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आलमगीर औरंगजेब,सहिष्णु या असहिष्णु

Bhola Tiwari Oct 08, 2019, 10:16 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

मुगल बादशाह औरंगजेब जिसने भारत पर 49 साल तक सफलतापूर्वक शासन किया उसके बारे में विभिन्न इतिहासकारों और लेखकों ने विभिन्न मत व्यक्त किए हैं।कुछ उन्हें क्रूर शासक करार देते हैं और लिखते हैं कि उन्होंने अपने शासनकाल में हिंदुओं पर तरह तरह के अत्याचार किऐ थे तो कुछ उन्हें हिंदुओं को संरक्षण देने वाला बताते हैं।

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अपनी किताब "डिस्कवरी आँफ इंडिया" जो साल 1946 में प्रकाशित हुई थी,उसमें लिखते हैं कि औरंगजेब एक धर्मांध और पुरातनपंथी शख्स था।नेहरू ने बहुत से उदाहरण द्वारा इसे सिद्ध करने का प्रयास किया है।औरंगजेब ने अपने सगे भाई दारा शिकोह को सिंघासन के लिए मरवा दिया था, अपने पिता को उसने उनकी मृत्यु तक जेल में बंद रखा।

अमेरिकी इतिहासकार आँडरी ट्रस्चके अपनी किताब "औरंगजेब-द मैन एंड द मिथ" में लिखते हैं कि ये तर्क गलत है कि औरंगजेब ने मंदिरों को इसलिए ध्वंस्त करवाया क्योंकि वो हिंदुओं से नफरत करता था।वे लिखती हैं कि औरंगजेब की छवि के पीछे अंग्रेजों के जमाने के इतिहासकार जिम्मेदार हैं जो अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो नीति के तहत हिंदू मुस्लिम वैमनस्य को बढ़ावा देते थे।वे अपनी किताब में ये भी लिखती हैं कि अगर औरंगजेब का शासन बीस साल कम हुआ होता तो उनका आधुनिक इतिहासकारों ने अलग ढ़ंग से आकलन किया होता।वो आलमगीर औरंगजेब के पक्ष में दलील देते हुए लिखती हैं कि ये गलतफहमी है कि औरंगजेब ने हजारों हिंदू मंदिरों को तोडा।ज्यादा से ज्यादा कुछ दर्जन मंदिर हीं उनके सीधे आदेश से तोडे गए।उनके शासनकाल में कहीं हिंदुओं का सामुहिक नरसंहार नहीं हुआ,मैंने तो अपने रिसर्च में कहीं भी ऐसा नहीं पढा।औरंगजेब ने अपने राजदरबार में कई महत्वपूर्ण पदों पर हिंदुओं की नियुक्ति की थी,जो उसकी सहिष्णुता को प्रर्दशित करती है।

आँडरी ट्रस्चके जी आपके अनुसार हीं औरंगजेब ने दो दर्जन हिंदू मंदिरों को तोडा था,क्या ये उसकी धर्मांधता नहीं थी?अगर वो सर्वधर्म समभाव की नीति पर चलता या कट्टर सुन्नी मुस्लिम नहीं होता तो क्या ऐसा काम करता?ये कुछ सवाल हैं जो आलमगीर औरंगजेब की छवि को धर्मांध बनाती है।

ब्रिटिश और भारतीय इतिहासकार ये मानते हैं कि कट्टर औरंगजेब की जगह अगर उदारपंथी दारा शिकोह छठे मुगल सम्राट बनते तो इतिहास कुछ और होता।दारा शिकोह बेहद नर्मदिल तबीयत के थे और वे सभी को साथ लेकर चलने में विश्वास करते थे।इसी वजह से बादशाह शाहजहां का उनपर विशेष अनुराग था।वैसे भी बडा पुत्र हीं राजा होता था मगर औरंगजेब ने दारा शिकोह को राजा मानने से इंकार कर दिया था।

अंग्रेज और भारतीय इतिहासकारों के इतर अमेरिकी इतिहासकार आँडरी ट्रस्चके लिखती हैं कि दारा शिकोह में मुगल बादशाह बनने के कोई भी गुण नहीं थे।वो औरंगजेब की तरह युद्ध कुशल नहीं था,उसमें नेतृत्व करने की वो कला नहीं थी जो औरंगजेब में था।औरंगजेब बेहद बलशाली था जबकि दारा शिकोह औसत व्यक्तित्व के थे।

आँडरी ट्रस्चके के इतर इटालियन इतिहासकार निकोलाई मानुची जो उस समय भारत भ्रमण पर थे अपनी किताब "स्टोरिया दो मोगोर" में लिखते हैं कि दारा की मौत के दिन औरंगजेब ने उनसे पूछा था कि अगर उनकी भूमिकाएं बदल जाएं तो तुम क्या करोगे?बहादुर दारा शिकोह ने उपहासपूर्वक जवाब दिया था कि वो औरंगजेब के शरीर को चार हिस्सों में कटवा कर दिल्ली के चार मुख्य द्वारों पर लटकवा देंगे।

अगर दारा शिकोह बुजदिल होता तो वह औरंगजेब की अधीनता स्वीकार कर लेता मगर दारा शिकोह बहादुर था उसने औरंगजेब की दासता के बदले मौत को चुना था।

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