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अब रूस की शरण में पहुँचा तालिबान, वर्चस्व की जंग जारी

Bhola Tiwari Sep 16, 2019, 8:45 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

जब अमेरिका-तालिबान समझौता अपने मुकाम पर पहुँचने वाला था तभी अमेरिका ने शांति वार्ता रद्द करने की घोषणा कर दी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि कोई कैसे एक तरफ वार्ता करता है दूसरी तरफ बेगुनाहों का खून बहाता है।अपनी बात मनवाने के लिए तालिबान इस स्तर पर उतर जाएगा मैं कल्पना भी नहीं कर सकता।

गौरतलब है कि "अफगान तालिबान" अमेरिका को वार्ता में झुकाने के लिए अफगानिस्तान में बेगुनाहों पर हमला कर उसका कत्ल करा देता है,जबकि वार्ता की पहली शर्त ये थी कि वार्ता से पहले तालिबान को खूनी संघर्ष बंद करना होगा।तालिबान ये अच्छी तरह जान गया है कि अमेरिका किसी भी सूरत में अफगानिस्तान छोड़ना चाहता है, इसी वजह से तालिबान अपनी शर्तों पर समझौता करना चाहता है। उसने अमेरिका पर दवाब बनाने के लिए अनेकों आत्मघाती हमले करवाये हैं।

आपको याद होगा यही अमेरिका अफगानिस्तान में सोवियत संघ के खिलाफ लड रहे आतंकियों को गोला बारूद और प्रशिक्षण उपलब्ध कराया था।.उन दिनों अस्थिर अफगानिस्तान में वहाँ की चुनी हुई सरकार के आग्रह पर सोवियत संघ ने आतंकियों से जमकर लोहा लिया था मगर उसके बाद अमेरिका, पाकिस्तान, चीन और सऊदी अरब भी अफगान युद्ध में अपरोक्ष रूप से कूद पडे थे।परिणाम ये हुआ कि सोवियत संघ को अफगानिस्तान से हारकर जाना पडा था।

अभी कुछ हीं दिनों पहले पाकिस्तान के वजीरेआजम इमरान खान ने अमेरिका पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि सोवियत संघ के खिलाफ लडाई में अमेरिका ने पाक के मुजाहिदीनों को ट्रेनिंग दी थी तब वे सही थे,आज जब उन्हें अफगानिस्तान में कामयाबी नहीं मिल रही है तो जिहाद को आतंकवाद कहने लगे हैं। इमरान खान ने यहाँ तक कहा है कि अफगानिस्तान में अमेरिका की उपस्थिति गैरजरूरी है। हमने इस लडाई में अपने 70,000 लोगों को खोया है।

रूस को वो जख्म आज भी याद है शायद उसके जेहन में ये नासूर बन चुभ रहे होंगे। उसकी दिली तमन्ना है कि उसे भी अफगानिस्तान के शांतिवार्ता में शामिल किया जाए,मगर अमेरिका अपने प्रतिद्वंद्वी को इस मसले पर दूर हीं रखना चाहता है।

अमेरिका-तालिबान शांति वार्ता के रद्द होते हीं रूस ने तालिबान को मास्को में वार्ता करने के लिए बुलाया।.तालिबान अपने प्रतिनिधिमंडल के साथ रूसी अधिकारियों के साथ वार्ता भी किया।रूस ने दोनों पक्षों से गुजारिश की है कि दोनों फिर से वार्ता शुरू करें। आपको बता दें ये रूस का आधिकारिक बयान है मगर अंदर कुछ और वार्ता हुई होगी।

रूस तालिबान को इज्ज़त ब़ख्श उन्हें अपने करीब बुलाकर यह दिखाना चाहता है कि वो अमेरिका के बरक्स शांति और अमन के लिए काम कर रहा है जबकि अमेरिका अब भी अफगानिस्तान में जंग करने के लिए तैयार बैठा है। रूस इसके पहले दो बार और तालिबान से बातचीत कर चुका है।रूस अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने ये दिखाना चाहता है कि अब भी वो अफगान समस्या को हल करने में अपनी भूमिका देने को तैयार है।

अमेरिका को अफगानिस्तान से जाने में हडबडी नहीं दिखानी चाहिए, क्योंकि तालिबान ये समझ गया है कि अमेरिका में सैनिकों के अफगानिस्तान में मरने का विरोध शुरू हो गया है, इस.वजह से वह अपनी शर्तों पर समझौता चाहता है जो दक्षिण एशिया के लिए घातक सिद्द हो सकता है।मित्र देशों ने भी अमेरिका से अनुरोध किया है कि वे जल्दबाजी में कोई निर्णय न लें।

18 साल अफगानिस्तान में लडाई कर अमेरिका ये अच्छी तरह समझ गया है कि युद्ध से ये समस्या हल नहीं होगी और ये सही भी है।एक अच्छा समझौता अफगानिस्तान में अमन और चैन बहाल कर सकता है ये अमेरिका समझ गया है मगर जल्दीबाजी में उसे तालिबान के नाजायज मांगों को नहीं मानना है।अफगानिस्तान में अगर तालिबान सरकार में शामिल होता है तो ये सबसे बेहतर इलाज होगा और इसी प्रयास में अमेरिका लगा हुआ है।

कहने को तो आज अफगानिस्तान में चुनी हुई सरकार है मगर ये आँखों का धोखा है।वास्तविक शक्ति तालिबान के पास है और वो अमेरिका के आक्रमकता के कारण बहुत हद तक शांत हैं,जिस दिन मित्र देशों की सेना अफगानिस्तान छोडकर चलीं जाएंगीं,तालिबान को शासन-सत्ता पर काबिज होने के लिए 24 घंटे से भी कम समय लगेगा।

तालिबान को भी ये सोचना होगा कि ये खून-खराबा कब तक चलेगा?अल्लाह की बक्शी एक जिंदगी क्या केवल जेहाद और कत्ल करने के लिए है?पवित्र कुरान की आड में ये खूनखराबा कहाँ तक जायज है सोचना और मनन करना होगा।आज जब दूनिया चाँद पर जा रही है उस युग में मध्यकालीन कानूनों को लागू करना आपकी घृणित मानसिकता को हीं दर्शाता है।

मेरे ख्याल से रूस को इस मामले में दूर हीं रहना चाहिए क्योंकि अब इस समस्या से छेडछाड ठीक नहीं है वो भी जब अमेरिका समझौते के बिल्कुल करीब पहुंच गया है।

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