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तेजस के बहाने !

Bhola Tiwari Oct 07, 2019, 8:07 PM IST टॉप न्यूज़
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 रंजीत कुमार

हर चीज का एक समय होता है। जी हां, हर चीज का। समर्थन और विरोध का भी। प्रेम और नफरत का भी। समय बीत जाने के बाद न तो समर्थन का कोई अर्थ रह जाता है न विरोध का, न प्रेम का न नफरत का। तो मेरा मानना है कि बाजारवाद के विरोध का समय बीत चुका है। करीब दो दशक पहले ही। अब यह अपनी आयु जीकर ही जाएगा। नियति ने इसे कितनी उम्र बख्शाी है, यह नियति जाने। लेकिन इतना तय है कि यह अपने हिस्से की जवानी जमकर जिएगा। यह युवा काल में दाखिल हो चुका है। उछल-कूद, धूम-घड़ाका शुरू है। अगर अब भी आप बाजारवाद का विरोध कर रहे हैं तो आप सिर्फ अपना खून जला रहे हैं। इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। सारी दुनिया बाजारवाद को एंज्वाय कर रही है। सारी सरकारें बाजार के हाथों की कठपुतली बन चुकी हैं। सरकारें वहीं करेंगी जो बाजार के मन भाए। और बाजार वही करेगा जो ग्राहक को बुलाए यानी मुनाफा दे। बस इसी दो स्पर्शज्याओं के बीच आज की दुनिया की जीवा गुजरती है। ऐसी स्थिति में रेल की सार्वजनिक पटरियों पर प्राइवेट कंपनियों की ट्रेन का दौड़ना अप्रत्याशित नहीं है। और इन ट्रेनों के बॉगियों में मनोरंजन और विलासिता की दुकान खुलना भी अप्रत्याशित नहीं है। यह सब देख आपको परेशानी हो सकती है। क्योंकि आप सदियों से मानते रहे हैं कि भारतीय रेल सार्वजनिक सेवा का दूसरा नाम है। क्योंकि आपका अनुभव कहता है कि यात्राएं असुविधाओं से भरी होती है। यात्राएं मंजिल पर पहुंचने के लिए की जाती है न कि मनोरंजन के लिए। बाजार ऐसे नहीं सोचता। वह आपके पुराने मन-पाठ्यक्रम को नहीं पढ़ता, वह चीजों को परंपरा के प्रकाश में नहीं देखता। उसकी अपनी दृष्टि है जो चीजों को मुनाफे से परिभाषित करती है। और मुनाफा दूध, दही, हरी सब्जी बेचकर या अच्छी किताब लिखकर कमाया नहीं जा सकता। उसके लिए डिमांड क्रिएट करना पड़ता है। आदमी की भोग इंद्रियों को भड़काना पड़ता है। भड़काव के कुछ रंजक कर्मक (डाइिंग एजेंट) उन्हें प्राकृतिक रूप से मिल जाते हैं- स्त्री, स्त्री का सौंदर्य, सौंदर्य का आकर्षण बगैरह-वगैरह...। कुछ वे सिंथेसाइज करते हैं। इसके लिए दुनिया की हजारों सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं दिन-रात उनके लिए रीसर्च करती रहती हैं। मसलन किएटेड डिमांड के बाद उबन का खतरा रहता है, तो इससे निपटने के लिए वे डिमांड के रंग, आकार, स्वाद में बदलाव करते रहते हैं। तो तेजस के कंपार्टमेंट क्रियू में सजी-संवरी महिलाओं का होना आश्चर्यजनक नहीं है। बाजार हर उस जगह पर महिलाओं को बिठाएगा जहां बात मनोरंजन की होगी। वह महिलाओं को किसी सीएमडी का सुरक्षा गार्ड तो नियुक्त नहीं कर सकता न, उसे महिलाओं को हैवी मशीनरी के ऑपरेशन में नहीं लगाना है, उसे महिलाओं को पॉलिसी मेकिंग या डिसीजन टेकिंग में भी नहीं लगाना है, हां परिचारिका बनाना है, एड कराना है, रीसेपसिनिस्ट बनाना है। खैर मूल प्रसंग पर लौटा जाए। 

मैं कह रहा था कि बाजार के विरोध का समय बीत गया है। लेकिन मैं यह नहीं कहता कि आलोचना का समय बीत गया है। आलोचना यह नहीं है कि आप बाजार की अवधारणा को खारिज कर दें। आलोचना यह भी नहीं है कि आप बाजार के इशारे पर नाच रही सरकार की भर्त्सना करें। यह प्रतिरोध है, जो अब संभव नहीं है। आलोचना यह है कि आप बाजार के क्रिएटेड डिमांड के जाल में न फंसे। आलोचना यह है कि नए मॉडल के मोबाइल सेट के लिए अपने बिल्कुल कारगर महज दो महीने पुराने मोबाइल को एबंडन न करें। आलोचना यह है कि आप सफर में मनोरंजन और विलासिता के मिश्रण को समझें। सफर को सफर ही रहने दें मनोरंजन का साधन न समझें। आलोचना यह भी है कि आप बाजार को लेस प्रॉफिट के क्षेत्र में जाने को मजबूर करें। यह कोई बात नहीं हुई कि हम एक ओर रेलवे के निजीकरण का विरोध भी करें और तेजस की पहली सवारी का अवसर पाने के लिए बेचैन भी रहें।

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