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कैसे शहीद हुए नहीं, बताएं क्यों शहीद हुए इमाम हुसैन..

Bhola Tiwari Sep 11, 2019, 6:19 AM IST कॉलमलिस्ट
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 नई दिल्ली : मोहर्रम सिर्फ मातम मनाने के लिए नहीं आता या फिर छाती पीटते हुऐ पट्टों से अपने शरीर को लहूलुहान कर हाय हुसैन हम ना हुऐ बोलने के लिए भी नही आता..

मोहर्रम हमें ये पैगाम देने के लिए आता है कि ज़ालिम बादशाह के सामने हक़ की बात पर कायम रहे, चाहे सर भी तन से जुदा कर दिया जाए..लोगों को ये मत बताइए कि इमाम हुसैन कैसे शहीद हुए बल्कि ये समझाइए क्यों शहीद हुए..

अपने बच्चों को सिर्फ ताजिया मत दिखाइये, उन्हें सिखाइये की ज़ुल्म और ज़ालिम के खिलाफ खड़े होना ही हुसैनियत है..हक़, इंसाफ़ और सच्चाई के लिए लड़ो, जान की क़ुरबानी भी देनी पड़े तो पीछे न हटो और यही कर्बला का सबसे बड़ा सबक है..

हुसैन की शहादत इतिहास में उसी प्रसंग के रूप में अमर हो गई है जैसे ईसा मसीह का क्रूस पर लटकाया जाना..दोनों ही हैवानियत भरी क्रूरता के सामने विलक्षण साहस और आत्मोत्सर्ग की असाधारण भावना के अप्रतिम उदाहरण हैं..

महात्मा गांधी ने हुसैन के बारे में लिखा है - “मैंने हुसैन से सीखा कि उत्पीड़ित होते हुए भी कैसे विजय प्राप्त की जा सकती है।” 

मोहर्रम के दिनों में हुसैन के जीवन से सभी सीख और प्रेरणा ले सकते हैं, चाहे वे किसी भी धर्म को मानने वाले हों..महापुरुषों से प्रेरणा लेने के लिए उन्हीं के धर्म का होना जरूरी नहीं है वरना नेल्सन मंडेला जैसे ईसाई धर्मावलंबी नेता महात्मा गांधी से, महात्मा गांधी हुसैन से, गुरुनानक रविदास से और अंबेडकर महात्मा बुद्ध से प्रेरणा न ले पाते.. इन्सान किसी दूसरे धर्म, समाज या व्यक्ति को गाली देकर नही, उनसे कुछ सीखकर ही महान बनता है..

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