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वजीरेआजम पाकिस्तान अमेरिका पर सही आरोप लगा रहें हैं मगर.........

Bhola Tiwari Sep 28, 2019, 8:07 PM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

1979 में अफगानिस्तान में सैयद मोहम्मद नजीबुल्लाह की कम्युनिस्ट सरकार सत्तारूढ़ थी और वह मुजाहिद्दीनों से अपनी शासन-सत्ता बचाने के लिए संघर्ष कर रहे थे।मुजाहिदीन दिन-प्रतिदिन ताकतवर होकर नजीबुल्लाह सरकार को चुनौती दे रहे थे।1979 के अंत आते आते नजीबुल्लाह की पकड़ बेहद कमजोर पड़ गई और मुजाहिद्दीनों ने काबुल को तीन तरफ से घेर लिया था,तब नजीबुल्लाह ने सोवियत संघ से मामले में दखल की मांग की।उन दिनों सोवियत संघ के राष्ट्रपति थे लियोनिड ब्रेजनेव,उन्होंने तत्काल अफगानिस्तान में अपनी सेना भेजी और काबुल को कुछ हीं दिनों में मुजाहिद्दीनों से मुक्त कर लिया।

दूनिया का चौधरी अमेरिका को लगा कि सोवियत संघ इस इलाके में अपना वर्चस्व कायम कर रहा है, इस वजह से अमेरिका अंदर हीं अंदर सोवियत संघ का विरोध करना शुरू कर दिया।अमेरिका ने पाकिस्तान के कई आतंकी संगठनों को पैसा, हथियार उपलब्ध कराकर अफगानिस्तान में सोवियत सेना के विरुद्ध लडाई में लगा दिया।आतंकियों को पाकिस्तान और चीन में ट्रेनिंग दी जाती थी और फिर उन्हें दूनिया के सबसे आधुनिक हथियार देकर अफगानिस्तान लडाई लड़ने के लिए भेजा जाता था।वर्चस्व की लडाई में पश्चिमी देशों के साथ साथ सऊदी अरब ने भी अपने खजाने का मुँह खोल दिया था।पाकिस्तान के मुजाहिदीन जान लेने और जान देने में बेहद तेज थे ऊपर से चीन की ट्रेनिंग ने उन्हें और खूंखार बना दिया।बताते हैं कि सीआईए की इस मुहिम को बहुत जल्दी हीं सफलता मिलने लगी और मजबूत सोवियत सेना के पांव अफगानिस्तान से उखड़ने लगे थे।एक समय अपराजेय दिखने वाली सोवियत सेना अब पनाह मांगने लगी थी।


सोवियत संघ में सोवियत सेना के रोज मारे जाने का विरोध शुरू हो गया था।एक सरकारी आँकड़े के मुताबिक तकरीबन दस लाख लोग इस युद्ध में मारे गए थे और लाखों लोग घायल थे।सोवियत संघ ने बाद में ये स्वीकार किया था कि अफगानिस्तान युद्ध में उसके पंद्रह हजार सैनिक वीरगति को प्राप्त हुऐ थे।

1987 में भारी दवाब के बीच सोवियत संघ ने अफगानिस्तान से अपनी सेना बुलाने का निर्णय किया।15 मई,1988 में सैनिकों की वापसी शुरू हुई और 15 फरवरी,1989 को आखिरी सैन्य टुकडी की भी अफगानिस्तान से वापसी हो गई।सोवियत सेना नौ साल अफगानिस्तान में रही और बुरी तरह हारकर अपने देश लौटी थी।हजारों टैंक, गाडियां आज भी अफगानिस्तान में पडी हैं जो सोवियत संघ की पराजय की चुगली करती हैं।

सोवियत सेना की वापसी पर अफगानिस्तान के राष्ट्रपति नजीबुल्लाह ने सोवियत सेना और सोवियत संघ की जनता का शुक्रिया अदा किया।नजीबुल्लाह जानते थे कि अब अफगानिस्तान में शासन करना नामुमकिन है मगर वो लडाके थे और वे मुजाहिदीनों से लगातार तीन साल लडे।सोवियत सेना की वापसी के तीन साल बाद 1992 में अफगान मुजाहिदीन ने नजीबुल्लाह को अपदस्थ कर दिया था और बुरहानुद्दीन रब्बानी राष्ट्रपति बने।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने अमेरिका पर आरोप लगाया है कि उन दिनों जब सोवियत के खिलाफ लडाई में अमेरिका ने खुद पाकिस्तान के मुजाहिद्दीनों को जिहाद के नाम पर ट्रेनिंग दी थी।अब लंबी लडाई के बाद उन्हें वहां सफलता नहीं मिला तो हमें दोषी ठहराया जा रहा है, जो पूरी तरह गलत है।हमने इस लडाई में 70,000 लोगों को खो दिया।इमरान खान ने अफसोसजनक लहजे में कहा कि पाकिस्तान को तटस्थ रहना चाहिए था।इस लडाई में हमने 100 बिलियन डाँलर की अर्थव्यवस्था गंवाईं हैं।

आपको बता दें कि डोनाल्ड ट्रंप के पहले सभी राष्ट्रपति पाकिस्तान को आतंकवाद के नाम पर दिल खोलकर सहायता करते थे।पाकिस्तान उनसे आतंकवाद के नाम पर पैसा वसूलता था और अमेरिका के खिलाफ मुजाहिद्दीनों का हीं साथ देता था।अमेरिका के लाख प्रयास के बावजूद अफगानिस्तान में शांति स्थापित नहीं हो पा रही है और ये बात डोनाल्ड ट्रंप को खल गई।ट्रंप ने पाकिस्तान को मिलने वाली सभी सहायता पर रोक लगा दिया है और इस कारण पाकिस्तान दिवालिया होने की कगार पर है।वजीरेआजम पाकिस्तान इमरान खान ने कश्मीर मसले पर डोनाल्ड ट्रंप के साथ न देने से बेहद खफा हैं।

पाकिस्तान तो ये जानता हीं था कि अमेरिका अपना हित पहले देखता है।आज डोनाल्ड ट्रंप की नजर भारतीय बाजार पर है और वे पाकिस्तान से दोस्ती की कीमत पर इसे खोना नहीं चाहेंगे।भारत से दोस्ती अमेरिका के हित में है ये वो अच्छी तरह जानते हैं कि कंगाल पाकिस्तान से कुछ हासिल होने वाला नहीं है।अमेरिका हर हाल में अफगानिस्तान से हटना चाहता है, इस वजह से वो अफगान तालिबान से सम्मानजनक समझौता करने की फिराक में है मगर अमेरिका की हडबडी देखकर तालिबान अपने शर्तों पर समझौता करने पर अडा है।अभी ये वार्ता टूट गई है मगर अब वो दिन दूर नहीं जब अमेरिका चुपचाप अफगानिस्तान से वापस निकल जाएगा जैसे सोवियत संघ वहाँ से चला गया था।

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