीं है।कोई भी मुस्लिम देश कुर्दों की खबर नहीं लेता, क्या वे मुसलमान नहीं हैं?तुर्की के राष्ट्रपति आर्दोआन को कश्मीरी मुसलमानों की चिंता है मगर कुर्द मुसलमानों की नहीं,ये कैसे संभव है।रहनुमा बनो तो सभी मुसलमानों का बनो।दूसरे देश के मुसलमानों की आपको चिंता है मगर अपने देश में हीं वे कुर्दों के ऊपर अत्याचार कर रहें हैं, मानवाधिकार हनन कर रहें हैं उसपर भी तो सवाल उठेंगे और उठ भी रहें हैं।

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