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गाँधी @150 : कलकत्ता की हिंसा बनाम दिल्ली की हिंसा

Bhola Tiwari Oct 08, 2019, 9:35 AM IST टॉप न्यूज़
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 नीरज कृष्ण

देश के सभी भागों में जो नफरत, द्वेष और उन्माद की बयार बह रही थी उसका प्रभाव कलकत्ता पे भी पड़ा था। वहां भी छिटपुट घटनाएं हो जा रही थी। गाँधी जी जहाँ थे कलकत्ता में, वहाँ भी हल्की झड़पें हो जा रही थी कभी- कभी। जिसके कारण गाँधी जी बेचैन हो जा रहे थे। तब गाँधी जी ने अपना अंतिम अस्त्र चलाया- 'आमरण अनसन'।

गाँधी जी आमरण अनशन पर बैठ गए और कहा कि कलकत्ता में सच्ची शांति होगी या मैं मरूंगा। लोग गाँधी के जीवन के लिए बेचैन हो गए।उपवास के तीसरे दिन कलकत्ता के 23 भयंकर अपराधियों ने गाँधी जी के सामने आत्मसमर्पण किया। साथ में अपने हथियारों का जखीरा भी लाये। भर्राये हुए आवाज में अपराधियों ने गाँधी से उपवास तोड़ने का आग्रह किया और गांधी से कहा , आप जो भी दंड देंगे, हमें स्वीकार है, पर आप उपवास तोड़ें।

राजगोपालाचारी तब कलकत्ता के गवर्नर थे उन्होंने लिखा कि गांधीजी की अनगिनत उपलब्धियां है। लेकिन कलकत्ता में अमानवीय हरकतों पर उनकी विजय बेमिसाल है। स्वतंत्रता की उपलब्धि से भी बढ़कर , लेकिन दिल्ली में हैवानियत, पाशविकता और क्रूरता का बोलबाला था। चार सितंबर , 1947 को वी पी मेनन ने माउंटबेटन को शिमला से दिल्ली लौटने के लिए फोन किया। मेनन ने कहा कि आप 24 घंटे के अंदर दिल्ली नहीं आयेंगे, तो फिर आने का कोई तक नहीं, क्योंकि मुल्क हमेशा-हमेशा के लिए मिट जायेगा। प्रधानमंत्री और उप प्रधानमंत्री बेहद चिंतित हैं, स्थिति काबू से बाहर है।

माउंटबेटन लौट आये। नेहरू-पटेल ने उन्हें फिर से देश संभालने की गुजारिश किया। माउंटबेटन स्तब्ध थे। उन्होंने कहा भी कि आप लोग क्या करने जा रहे हैं , अपनी आजादी को फिर हमें सौप रहे हैं, नेहरू - पटेल ने देश बचाने के नाम पर विनती की , इमरजेंसी कमेटी बनी। माउंटबेटन ने अपनी इच्छा से उसमें लोगों को रखा। शर्त रखी कि मेरा निर्णय अंतिम होगा। दोनो नेताओं ने सभी शर्ते मान ली और देश का शासक एक बार फिर माउंटबेटन हो गये। यह राज और रहस्य बहुत कम लोगों को पता होगा।

यह था आज के 150 वर्षीय वयोवृद्ध गाँधी का चमत्कार। आम-जन पर गाँधी की पकड़।

फ्रांस , कस्टोरिका ने गाँधी जी के सम्मान में अपने देश के संचार -प्रणाली को उन्हें समर्पित करते हुए सन 2006 में मोबाइल सिम-कार्ड जारी करते हुए कहा था- कि पूरी दुनिया में जितना मजबूत नेटवर्क गाँधी जी का है उतना किसी अन्य का नहीं। हम भी उतनी ही मजबूत नेटवर्क के साथ अपने देश की जनता को संचार प्रणाली (मोबाइल सर्विस) अर्पित कर रहे हैं। भारत ने शायद इस तरफ कभी सोचा भी नही, क्योंकि .......गाँधी अभी समझा जाना शेष है।

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