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स्वत्रंत रियासत "हैदराबाद" का भारत में विलय आसान न था

Bhola Tiwari Sep 18, 2019, 11:47 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जन्मदिन पर गुजरात के केवडिया में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का फैसला सरदार पटेल की प्रेरणा से हीं संभव हो पाया है। उन्होंने कहा कि आजादी के दौरान जो काम अधूरे रह गए थे, उन्हें आज पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है। सरदार पटेल की प्रेरणा से हीं हमने दशकों पूरानी समस्या के समाधान के लिए नए रास्ते पर चलने का फैसला किया। "एक भारत,.श्रेष्ठ भारत" का सपना जो सरदार पटेल ने देखा था, वो साकार हो रहा है। उन्होंने हैदराबाद के मुक्ति दिवस का भी जिक्र किया और कहा कि अगर सरदार पटेल जी की वह दूरदर्शिता तब नहीं रही होती तो आज भारत का नक्शा कैसा होता और भारत की समस्याएं कितनी अधिक होतीं। साल 1948 में आज के दिन हीं हैदराबाद का भारत में विलय करवाया गया था।

उन दिनों संपन्न और खुशहाल हैदराबाद स्वंत्रत रियासत था।.हैदराबाद का क्षेत्रफल इंग्लैंड और स्काटलैंड के कुल क्षेत्रफल से बडा था। हैदराबाद में शासन तो मुस्लिम निजाम का था मगर वहाँ की 85% जनता हिंदू थी। साल 1941 की जनगणना के अनुसार यहाँ की जनसंख्या एक करोड साठ लाख के करीब थी और हैदराबाद रियासत का क्षेत्रफल दो लाख चौदह हजार वर्ग किलोमीटर था।

हैदराबाद दक्कन पर मुसलमानों की हुकूमत की शुरुआत दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में हुई थी लेकिन साल 1347 में उन्होंने बगावत करके बहमनी सल्लतन की नींव रखी।दक्कन के अंतिम शासक मीर उस्मान का संबंध आसिफ जाही घराने से था।

साल 1947 में बंटवारे के समय ब्रिटिश राज में स्थित छोटी बडी रियासतों को ये आजादी दी गई थी कि वे चाहें तो भारत या पाकिस्तान में से किसी के साथ अपना विलय कर लें।शातिर शासक मीर उस्मान अली खाँ ने भांप लिया था कि पाकिस्तान के साथ विलय करके 85% हिंदुओं की भावनाओं को अब आहत नहीं किया जा सकता।वहाँ भी अंग्रेजों के साथ निजाम शासन का विरोध शुरू हो गया था।अधिकांश हिंदू जनता दोनों से आजादी चाहती थी।निजाम ने ये फैसला लिया कि वह भारत और पाकिस्तान दोनों राष्ट्रों के साथ अपनी रियासत का विलय नहीं करेगा,बल्कि ब्रिटिश राष्ट्र के अंदर एक स्वायत्त रियासत के रूप में रहेगा। हैदराबाद के अलावा कश्मीर और जूनागढ़ ने भी अंग्रेजी शासन के अधीन स्वत्रंत रियासत रखने का फैसला किया था।

भारत के गृहमंत्री ने हैदराबाद के निजाम को ये कह दिया कि किसी भी सूरत में आपको हैदराबाद भारत में विलय करना होगा। सरदार पटेल के इस फरमान से हैदराबाद में रोष फैल गया और जगह जगह भारत विरोधी प्रर्दशन होने लगे थे। निजाम हैदराबाद ने पाकिस्तान के शासक मोहम्मद अली जिन्ना से संपर्क किया और पूछा कि अगर भारत के साथ हैदराबाद युद्ध करता है तो क्या आप हमारा साथ देंगे? कुलदीप नैयर ने अपनी किताब में इस बात का बखूबी जिक्र किया है। किताब के अनुसार जिन्ना ने कहा था कि वो मुठ्ठी भर आभिजात्य वर्ग के लोगों के लिए पाकिस्तान के अस्तित्व को खतरे में नहीं डालना चाहेंगे। पाकिस्तान के इंकार के बाद निजाम के पास बहुत अधिक विकल्प नहीं बचे थे।

गृहमंत्री पटेल ने लार्ड माउंटबेटन से संपर्क किया और कहा कि हैदराबाद की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि उसे हर हाल में भारत में शामिल किया जाएगा।लार्ड माउंटबेटन ने नेहरू और पटेल दोनों को चिठ्ठी लिखकर कहा कि इस मसले का शांतिपूर्ण समाधान होना चाहिए।

सरदार पटेल का मानना था कि उस समय हैदराबाद भारत के पेट में कैंसर के समान था,जिसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता था। उन्हें एक और सूचना ने बेहद क्रोधित कर दिया था वो ये कि हैदराबाद पाकिस्तान के कहने पर पुर्तगाल के साथ समझौता करने की फिराक में था।.जिसके तहत हैदराबाद गोवा में बंदरगाह बनाएगा और जरूरत पडने पर वो इसका इस्तेमाल करेगा।

हैदराबाद रियासत के सभी बडे पदों पर मुसलमानों का कब्जा था और वे किसी भी सूरत में भारत में विलय नहीं चाहते थे।.उन्हें अंदेशा था कि हिंदू राष्ट्र भारत में उनकी वो कद्र नहीं होगी जो वो चाहते हैं।निजाम को युद्ध के लिए भडकाया जाने लगा,मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन के पास उस वक्त बीस हजार रजाकार थे जो निजाम के लिए काम करते थे और वे हैदराबाद का विलय पाकिस्तान में करवाना चाहते थे या स्वत्रंत रहना चाहते थे।.रजाकार एक नीजि सेना थी जो निजाम के शासन को बनाए रखने के लिए थी।रजाकारों ने निजाम को ये आश्वस्त कर दिया था कि वे उनके लिए लड मरेंगे।

भारत ने विलय की मियाद तय कर रखी थी जिसके बीतने के बाद "आँपरेशन पोलो" के तहत भारतीय सेना ने 13 सितंबर,1948 को हैदराबाद पर पाँच तरफ से आक्रमण कर दिया।.दो दिनों तक तो हैदराबाद की अप्रशिक्षित सेना ने थोडा बहुत संघर्ष किया मगर 17 सितंबर,1948 को युद्ध के पाँच दिनों बाद निजाम ने युद्ध बंद करने का ऐलान किया।पाँच दिनों तक चली कार्रवाई में 1373 रजाकार मारे गए थे।.हैदराबाद के 807 जवान भी मारे गए।भारतीय सेना ने अपने 66 जवान खोए जबकि 97 जवान घायल हुऐ।

जब भारतीय सेना हैदराबाद में घुसी तो पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने अपनी डिफेंस काउंसिल की बैठक बुलाई और उनसे पूछा कि क्या हैदराबाद में पाकिस्तान कोई एक्शन ले सकता है? बैठक में मौजूद ग्रुप कैप्टन एलवर्दी ने कहा नहीं, किसी भी सूरत में नहीं। दरअसल वे भारत की सैन्य ताकत से परिचित थे। भारतीय सेना ने पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की मृत्यु के दो दिन बाद हीं हैदराबाद पर आक्रमण किया था। ये विशेष रणनीति के तहत था या पूर्व नियोजित,.इसका कहीं जिक्र नहीं मिलता।मुझे लगता है कि हैदराबाद पर आक्रमण का ये सही समय था जब दुश्मन देश अपने संस्थापक की मृत्यु का शोक मना रहा था।

18 सितंबर,1948 को हैदराबाद रियासत की सेना की ओर से भारतीय फौज के सामने हथियार डालने की रस्म हुई। भारत की तरफ से मेजर जनरल जयंतो नाथ चौधरी थे तो हैदराबाद की सेना के कमांडर-इन-चीफ जनरल सैय्यद अहमद अल-इदरोस आमने सामने थे। दोनों ने एक दूसरे का सम्मान करते हुए एक दूसरे को सेल्यूट किया और फिर हाथ मिलाया।मेजर जनरल जयंतो नाथ चौधरी ने कहा मैं आपकी फौज से हथियार डलवाने आया हूँ। जवाब में अल-इदरोस ने धीमे से कहा हम तैयार हैं। फिर जनरल चौधरी ने कहा कि हथियार बिना किसी शर्त पर डलवाए जाएंगे। जनरल इदरोस ने कहा जी हाँ, मालूम है।

इस तरह रस्म पूरी हुई और फिर जनरल चौधरी ने अपने सिगरेट केस से सिगरेट निकाला और एक इदरोस को दिया और दूसरा खुद सुलगाया और दोनों धुआं उडाते हुऐ दो विपरीत दिशा में चले गए।

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