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हम स्वयं बुला रहे बाड़ की तबाही...

Bhola Tiwari Oct 01, 2019, 7:41 PM IST टॉप न्यूज़
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भरत झुनझुनवाला

वर्तमान समय में देखा जा रहा है कि किसी क्षेत्र में किसी विशेष समय भारी वर्षा के कारण बाड़ की तबाही हो रही है. वही क्षेत्र एक माह पहले सूखे की चपेट में था. जैसे इस समय मध्यप्रदेश और पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में बाड़ देखी जा रही है. इस परिस्थिति का एक प्रमुख कारण ग्लोबल वार्मिंग है. धरती का ताप बढ़ रहा है जिससे हमारे मानसून के पेटर्न में बदलाव आ रहा है. पहले वर्षा तीन माह तक धीरे धीरे होती थी. खेतों में गिरने वाला पानी जमीन में रुकता था और इसका एक बड़ा हिस्सा जमीन के अन्दर रिस जाता था. लेकिन अब उतना ही पानी 15 दिन में गिर रहा है. वर्षा की गति तीव्र हो गयी है. कुल वर्षा पूर्व की मात्र में ही होती है लेकिन अब वह थोड़े ही समय में ही गिरती है. अब खेतों में गिरने वाले पानी को जमीन के अन्दर रिसने का अवसर नहीं मिलता है. यह पानी नदियों में समा जाता है. नदियों की इतनी क्षमता नहीं है कि वह इस भारी मात्रा में आये हुए पानी को समुद्र तक पहुंचा सके इसलिए बाड़ आ जाती है. इस प्राकृतिक परिवर्तन से निपटने के स्थान पर हमने प्रकृति की मार को और बढ़ाने का कार्य किया है.

इंजीनियरों का मानना है कि बाड़ की समस्या से निबटने के लिए हमें नदियों के पानी को बड़े बांधों में रोक लेना चाहिए जिससे नदियों में कि अधिक मात्रा में पानी न बहे और बाड़ स्वतः रुक जाए. साथ साथ वर्षा के समय यदि नदी के पानी को सिंचाई के लिए निकाल लिया जाय तो नदी में पानी की मात्रा पुनः कम हो जायेगी और तदनुसार बाड़ का प्रकोप भी कम हो जाएगा. लेकिन आज देश में सभी नदियों पर बाँध बनाने एवं सिंचाई के लिए पानी निकालने के बावजूद बाड़ की समस्या बढती ही जा रही है जो की इन्जीनीयारो की सोच की कमी को दर्शाती है. 

समस्या को समझने के लिए हम गंगा को उदाहरण स्वरुप ले सकते हैं. गंगा की प्रकृति है कि वह हर वर्ष हिमालय से भारी मात्रा में गाद लाती है और गाद को अपने पेटे में हरिद्वार से गंगासागर तक जमा करती जाती है. फिर पांच सात वर्षों में एक बड़ी बाड़ आती है जो कि इस जमी हुई गाद को धकेल कर समुद्र में पहुंचा देती है और नदी का पाट फिर अपने पुराने निचले स्तर पर पहुँच जाता है. इस प्रक्रिया में हर साल बाड़ आती है और पांच सात वर्षों में बड़ी बाड़ भी आती है नदी का पेटा पुनः गहरा हो जाता है. उसके आगे वाले वषों में बाड़ थोड़ी कम हो जाती है क्योंकि नदी की पानी को वहन करने की क्षमता बढ़ जाती है. हमने गंगा के इस स्वभाव में दो प्रकार से बाध डाली है. पहला, टिहरी जैसे बाँध बनाकर हमने भागीरथी के पानी को झील में रोक लिया है. दूसरा, हमने हरिद्वार, बिजनोर और नरोरा में बराज बनाकर गंगा के पानी को वर्षा के समय भी निकाला है. इन दोनों कारण से गंगा में अब हर पांच सात वर्षों में आने वाली भारी बाड़ समाप्त हो गयी है. नीचे की गंगा का बहाव पूर्व की तुलना में कम हो गया है. इस बहाव की कमी से तत्काल लाभ होता है क्योंकि पानी की मात्रा कम होती है और बाड़ कम आती है. लेकिन इस कम पानी की मात्रा में भी जो गाद आती है वह गाद निरंतर गंगा के पेटे में बैठती जाती है. अब इस बैठी हुई गाद को

समुद्र तक धकेलने की क्षमता गंगा में नहीं रह जाती है क्योंकि हमने भारी बाड़ को रोक दिया है. इसलिए अब कम वर्षा में भी अधिक बाड़ आती है. गाद के नदी के पेटे में निरंतर बैठते जाने से गंगा का पेटा ऊंचा होता जा रहा है. गंगा को अब पानी वहन करने के क्षमता घट रही है और कम वर्षा में भी अब बाड़ आने लगी है. तेहरी जैसे बांधों को बनाने से नीचे के क्षेत्रों में गाद का आना भी कम हुआ है परन्तु यह तात्कालिक प्रभाव मात्र है. यद्यपि मैंने अन्य नदियों का अध्ययन नहीं देखा है फिर भी मेरा अनुमान है हर नदी की देश में ऐसी ही परिस्थिति है.

नदी के पानी का निश्चित रूप से सिंचाई के लिए उपयोग होना चाहिए. इसके इस उपयोग के दो रास्ते हैं. एक रास्ता यह है कि पानी को बड़े बांधों में रोक लिया जाय और जाड़े और गर्मी के समय छोड़ा जाए जिससे नहर के माध्यम से सिंचाई हो सके. दूसरा उपाय यह है कि हम टिहरी जैसे बांधों को हटा दें और नदी के पानी को बाढ़ के समय फैलने दें. जब बाड़ आती है तो नदी का पानी फैलता है और बड़े क्षेत्र में पानी जमीन में रिसता है और जमीन के नीचे समा जाता है जिसको हम जाड़े और गर्मियों में ट्यूबवेल के माध्यम से निकालकरइस्तेमाल कर सकते हैं. दोनों ही तरह से हम नदी के 

पानी का संग्रहण करते हैं और उसका सिंचाई के लिए उपयोग करते हैं. लेकिन अंतर यह है कि जब हम बाँध में पानी को रोक कर सिंचाई के लिए उपयोग करते हैं तो पानी की 15 से 20 प्रतिशत मात्रा बाँध के जलाशय से वाष्पीकरण से ख़त्म हो जाता है. इसके बाद इस पानी को नहर के माध्यम से खेतों तक पहुंचाने में पुनः 15 से 20 प्रतिशत पानी की बर्बादी होती है. यदि हम बाँध को हटा दें और पानी को फैलने दें तो यह पानी भूमिगत तालाबों में जमा हो जाता है लेकिन वहां इसका वाष्पीकरण नहीं होता है. नहर से भी इसे एक स्थान से दुसरे स्थान तक ले जाने की जरुरत नहीं होती है क्योंकि इससे आप कहीं पर भी ट्यूबवेल के माध्यम से निकाल सकते हैं. इसलिए इन दोनों ही तरह से हम सिंचाई कर सकते हैं. लेकिन हम बाड़ के माध्यम से नदी की गाद को समुद्र तक पहुंचाने की क्षमता बनी रहती है जिससे अंतत बाड़ भी कम आती है.

हमें सिंचाई की समस्या को ग्लोबल वार्मिंग के साथ जोड़ कर देखना होगा.

उपाय यह है कि हर खेत में गिरने वाली वर्षा को वहीँ पर रोककर के भूमि के अन्दर रिसाने का प्रयास किया जाय. इसके लिए क़ानून अथवा किसानो को इनसेंटिव दिया जाना चाहिए. दूसरा, हमें बाँध हटाकर भारी बाढ़ को बनाये रखना चाहिए जिससे कि भूमिगत जल का पुनर्भरण भी हो और नदी जमी हुई गाद को धकेलकर समुद्र तक ले जाए. तीसरे, हर नदी के पाट पर बाहुबलियों ने कब्ज़ा कर रखा है. उनसे नदी की मुक्ति करानी चाहिए जिससे कि नदी की गाद को समुद्र तक पहुंचाने की क्षमता पुनः स्थापित हो जाए.

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