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ओ स्त्री तुम मत आना...

Bhola Tiwari Sep 26, 2019, 4:53 PM IST टॉप न्यूज़
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कबीर संजय

ग्रेटा थंबर्ग के नाम से आज दुनिया में लाखों-करोड़ों लोग परिचित हैं। स्वीडेन की इस किशोरी ने पिछले साल दुनिया भर के लोगों का ध्यान तब खींचा था जब धरती को तबाह करने वाले जलवायु संकट के विरोध में यह पंद्रह वर्षीय किशोरी स्वीडेन की संसद के आगे धरने पर बैठ गई थी। आज जब दुनिया के तमाम देशों के प्रतिनिधि अमेरिका में पृथ्वी की तबाही को लेकर घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं, तब भी इस किशोरी के गुस्से भरी आवाज सबसे ज्यादा मुखर है। (हालांकि, इनमें से कुछ ऐसे भी हैं जो घड़ियाली आंसू बहाने को भी तैयार नहीं हैं)

सामाजिक समस्याओं के हल सामूहिक होते हैं। व्यक्तिकेन्द्रित प्रदर्शनों और आंदोलनों की तमाम सीमितताएं हैं। इसके बावजूद ग्रेटा थंबर्ग की आवाज आज उस पीढ़ी की आवाज बनती नजर आती है जिसे आगे की जिंदगी बितानी है। वह हमारी पीढ़ी से सवाल पूछ रही है कि क्या हम उसके लिए कुछ छोड़कर भी जाएंगे। या फिर दुनिया की सारी हवा, सारा पानी, सारी धूप, सारी नदियां, सारे हिमनद यानी सबकुछ को हम समाप्त करके ही दम लेंगे। क्या अगली पीढ़ी को जिंदा रखने के लिए कुछ छोड़ा भी जाएगा। 

मैं सोचता हूं कि अगर यह ग्रेटा हमारे देश में होती तो क्या होता। क्या पता उसके स्कूल का संचालक और धर्म का बड़ा ठेकेदार नंगा होकर उसे मालिश करने के लिए बाध्य कर रहा होता। पहले तो वह बरसों तक इस सदमे से उबरी ही नहीं होती। फिर जब उबर कर उसने उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया होता तो ब्लैकमेलिंग के आरोप में उसे ही जेल भेज दिया जाता। जबकि, नंगा होकर मसाज कराने वाला धर्माधिकारी किसी अस्पताल के आधुनिक कमरे में अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाओं का लाभ उठा रहा होता। 

क्या पता कि ग्रेटा हमारे यहां हुई होती तो किसी विधायक ने उसे नौकरी दिलाने के बहाने अपनी हवस का शिकार बना लिया होता। इसका विरोध जताने पर उसके पूरे परिवार का खात्मा हो गया होता और अगर किस्मत होती तो शायद वह किसी तरह से भयानक हादसे में भी जीवित बच जाती। क्या पता कि उसके माता-पिता ही उसे अपने किसी धर्मगुरू को पेश कर देते। 

यह ग्रेटा हमारे यहां होती तो शायद ही वह अपने शरीर की कैद से आजाद हो पाती। शायद ही कोई घड़ी होती जब उसे यह अहसास नहीं कराया जाता कि उसकी आत्मा ने एक स्त्री शरीर पहना हुआ है। यह स्त्री शरीर ऐसा है जिसे हर किसी से छुपाना है, जिसे हर कोई चुराना चाहता है, नोचना और खसोटना चाहता है। विरोध की कीमत चेहरे पर तेजाब फिंकवाकर, जेल जाकर या फिर अपने परिजनों को खोकर चुकानी पड़ती है। 

संदर्भ दूसरे हैं। लेकिन, एक फिल्म में हर घर की दीवार पर लिखा होता है कि ओ स्त्री कल आना। गौर से देखा जाए तो भारत में हर घर की दीवार पर किसी अदृश्य स्याही से यही लिखा हुआ है---ओ स्त्री तुम मत आना। तभी तो न जाने कितनी स्त्रियों को पैदा होने से पहले ही विदा कर दिया जाता है। फिर जो पैदा होती हैं वे अपने शरीर की कैद से कभी मुक्त नहीं हो पातीं।

उनका व्यक्तित्व नहीं बल्कि शरीर ही मुखर हो पाता है। वो स्त्री भी खुद को पुरुष की नजरों से देखने को मजबूर होती हैं। 

क्या हम ग्रेटा जैसी किशोरी के भारतीय होने के बारे में सोच भी सकते हैं, जो अपने शरीर की कैद से मुक्त है। एक इंसान के तौर पर वह पूरी पृथ्वी के नष्ट होने की लड़ाई लड़ रही है। 

(तस्वीर सोलह वर्षीय पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थंबर्ग की है और इंटरनेट से साभार ली गई है।)

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