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बेहद कड़वी मगर सच बोला है अरविंद केजरीवाल ने

Bhola Tiwari Oct 01, 2019, 8:26 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने एक बार फिर बिहार की चिकित्सा व्यवस्था को आईना दिखलाया है।उन्होंने कहा कि बिहारी 500 रूपये का टिकट कटाकर पाँच लाख का ईलाज करवाने दिल्ली आ जाते हैं।दिल्ली की स्वास्थ्य सुविधाओं की तारीफ करते करते केजरीवाल ने ऐसी चुभने वाली बात कर दी कि जो बिहार की राजनीति करनेवालों को अंदर तक बेध गई है।बात जरूर मिर्ची लगने जैसी है मगर है सौ आने सही।

केजरीवाल को छोडिये बिहार से केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री अश्विनी चौबे ने भी इस सच्चाई को स्वीकार किया था।2017 में अश्विनी चौबे ने कहा था कि बिहार के लोग छोटी-मोटी बीमारी का भी इलाज कराने दिल्ली के एम्स में पहुंच जाते हैं।इस वजह से एम्स में हर वक्त मरीजों का अंबार लगा रहता है।उन्होंने ये भी कहा कि मैंने डाक्टरों से कहा है कि वो ऐसे मरीजों को वापस राज्य में इलाज कराने के लिए भेज दें।

आपको याद होगा शीला दीक्षित ने भी बिहार और यूपी से दिल्ली आकर बसे लोगों को दिल्ली के लिए बोझ बताया था।उन्होंने ये भी कहा था कि इनके कारण दिल्ली के हर सेक्टर में भीड़ रहती है।क्या गलत कहा था शीला दीक्षित ने?कहाँ केजरीवाल गलत हैं?

आपको बता दें बिहार के जीतने लोग इलाज कराने दिल्ली जातें हैं उससे कहीं अधिक बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी(B.H.U) आते हैं।क्रिटिकल पेसेंट लखनऊ पीजीआई जाते हैं।बिहार के बक्सर, सिवान,छपरा, गोपालगंज, मोतिहारी आदि जिलों से रोज पैसेंजर ट्रेनों में गरीब बिहारी जिनके पास एम्स, दिल्ली जाने का पैसा नहीं है, संसाधन नहीं है।वे बीएचयू और पीजीआई लखनऊ आते हैं और अपना इलाज कराते हैं।गरीबों के लिए तो बीएचयू, दिल्ली के एम्स से भी बडा है।

नीति आयोग द्वारा जारी राज्यों के हेल्थ इंडेक्स के मुताबिक 21 राज्यों के इंडेक्स में 19 वाँ स्थान बिहार का है।वैसे स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहवाली देशव्यापी है,नेशनल हेल्थ प्रोफाइल(2018)के अनुसार भारत में औसतन 11,000 लोगों की आबादी के लिए एक एलोपैथिक सरकारी डाक्टर मौजूद है।जब राष्ट्र का आंकड़ा ये है तो गरीब बिहार की दुर्दशा आप समझ सकते हैं।

एक समय पीएमसीएच अपने बेहतरीन इलाज के लिए जाना जाता था मगर आज वहाँ दुरवस्था अपने चरम पर है।डाक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की कमी से जुझ रहा ये अस्पताल अब बस नाम का हीं रह गया है।लगातार 14 सालों से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज नीतीश कुमार बिहार की स्वास्थ्य महकमे में आमूल चूल परिवर्तन करने में बिल्कुल नाकाम साबित हुऐ हैं।कुर्सी पर चिपके नीतीश कुमार मुज्जफरपुर के चमकी बुखार के समय बेनकाब हो गए थे जब उन्होंने सार्वजनिक रूप से झूठ बोला था कि अस्पताल में डाक्टरों और जीवन रक्षक दवाओं की कोई कमी नहीं है।वरिष्ठ पत्रकार#अजीत अंजुम और आजतक चैनल ने अस्पताल का दौरा कर उनके झूठ की पोल खोल दी थी।बिहार के बहुत से जिलों में हर साल बारिश के समय जापानी इंसेफेलाइटिस का अटैक होता है मगर बिहार सरकार हाथ पे हाथ धरकर बैठी रहती है।प्रतिवर्ष सैकड़ों नौनिहाल सिस्टम की भेंट चढ़ जाते हैं।मौत पे मुआवजा देने का सिलसिला शुरू होता है मगर अस्पताल की व्यवस्था और इलाज वही ढाक के तीन पात रहती है।

बिहार में चिकित्सा व्यवस्था कैसी है इसकी एक बानगी जब लालू यादव के बडे पुत्र स्वास्थ्य मंत्री थे तब देखने को मिली थी।स्वास्थ्य मंत्री तेजस्वी यादव ने अपनी माँ राबडी देवी के घर तीन वरिष्ठ चिकित्सक और दो नर्सों की परमानेंट ड्यूटी लगा दी थी।वे राबडी देवी के घर पर हीं ड्यूटी बजाते थे और पैसा पीएमसीएच देता था।तब भी सुशासन बाबू मौन थे आज भी मौन हैं।

एक सरकारी आंकड़ों के मुताबिक बिहार में 29,000 आबादी पर एक डाँक्टर है।8645 लोगों पर एक अस्पताल का बेड है।ग्रामीण क्षेत्रों में डाक्टर हफ्ते दस दिन में एक बार अस्पताल आते हैं।अधिकांश डाक्टर प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं, मगर उन्हें रोकने की कूबत राज्य सरकार के पास नहीं है।इसी बिहार में W.H.O अपने संगठन और इमानदारी के बल पर बेहतरीन काम कर रहा है मगर बिहार के स्वास्थ्य विभाग में दीमक लग चुकी है, वर्तमान में तो इसका कोई इलाज नहीं दिखता।

आपको बता दें गरीब प्रदेश बिहार से हर रोज 20,000 लोग महानगरों के लिए पलायन करते हैं।ज्यादातर लोग दिल्ली और मुंबई जाते हैं जहाँ कम से कम पेट भरने और परिवार चलाने के लिए दो जून की रोटी तो नसीब हो हीं जाती है, अब वहां भी उनके खिलाफ आवाज उठने लगी है।कोई भी राज्य इतने बड़े माइग्रेशन को झेलने के लिए तैयार नहीं।सभी राज्यों के संशाधन सीमित हैं और वे चाहते हैं कि उसका दोहन वहाँ के हीं निवासी करें,जो ठीक भी है।

बिहार में स्वास्थ्य व्यवस्था का ये आलम है कि राज्य सरकार स्वास्थ्य व्यवस्था पर सबसे कम पैसा खर्च करती है।बिहार सरकार कुल खर्चों का सिर्फ 3.94% हिस्सा हेल्थ पर खर्च करती है।बिहार में एक व्यक्ति पर 495 रू. का मेडिकल खर्च करती है सरकार,इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि बिहार सरकार स्वास्थ्य व्यवस्था पर कितना संवेदनशील है।केंद्र सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार पिछले साल स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करने के लिए केंद्र सरकार ने बिहार सरकार को 3,370 करोड़ रू दिये थे मगर विडंबना देखिए पैसा होते हुए भी बिहार सरकार इसका 50% हीं उपयोग कर सकी।

ये बिहार के निवासियों का दुर्भाग्य है कि आजादी के बाद से हीं वहाँ कभी भी काम करनेवाली सरकार नहीं बनीं, भष्टाचार हमेशा वहाँ सर चढ बोलता है।बिहार के विभाजन के बाद जो उद्योग थे झारखंड में चले गए।यहाँ के नेता केवल सियासत करना जानते हैं, विकास से इनका कोई सरोकार नहीं है।कहते हैं कि बुरे दिनों के बाद अच्छी दिन आते हैं मगर मुझे तो निकट भविष्य में वहाँ कोई सुधार होते नहीं दिखता।यही हालत रहा तो बिहारियों को अभी कई सालों तक इस तरह के तानों को सुनना होगा और सुनने की आदत डालनी होगी।

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