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अमेरिका ने अफगान तालिबान के साथ "शांति समझौता" रद्द किया

Bhola Tiwari Sep 08, 2019, 9:51 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

बहुप्रतीक्षित शांति समझौता जो अमेरिका अफगान तालिबान के साथ कर रहा था वो अब रद्द कर दिया गया है।दरअसल एक तरफ तालिबान अमेरिका से बातचीत कर रहा था दूसरी तरफ अमेरिका को डराकर समझौता करने के लिए अफगानिस्तान में बम धमाकों को अंजाम दिया जा रहा था।दो दिनों पहले काबुल में कार बम धमाका किया गया जिसमें 12 निर्दोष लोगों की मौत हो गई,जिसमें एक अमेरिकी भी था।अफगान तालिबान ने इस बम धमाके की जिम्मेदारी ली है।


तालिबान अमेरिका को अपनी शर्तों पर समझौता करने के लिए मजबूर कर रहा है।यही वजह है कि एक तरफ वो वार्ता कर रहा है दूसरी तरफ बम धमाका।तालिबान का शीर्ष नेतृत्व ये समझ गया है कि अमेरिका किसी भी सूरत में अफगानिस्तान से जाना चाहता है, इस वजह से तालिबान अमेरिका को अपनी शर्तों पर समझौता करने को मजबूर कर रहा है।

एक हफ्ते पहले अफगानिस्तान के लिए विशेष अमेरिकी राजदूत जल्मे खलीलजाद ने तालिबान के साथ सैद्धांतिक तौर पर एक शांति समझौता होने का ऐलान किया था।प्रस्तावित समझौते के तहत अमरीका अगले बीस हफ्तों के भीतर अफगानिस्तान से अपने 5,400 सैनिकों को वापस लेने वाला था।

आपको बता दें अमेरिका और तालिबान के बीच में कतर में नौ दौर की वार्ता हो चुकी है,अमेरिका अपने मिजाज के विपरीत केवल इसलिए समझौता कर रहा था कि उसे अफगानिस्तान से बाहर जाने का मौका मिलेगा।लाख प्रयास के बावजूद वहाँ अमेरिकी सैनिक मारे जा रहें हैं, हर साल करोड़ों डाँलर का निवेश करना पड रहा है जिसका अमेरिका में विरोध होना शुरू हो गया है।एक समय तालिबान को सैनिक और वित्तीय सहायता देनेवाला अमेरिका आज खुद चक्रव्यूह में फंस गया है।


1978 में अफगानिस्तान में तत्कालीन साम्यवादी सरकार ने विद्रोहियों को कुचलने के लिए साम्यवादी सोवियत संघ से मदद मांगी थी।सोवियत संघ ने विद्रोहियों को नेस्तनाबूद करने के लिए अपनी सेना अफगानिस्तान में उतार दिया।शुरुआत में तो सोवियत संघ को सफलता मिली मगर बाद में इस युद्ध में अमेरिका अप्रत्यक्ष रूप से उतर गया।अमेरिका ने तालिबान को तरह तरह के आधुनिक हथियार उपलब्ध कराए,चीन ने तालिबान के लडाकों को अपने देश में प्रशिक्षण दिया।तालिबान की मदद को अरब के कई अमीर देश जैसे सऊदी अरब, इराक आदि ने प्रत्यक्ष एंव अप्रत्यक्ष रूप से पैसे और मुजाहिदीन मुहैया कराए।इस्लामिक देशों में प्रचार किया गया कि सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर नहीं बल्कि इस्लाम पर हमला किया है।अमेरिका और कई अरब देशों के प्रोपेगैंडा में संपूर्ण अरब जगत सोवियत संघ के खिलाफ हो गया।

एक तरफ अकेला सोवियत संघ अफगानिस्तान में विद्रोहियों के साथ लड़ रहा था तो अमेरिका समेत पूरा अरब जगत तालिबान के साथ खडा था।सोवियत संघ की करारी शिकस्त हुई और 1979 में उसे अफगानिस्तान छोड़कर भागना पड़ा था।रास्ते में जगह जगह सोवियत संघ के टैंक, राँकेट लांचर और विभिन्न हथियार बिखरे पड़े थे।

सोवियत संघ के अफगानिस्तान से जाने के बाद तालिबान और अल कायदा ने अपनी जडें मजबूती से जमा लीं।तालिबान प्रमुख मुल्ला उमर और अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन ने अफगानिस्तान को अपना कर्मस्थली बना लिया।धीरे धीरे अफगानिस्तान में और विद्रोही गुटों ने भी सर उठाना शुरू कर दिया था।कुछ दिनों बाद अफगानिस्तान में बुरहानुद्दीन रब्बानी की सरकार को अपदस्थ कर तालिबान ने सत्ता अपने हाथ में ले ली।तालिबान ने पाँच साल अफगानिस्तान में शासन किया जिसमें वहाँ के लोग काफी परेशान हो गए थे।

2001 में अमेरिका ने अफगानिस्तान पर कब्जा कर तालिबान को खदेडा था,मगर आज भी वहाँ के 50% भूमि पर तालिबान का कब्जा है और वहाँ तालिबान का हीं कानून चलता है।तालिबानी हीं ज्यादातर टैक्स वसूलते हैं और जो विरोध करता है उसे जान देकर इसकी कीमत चुकानी पड़ती है।अफीम की खेती पर पूरी तरह तालिबान का वर्चस्व है जिससे हर साल हजारों करोड रूपया वसूला जाता है।

आपको बता दें अफगानिस्तान की सरकार अमेरिका की मेहरबानी पर हीं टिकी है जिस दिन अमेरिका देश छोड़कर चला जाएगा उसी दिन अगर तालिबान चाहे तो सरकार को बेदखल कर सकता है।अमेरिका को चाहिए कि वो कोई ऐसा समझौता न करे जिससे अफगानिस्तान में फिर से तालिबान की सरकार बन सके।व्यापक हितों को देखते हुए हीं अमेरिका को एक सम्मानजनक समझौता करना चाहिए नहीं तो तालिबान संपूर्ण विश्व के लिए "भष्मासुर" साबित होगा इसमें किसी को भी संदेह नहीं है।

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