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"वर्साय की संधि" का दुष्परिणाम था "द्वितीय विश्वयुद्ध"

Bhola Tiwari Sep 11, 2019, 9:32 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

बिस्मार्क के चांसलर बनने के बाद जर्मनी बेहद शक्तिशाली हो गया था उसके नेतृत्व में जर्मनी का एकीकरण हुआ।एकीकरण के पश्चात बिस्मार्क ने जर्मनी को प्रभावशाली बनाने के लिए तथा फ्रांस को यूरोप की राजनीति में मित्र विहीन बनाए रखने के लिए गुप्त संधियों की नीति अपनाई।ताकतवर जर्मनी ने आस्ट्रिया-हंगरी के साथ और रूस के साथ मैत्री संधि की।इंग्लैंड के साथ उसने मैत्रीपूर्ण संबंध को और पुख्ता किया।1882 में बिस्मार्क ने इटली के साथ भी संधि करके संपूर्ण यूरोप में अपनी ताकत का ऐहसास करवा दिया।

जर्मनी और फ्रांस की पुरानी शत्रुता थी मगर जब बिस्मार्क जर्मनी का चांसलर बना तो उसके एजेंडे में फ्रांस का धनी प्रदेश अल्सेस-लौरेन को कब्जा करना था और ताकतवर बिस्मार्क ने इसे बखूबी अंजाम भी दिया।उन दिनों अल्सेस-लौरेन फ्रांस का सबसे धनी एंव विकासशील प्रदेश था।जर्मनी लगातार फ्रांस को नीचा दिखाने का काम कर रहा था आजिज आकर फ्रांस ने भी अपने मित्र राष्ट्रों का गुट बना लिया।प्रथम विश्वयुद्ध के समय दोनों में इतनी शत्रुता बढी की युद्ध अवश्यंभावी हो गया।


प्रथम विश्वयुद्ध के अनेक कारणों में साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा भी एक महत्वपूर्ण कारण बना।औद्योगिक क्रांति के पश्चात कल-कारखानों को चलाने के लिए कच्चे माल की आवश्यकता पडी।सभी मजबूत राष्ट्र जैसे इंग्लैंड, फ्रांस, रूस ने एशिया और अफ्रीका में अपने अपने उपनिवेश बनाकर उसपर अधिकार कर लिये थे।जर्मनी को जब कच्चे माल की आवश्यकता महसूस हुई तो हर जगह इंग्लैंड, फ्रांस और रूस का कब्जा दिखा।फ्रांस ने इन शक्तिशाली राष्ट्रों के उपनिवेशवाद का कडा विरोध करना शुरू कर दिया, ये भी विश्वयुद्ध का एक महत्वपूर्ण कारण बना।

सैन्यवाद भी प्रथम विश्वयुद्ध का एक महत्वपूर्ण कारक बना।सभी देश अपनी सेना को मजबूत बनाना शुरू कर दिया था।हथियार खरीदने की होड लगी रहती थी।कहते हैं कि उन दिनों फ्रांस और जर्मनी अपनी राष्ट्रीय आय का 85% सैन्य व्यवस्था पर खर्च करते थे।जो उपनिवेश उन्होंने बनाए थे उसपर हमेशा बाहरी कब्जे की आशंका बनी रहती थी।उस उपनिवेश की सैन्य ताकत पर बडी राशि खर्च करनी पड़ती थी।

उग्र एंव विकृत राष्ट्रवाद भी युद्ध का एक महत्वपूर्ण कारण बना।उन दिनों कोई अंतरराष्ट्रीय संस्था नहीं थी जो उनके मनमानी पर अंकुश लगाती।उन दिनों ऐसा माहौल बन गया था कि जनमत और समाचारपत्र युद्ध की हीं बातें करते थे।विस्तारवाद का भूत सरचढ़ बोल रहा था, समाचारपत्रों में युद्ध से संबंधित लेखों की बाढ थी।छद्म राष्ट्रवाद बुरी तरह हावी था।

प्रथम विश्वयुद्ध के शुरू होने में आग में घी का काम किया आस्ट्रियाई राजकुमार फर्निंनेंड की हत्या।28 जून 1914 को एक भीडभाड भरे समारोह में सर्विया का एक लडका जिसकी उम्र मात्र 19 साल की थी राजकुमार फर्निंनेंड की गोली मारकर हत्या कर देता है।यद्यपि गुप्तचर को इसकी सूचना मिल चुकी थी फिर भी राजकुमार जिद्द करके उस समारोह में गए।राजकुमार की मौत के 25 दिनों बाद ही आस्ट्रिया ने सर्विया पर युद्ध की घोषणा कर दी।धीरे धीरे पृथ्वी के आधे राष्ट्र इसमें सम्मलित हो गए।

प्रथम विश्वयुद्ध 1914 से 1919 के मध्य यूरोप, एशिया और अफ्रीका तीन महाद्वीपों के जल,थल और आकाश में लडा गया।आपार जन-धन की हानि हुई और तकरीबन एक करोड़ लोग मौत के मुँह में समा गए।

इस युद्ध में मित्र देशों(ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका, रूस)के हाथों जर्मनी की बहुत बुरी हार हुई और 28 जून 2019 के दिन वर्साय की संधि पर उसे हस्ताक्षर करने पडे थे।युद्ध के परिणामस्वरूप जर्मनी को अपनी भूमि के बडे हिस्से से हाथ धोना पडा था।इस संधि के तहत दूसरे राज्यों पर कब्जा करने की पाबंदी लगा दी गई, उनकी सेना का आकार सीमित कर दिया गया और भारी क्षतिपूर्ति ठोक दी गई।

वर्साय की संधि के प्रावधान इतने अमानवीय थे कि इसे इतिहास की सबसे खराब संधि की भी उपमा दी जाती है मगर हारे हुए जर्मनी के पास कोई चारा नहीं था वह खून के घूंट पीकर रह गए थे।वर्साय संधि का मसौदा पेरिस में तैयार हुआ।यह 230 पृष्ठों में अंकित यह संधि 15 भागों में विभक्त थी और उसमें 440 धाराएँ थीं।06 मई,2019 को यह पेरिस शांति सम्मेलन के सम्मुख पेश हुई और स्वीकृत हो गई।

जर्मनी को हर हाल में संधि पर हस्ताक्षर करने हीं थे और उन्होंने किया भी मगर जर्मनी ने 26 दिनों के भीतर अपनी तरफ से साठ हजार शब्दों का एक विरोधी प्रस्ताव पेश किया।जर्मनी की मुख्य शिकायत ये थी कि उसने जिन शर्तों पर आत्मसमर्पण किया है संधि में कहीं उसका उल्लेख नहीं है।निरस्त्रीकरण के लिए केवल जर्मनी पर दवाब नहीं डालना चाहिए बल्कि सभी राष्ट्रों को इसका सम्मान करना होगा।एक बडे राष्ट्र को कुचलकर तथा उसे गुलाम बनाकर स्थाई शांति स्थापित नहीं की जा सकती।

कुछ साल बाद हीं जर्मनी ने ताकत इकट्ठा कर वर्साय संधि का धीरे धीरे उल्लंघन करना शुरू कर दिया था।जब हिटलर जर्मनी का चांसलर बना तो उसने वर्साय संधि के किसी भी प्रावधान को मानने से इंकार कर दिया और इसी की पृष्ठभूमि में द्वितीय विश्वयुद्ध की नींव पडी।

इतिहास गवाह है कि अगर इस प्रकार की एकतरफा संधि न हुई होती तो शायद शायद द्वितीय विश्वयुद्ध की नींव नहीं पड़ती।

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