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ईंधन तेल का मंडराता संकट

Bhola Tiwari Oct 06, 2019, 8:09 AM IST टॉप न्यूज़
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 भरत झुनझुनवाला

ऐसे में हम अमरीका का साथ देकर दोगुना नुकसान करेंगे। एक तरफ वेनेजुएला और ईरान से तेल न खरीद कर, महंगा तेल खरीदेंगे और दूसरी तरफ अमरीका भी हमारी मदद नहीं कर सकेगा। इसके विपरीत यदि हम वेनेजुएला औरईरान से तेल खरीदना जारी रखें, तो अमरीकी अर्थव्यवस्था के संकट को बढ़ा सकते हैं…

बीते दिनों में अमरीका ने वेनेजुएला से ईंधन तेल का आयात बंद कर दिया है और भारत जैसे तमाम देशों पर भी दबाव डाला है कि वे वेनेजुएला से ईंधन तेल न खरीदें। वेनेजुएला के सत्ताधारी राष्ट्रपति पर भ्रष्टाचार आदि के तमाम आरोप हैं और अमरीका उन्हें हटाने को उद्यत है। इससे पहले अमरीका ने ईरान पर भी इसी प्रकार के प्रतिबंध लगाए थे। अमरीका ने व्यवस्था की थी कि ईरान के तेल के निर्यातों का पेमेंट किसी भी अमरीकी बैंक द्वारा नहीं किया जाएगा। अमरीका ने भारत जैसे देशों को भी आगाह किया था कि ईरान से तेल की खरीद कम कर दें, लेकिन वेनेजुएला और ईरान भारत के प्रमुख तेल सप्लायर हैं। इसलिए अमरीका के कहे अनुसार इन देशों से तेल का आयात न करने से हमारी ईंधन सप्लाई कम होगी और हमारी अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। हमें इन देशों के सस्ते तेल के स्थान पर सऊदी अरब अथवा अन्य देशों से महंगे तेल को खरीदना पड़ेगा। ऐसे में हमको तय करना है कि अमरीका का साथ देते हुए वेनेजुएला एवं ईरान से तेल की खरीद बंद करेंगे अथवा अमरीका का सामना करते हुए इन देशों से तेल की खरीद जारी रखेंगे। यह निर्णय लेने के लिए हमें यह समझना होगा कि अमरीका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों की सफलता की क्या स्थिति है। जैसा ऊपर बताया गया है अमरीका ने आदेश दिया है कि किसी भी अमरीकी बैंक के माध्यम से ईरान के तेल का पेमेंट नहीं हो सकेगा। ईरान के तेल को खरीदा जा सकता है, यदि उसका पेमेंट अमरीकी बैंकों के माध्यम से न हो, बल्कि दूसरे बैंकों से हो।

अतः यदि यूरो के माध्यम से ईरान के तेल का पेमेंट होता है, तो इसमें अमरीका द्वारा लगाए गए प्रतिबंध आड़े नहीं आते हैं। वर्तमान में विश्व बाजार में तेल के व्यापार का 40 प्रतिशत पेमेंट अमरीकी बैंकों के माध्यम से होता है, जबकि 35 प्रतिशत यूरोपीय बैंकों से होता है। ऐसे में अमरीकी सरकार ने अमरीकी बैंकों को यह लेन-देन करने से मना कर दिया है। इसका सीधा परिणाम यह होगा कि तेल का पेमेंट अब डालर के स्थान पर यूरो के माध्यम से होगा, जिस पर अमरीका का कोई प्रतिबंध नहीं है। इस परिप्रेक्ष्य में आने वाले समय में विश्व बाजार में तेल का अधिकाधिक लेन-देन डालर के स्थान पर दूसरी मुद्राओं में होने लगेगा। ऐसा होने पर अमरीका की मंशा निष्फल होगी, क्योंकि वेनेजुएला और ईरान से तेल का निर्यात होता रहेगा और उन्हें इसका पेमेंट डालर के स्थान पर यूरो में मिलता रहेगा। अमरीका की घरेलू वित्तीय हालत भी डावांडोल होती जा रही है। राष्ट्रपति ट्रंप ने चुनावी वादा किया था कि वे अमरीका सरकार का वित्तीय घाटा नियंत्रित करेंगे। वित्तीय घाटा वह रकम होती है, जो कि सरकार आय से अधिक खर्च करती है। यदि सरकार की आय 100 अरब डालर है और सरकार ने खर्च 150 अरब डालर का किया, तो वित्तीय घाटा 50 डालर अरब होता है। इस घाटे की पूर्ति सरकारें बाजार से ऋण उठा कर करती हैं। वित्तीय घाटा बढ़ने का सीधा परिणाम मुद्रा पर पड़ता है। यदि सरकार भारी मात्रा में ऋण लेती है, तो उसका पेमेंट करने के लिए सरकार को अंततः घरेलू उद्यमों पर टैक्स लगाना पड़ता है। ऐसा करने से घरेलू उद्यमों की आर्थिक स्थिति बिगड़ती है, जैसे ऋण से दबी हुई कंपनी के शेयर के मूल्य बाजार में गिरते हैं। इसी प्रकार ऋण से दबे हुए देश की मुद्रा विश्व बाजार में गिरती है। राष्ट्रपति ओबामा के कार्यकाल के आखिरी वर्ष में अमरीकी सरकार का वित्तीय घाटा 600 अरब डालर था। राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकाल में इस वर्ष में यह बढ़कर 900 अरब डालर हो गया है। वित्तीय घाटा बढ़ने का अर्थ हुआ कि अमरीका की अर्थव्यवस्था अंदर से कमजोर हो रही है और मुद्रा कभी भी लड़खड़ा कर गिर सकती है। अमरीकी डालर आज विश्व की प्रमुख मुद्रा है। विश्व के अधिकाधिक वित्तीय लेन-देन डालर के माध्यम से किए जाते हैं। यदि आपको 100 रुपए किसी जापानी को भेजने हैं, तो आप उन 100 रुपए से पहले डालर खरीदते हैं और फिर डालर को जापान भेजते हैं और जापानी व्यक्ति उन डालर को बेचकर यह रकम येन में प्राप्त करता है। डालर की इस विश्व मुद्रा की भूमिका के चलते विश्व के तमाम देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार को अमरीकी डालर में परिवर्तित करके अमरीकी बैंकों में जमा करा देते हैं, जिससे कि जरूरत पड़ने पर वे इस मुद्रा को तत्काल निकाल कर अपनी जरूरतों की पूर्ति कर सकें। यह रकम अमरीका को एक मुक्त ऋण के रूप में होती है। जैसे यदि आपने किसी साहूकार को एक हजार रुपए दे दिए कि जरूरत पड़ने पर ले लेंगे, तो साहूकार उस एक हजार रुपए का उपयोग अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए कर सकता है, जब तक कि आप उन्हें वापस न मांगें। इसी प्रकार विश्व के तमाम देशों ने 21 हजार अरब डालर अमरीकी बैंकों में जमा करा रखे हैं। यह विशाल राशि अमरीका को मुफ्त ऋण के रूप में मिल रही है। अमरीका की आर्थिक ताकत का कारण या एक आधार यह विशाल मुद्रा है, जैसे यदि आपको कोई बीस व्यक्ति एक-एक करोड़ रुपए सुरक्षित रखने के लिए दे दें, तो आपके पास बीस करोड़ रुपए सहज ही आ जाएंगे और आप बाजार में बड़े हो जाएंगे, लेकिन अमरीका की यह ताकत अब कमजोर होने को है। जैसा ऊपर बताया गया है कि तेल के वित्तीय लेन-देन के लिए तमाम देश डालर को छोड़कर यूरो अथवा दूसरी मुद्रा में लेन-देन शुरू करने का प्रयास कर रहे हैं। चीन भी एक वैकल्पिक विश्व मुद्रा बनाने का प्रयास कर रहा है। साथ-साथ अमरीकी सरकार का वित्तीय घाटा बढ़ रहा है, जिससे अमरीकी डालर की साख घट रही है।

इन दोनों कारणों से अमरीकी डालर की विश्व मुद्रा की भूमिका पर आंच आ सकती है। अमरीका को मुफ्त मिल रहा ऋण कम हो सकता है और अमरीकी अर्थव्यवस्था पर संकट आ सकता है। इस परिस्थिति में हमें देखना होगा कि अमरीका द्वारा वेनेजुएला तथा ईरान से तेल बंद करने की धमकी का हम पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। यदि अमरीकी अर्थव्यस्था कमजोर हो रही है और इन प्रतिबंधों से अधिक कमजोर होने को है, तो हमें वेनेजुएला तथा ईरान से तेल का आयात करते रहना चाहिए।

ऐसे में हम अमरीका का साथ देकर दोगुना नुकसान करेंगे। एक तरफ वेनेजुएला और ईरान से तेल न खरीद कर, महंगा तेल खरीदेंगे और दूसरी तरफ अमरीका भी हमारी मदद नहीं कर सकेगा। इसके विपरीत यदि हम वेनेजुएला और ईरान से तेल खरीदना जारी रखें, तो अमरीकी अर्थव्यवस्था के संकट को बढ़ा सकते हैं, जिससे विश्व अर्थव्यवस्था में हमारी साख में सुधार होगा। इसलिए मेरी समझ से हमें अमरीका की धमकी का सामना करते हुए वेनेजुएला और ईरान से तेल की खरीद जारी रखनी चाहिए, जिससे हमारी अर्थव्यवस्था सुदृढ़ रहे और अमरीका यदि इस कार्रवाई में टूटता है, तो इससे हमें कोई नुकसान होने की संभावना नहीं है।

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