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क्या फ़र्क पड़ेगा अगर आप 14 सितम्बर को 'हिंदी दिवस' नहीं मनाएंगे?

Bhola Tiwari Sep 14, 2019, 9:49 PM IST टॉप न्यूज़
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रुपेश कश्यप

(Poet I Lyricist I Script-Writer I Filmmaker I Adman)

आप कह सक सकते हैं घंटा, ज़ीरो, शून्य, अंडा आदि-आदि.…. मगर सरकारी संस्थानों में 'हिंदी पखवाड़ा' मनाते लोगों को इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आपको क्या फ़र्क पड़ता है. इसलिए वो आज 'हिंदी दिवस' मानते हैं और इस तरह 14 सितम्बर के बाद 'हिंदी पखवाड़ा' बस पिछवाड़े चला जाता है. कुछ बहस करते हैं कि 'हिंदी' हमारी 'मातृ-भाषा है' और कुछ कहते हैं कि हिंदी हमारी 'मात्र भाषा' है और whatsapp पर जल्दी फॉरवर्ड करने की होड़ मचा देते हैं. कुछ साहित्यकार टाइप लोग आज के दिन आंसू बहाते हैं.… इतना आंसू कि घड़ियाल घबरा कर पूछता है "अबे, सब तुम बहा दोगे, तो हम क्या बहायेंगे?" आज के ही शुभ दिन कुछ लोग 'अंग्रेजी' के खिलाफ़ नारे लगाते हैं. जब कि हिंदुस्तान में 'अंग्रेजी' उनकी रोज़ लगाती है.… ज़ाहिर है, खुन्नस निकालने का इससे बेहतर दिन भला और क्या हो सकता है. 

हिंदी के विकास पर कई सम्मेलन और गोष्टी होने का रिवाज़ भी आज ही के दिन है. आज के ही दिन सरकारी ख़र्चे पर लोग दूर-दूर से शॉल और टोपी पहनने आते हैं और फिर बाद में हिंदी के नाम पर दुनिया को टोपी और शॉल पहनाते हैं.… आज के ही दिन सरकारी ख़र्चे पर छप्पन प्रकार का व्यंजन खाने का चाल-चलन है. आज छोटे शहरों के सरकारी स्कूलों में 'हिंदी' पर निबंध या essay कम्पटीशन का भी फंक्शन होता हैं. शहरों के स्कूलों में इतना लोड कोई टीचर या प्रिंसिपल नहीं लेता. थैंक गॉड! नहीं तो, ख़्वाह-मा-ख़्वाह 'स्पेलिंग बी' कम्पटीशन में 'हिंदी' को भी शामिल करना पड़ता. आज के बड़े स्कूलों के टीचर्स ने millenials विद्यार्थिओं को पढ़ाया है कि हिंदी एक ऐसी भाषा है जो बोली जाती है और roman में लिखी जाती है. कुछ SEC A क्लास के पेरेंट्स और बच्चे, हिंदी को नौैकरों से संपर्क की भाषा भी समझते हैं. शायद इसलिए डाउन मार्केट सी लगती है. आज millenials के पैरेन्ट्स को पता है कि 'हिंदी' subject पढ़ने से आगे बढ़ने का चांस कुछ ख़ास है नहीं तो इत्ता effort क्यों मारना. 

कुछ अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोग आपको आपकी भाषा, उच्चारण, ग्रामर, स्पेलिंग के बिना पर जज करते हैं मगर अफ़सोस हिंदी में ऐसा किलर कल्चर नहीं है. अब हिंदी की मात्रा, व्याकरण, उच्चारण आदि के चक्कर में कोई नहीं पड़ता. अशुद्ध लिखा है तो लिखा है. इसमें तौहीन वाली क्या बात है. हिंदी में लिखने-बोलने वालों को भी इस बात से कोई गुरेज नहीं होता. उल्टा वो हँसते हैं.... "अब बस यही काम रह गया है हमारा?" और जो मात्रा, व्याकरण, उच्चारण आदि को तवज्जो देता है उसे ज़्यादा 'इज़्ज़त' की निगाह से नहीं देखने का एक पॉपुलर फैशन है हमारे देश में. ये 'हिंदी दिवस' की ख़ासम-ख़ास उपलब्धि है.

तो जैसा कि ज़ाहिर है, आप जान गए होंगे, आज 'हिंदी दिवस' है. यह 'Cow belt' में बोली जाने वाली एक ऐसी भाषा है जो अंग्रेजी की तरह ग्लोकुल (Global+cool) नहीं है. ऐसा 'Ox belt' (pun intended) में रहने वाले लोग मानते हैं. इंडिया कॉरपोरेट्स में ऐसी परंपरा है कि 'हिंदी' मीडियम से पढ़े छात्र-छात्राओं में वो aura नहीं होता है जो कि आम तौर पर smart होने के लिए ज़रूरी होता है. इसलिए नौकरी में promote होने की सम्भावना भी कम ही होती है.  

हमारे यहाँ ऐसे सवाल नहीं पूछे जाते - "किस सरकारी संस्थान ने हिंदी fonts के नए डिज़ाइन पर कितना ख़र्च किया है?" या "अपने धंधे के लिए हिंदी के फ़ॉन्ट्स यूज़ करने वाले लोगों ने क्या सचमुच फ़ॉन्ट्स के लाइसेंस खरीदें हैं या यूँ ही काम चला रहे हैं?" अलबत्ता हमारे यहाँ पूछा जाता है "अगर अंग्रेजी के फ़ॉन्ट्स मुफ़्त में आते हैं तो हिंदी के क्यों नहीं?" ऐसी मामूली बात पर हमारे यूनिवर्सिटीज के हिंदी प्रोफेसरों और लेक्चररों को ज़ोर से हंसी आती है पर वो मुंह दबा कर हँसते हैं. दरअसल, हिंदी पर मुंह दबा कर हंसना एक healthy हैबिट कंसीडर किया जाता है.  

मतलब बाज़ार और रोज़गार की भाषा नहीं है 'हिंदी'! मगर, फिर भी बड़ी तेज़ी से फैल रही है. आखिर कैसे? आखिर कैसे, तमाम brands, अपनी मार्केटिंग और एडवरटाइजिंग campaigns हिंदी में करते हैं? आखिर, ऐसा कैसे हुआ कि ज़्यादातर स्टार्ट-अप के लांच ads हिंदी में आते हैं. मास-मीडिया को अगर देखें तो आज हिंदी में छपने वाले अखबारों की संख्या बढ़ी है. रेडियो, टीवी और सिनेमा में हर जगह हिंदी ही हिंदी सुनाई दे रही है. फाइव स्टार्स के किसी पब या डिस्कोथेक में किसी हिंदी गाने या रीमिक्स पर youth अपनी टाँगे और दिल धड़का रहे हैं. सोशल मीडिया पर भी हिंदी अपने 'रोमन' अंदाज़ में मौज़ूद है. आखिर कैसे नए-नए पब्लिशर और उभरते हुए हिंदी के नए राइटर नए प्रयोग कर रहे हैं और छाप रहे हैं? हिंदी में लिखे हुए कई ऐसे ब्लॉग्स हैं जिनकी कमाल की fan follwoing है. ये सब कैसे हुआ? इंटरनेट की बड़ी कम्पनियां हर दिन कुछ न कुछ ऐसा प्रयोग कर रही हैं ताकि हिंदी को कंप्यूटर पर, मोबाइल पर, पैड्स पर टाइप करना आसान हो जाए. सबसे कमाल की बात है कि ऐसे कई जगहों पर 'हिंदी दिवस' नहीं मनाया जाता. 

बहरहाल, सवाल ये है कि हम जिस तरह 'हिंदी दिवस' मनाते हैं क्या अब उस तरह ही हमें मनाना चाहिए? सोच लीजिये और सोचने में तकलीफ हो रही है तो कुछ हिंदी के नए -पुराने लेखकों की किताबें खरीद के पढ़ लीजिये. अपनी भाषा में सोचना थोड़ा और आसान हो जाएगा. फिर आप ये रस्मों-रिवाज़ों की दुनिया, संस्कारों के नाम पर अंधकारों की दुनिया से बहार निकल कर कहेंगे "नहीं हमें एक रोज़ नहीं, हर रोज़ मनाना है हिंदी दिवस!" और, यही बात मैं हर भारतीय भाषाओं से भी कहता हूँ. ये भाषाओँ की लड़ाई नहीं है, ये भाषाओं के मिलजुल का वक़्त है जो हमारे विचारों और भावनाओं को ऐसे व्यक्त करे कि सीधे दिल में उतर जाए. 

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