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विपत्तियों के सामने सब नतमस्तक होते हैं

Bhola Tiwari Sep 22, 2019, 5:46 AM IST टॉप न्यूज़
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गंगा की बाढ़ (1971) पर विश्वनाथ उपाध्याय, पूर्व सुपरिन्टेन्डिंग इंजीनियर, सिंचाई विभाग, उत्तर प्रदेश, ग्राम/पोस्ट नैनीजोर, प्रखंड ब्रह्मपुर, जिला बक्सर से मेरी बातचीत का अंश.


 दिनेश मिश्रा

1971 में हमारे यहाँ बाढ़ और बारिश दोनों एक साथ थीं। जुलाई का दूसरा पखवाड़ा रहा होगा.मुझे उत्तर प्रदेश में सिंचाई विभाग में नौकरी मिल गई थी और वहाँ ज्वाइन करने जाना था. घर पर ही नाव आकर लगी जिसमें कुछ महिलाएं और पुरुष पहले से ही बैठे थे. नौकरी ज्वाइन करने से पहले मुझे डी. एम. से एक चारित्रिक प्रमाणपत्र लेना था सो जिला मुख्यालय आरा जाना जरूरी था. कमर भर से कम पानी कहीं नहीं था और हमारा घर तो गंगा के दियारे में ही था. घर से 14-15 किलोमीटर जाने के बाद ब्रह्मपुर में सड़क मिलती और उसके बाद की यात्रा बस से तय करनी थी. मौसम की हालत अच्छी नहीं थी. पानी में डूबे हुए पेड़ों के बीच से ही नाव को ले जाना था. गनीमत इतनी ही थी कि मल्लाहों को यह रास्ता मालुम था. धीरे-धीरे हम आगे बढ़ रहे थे और बस इतना ही पता लगता था कि नाव गंगा की मुख्य धारा के पास से गुज़र रही थी. 

इसी बीच एक बबूल के पेड़ से सरकता हुआ एक साँप हमारी नाव में आ गिरा. नाव में 2 -3 मल्लाहों के अलावा 7-8 लोग और रहे होंगें. साँप नाव में आ तो गया पर चुप चाप एक कोने में जाकर बैठ गया. नाव में हम लोगों के बीच दहशत जरूर थी. नाव में भी नीचे से थोड़ा-थोड़ा पानी रिस रहा था और मल्लाह उसे उलीच रहे थे. एहतियात इतना ही रखना था कि उलीचने का असर साँप पर किसी तरह न पड़े. बारिश हो ही रही थी. 

साँप के एक कोना सम्हालने के बाद सभी लोग दूसरे कोने में आ गए जिससे नाविकों को दिक्कत हो रही थी पर कोई चारा नहीं था. हमारी यात्रा 6-7 घंटे में पूरी होने वाली थी और तब तक तनाव बना ही रहने वाला था.

 नाव में जो औरतें बैठी थीं उनमें से एक गर्भवती थी. और उसे प्रसव होने वाला था. जब हम लोगों ने आधी दूरी तय कर ली तब उसे दर्द उठा. नाव में जो बाकी औरतें थीं उन्होनें जो भी कपड़ा-साड़ी वगैरह उनके पास था उससे पर्दा तैयार किया और नाव में ही उस महिला को बच्चा हो गया. साँप कोने में दुबका हुआ था महिलाएं परदे में थीं और बाकी लोग आसमान ताक रहे थे. नाल काटने का जुगाड़ मल्लाहों ने अपने पास के उस्तरे या छुरी से किया. यह सब करते हुए 7 घंटे की यात्रा पूरी करके हम लोग ब्रह्मपुर पहुंचे. 

जिस औरत को बच्चा हुआ था उसको और बच्चे को लेकर महिलाएं भी जैसे-तैसे उतरीं. मुझे बस मिल गई तो मैं आरा के लिए रवाना हो गया और उन महिलाओं मल्लाहों और साँप का क्या हुआ मुझे नहीं मालुम पर यह यात्रा मेरे लिए अविस्मरणीय बन गई. मुझे लगता है कि मेरे साथ तो जीवन में यह एक बार हुआ भले ही मैं खुद दियारे का रहने वाला हूँ पर जो लोग बाढ़ के समय ऎसी जगहों में रहते हैं उन पर तो इस तरह की आपातस्थिति हर साल होती ही है.

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