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मंथन : किस राह को निकल पड़े हम

Bhola Tiwari Oct 01, 2019, 7:25 AM IST टॉप न्यूज़
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प्रवीण झा

(जाने-माने चिकित्सक नार्वे)

मैं जब गुड़गाँव में था, तो उसके दो हिस्से थे, जैसा कई भारतीय नव-नगरों में है। नया गुड़गाँव नयी-नवेली गगनचुंबी इमारतों से सज रहा था, और पुराना गुड़गाँव भी यथाशक्ति पुरानी इमारतों के ऊपर ही ईंट जोड़ने में लगा था। लेकिन, जिस गति से इमारतें बनती जा रही थी, नाले बन ही नहीं रहे थे। एक बिल्डिंग में फ्लैट देखने गया तो पता किया कि गंदा पानी कहाँ जमा होगा। कहा कि सेप्टिक टैंक में। मैंने पूछा कि दो-तीन सौ मकानों का कचड़ा एक गड्ढे में विलीन हो जाएगा? कहा कि भर जाने पर उस कचड़े को कहीं और ले जाएँगे। यानी, इतनी इमारतें बन गयी, और जल-निकास की व्यवस्था ही नहीं। नतीजा तो खैर मेरे निकलते-निकलते ही दिखने लगा था, अब शायद सुधार हुआ हो।

चंडीगढ़ जैसे सुनियोजित शहरों में पानी जमने लगा। मैं एक बार मैसूर के नव-मोहल्ले में गया, तो वहाँ भी पानी जमा हुआ। मैंने सुन रखा था कि भारत की सबसे सुंदर जल-निकास व्यवस्था अगर कहीं है तो मैसूर में है। मैसूर राजाओं ने ही भूमिगत जल-निकास सिस्टम बना लिया था। लेकिन, यह तो पुराने मैसूर में बना था। नया मैसूर तो उसी गुड़गाँव मॉडल पर है, जहाँ कचड़ा एक अंधी गली में जाकर जमा हो जाता है। जबकि यह ध्यान रहे कि मैसूर या पुणे की मिट्टी ऐसी है, जो जल सोख लेती है। हर जगह ऐसी छन्नीदार मिट्टी नहीं होती।

वैसे अगर यह सारे नाले अंधी गली से न गुजर कर, तमाम पतली धाराओं से बहते हुए नदी में ही चले जाते तो क्या हल निकल जाता? यह बात अब सभी विशाल महानगरों के लोग समझ चुके हैं कि यह प्रायोगिक नहीं। उन्हें नदी में बहने से इतर जल को समाहित करने के रास्ते ढूँढने ही होंगे। न्यूयॉर्क तक को आखिर अपने शहर को दो भागों में विभाजित करना पड़ा। एक हरा, एक कंक्रीट। जबकि वहाँ ड्रेनेज सिस्टम तो भूमिगत है ही, और नदी-समुद्र सब है। लेकिन जितनी तेजी से एक हरित पट्टी जल को सोखती है, उतने कहाँ ये बरसाती नाले कर पाएँगे? यह प्रकृति की छन्नी है। अगरतला जल-जमाव से डूबता है, लेकिन उत्तर-पूर्व के सबसे बड़े वृष्टि-क्षेत्र अगर नहीं डूबते तो इसकी वजह वहाँ की यह हरियाली ही है। लेकिन, एक ऐसे शहर में, जहाँ अब ऐसे इलाके बचे नहीं, यह पूरा इकोसिस्टम खड़ा करने में चार-पाँच दशक लग जाएँगे। तब तक तो बिन पेंदी के काल्पनिक नालों में ही जोड़-घटाव संभव है। प्रकृति का गणित न सही, कन्क्रीट का गणित सही। बड़ी-बड़ी इमारतों के किनारे बहते पतले-पतले नाले, जाएँ तो जाएँ कहाँ?

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