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नील की खेती का पुनर्जागरण

Bhola Tiwari Sep 07, 2019, 12:23 PM IST टॉप न्यूज़
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■ कभी सत्याग्रह का कारण बना यह पौधा अब पुन: स्वदेशी आंदोलन के तहत.किया जा रहा है प्रचारित 


प्रवीण झा

(जाने-माने चिकित्सक नार्वे)

नील की खेती का पुनर्जागरण हो रहा है। भारत में ही हो रहा है। ऑर्गैनिक रंगों की चाहत में वह कठिन उद्योग फिर से जाग रहा है। लेकिन इसका क्षेत्र शिफ्ट हो गया। जहाँ कभी यह बंगाल-बिहार की पैदाइश थी, अब यह आंध्र-तमिल में उगाई जाती है। और वहीं से सीख कर वापस बिहार के किसान, और उत्तराखंड (पिथौरागढ़) के किसान भी नील उगाने लगे हैं। इन किसानों पर ही एक वृत्तचित्र बना ‘ट्रू ब्लू: नीला राग’। उसे ढूँढ रहा था, लेकिन मात्र ट्रेलर मिला। कुछ रिपोर्ताज़ से गुजरते यही मालूम पड़ा कि इसे खरीफ फसलों के साथ उत्तराखंड में उगाया जा रहा है, क्योंकि बाकी फसल में बंदर उत्पात करते हैं लेकिन नील से नहीं करते। इसलिए दक्खिन से यह खेती सीख कर हिमालय पर उगायी जा रही है, और नील में रंगे शॉल बिकने भी लगे हैं। कमाल की बात है कि कभी सत्याग्रह का कारण बना यह पौधा अब पुन: स्वदेशी आंदोलन के तहत प्रचारित किया जा रहा है। लेकिन, अगर यह इतना ही सुलभ था, तो आखिर यह खेती बंद क्यों हुई? इसका उत्तर पुष्य मित्र की पुस्तक ‘जब नील का दाग़ मिटा’ में है। 

उस वृत्तचित्र के ट्रेलर में भी एक आंध्र के किसान कह रहे हैं, “नील चल गया तो दस वर्ष तक आपका साथ देगा, नहीं चला तो आपको तबाह कर देगा”। 

पता नहीं, इससे उनका क्या अर्थ था? कैसे तबाह कर देगा? और आखिर वह आंध्र का इकलौता परिवार इतने वर्षों तक नील की खेती क्यों करता रहा, जब भारत में यह खेती बंद हो गयी। मैंने चर्चा की है कि उत्तरी नॉर्वे में एक ‘वॉल्ट’ है जहाँ दुनिया भर के बीज बचा कर रखे हैं कि अगर प्रलय आया तो वहाँ सुरक्षित रहेगा। वह इस तरह बना है कि प्रलय में उसका कुछ न बिगड़े। वह ‘वॉल्ट’ समझिए कि नेटफ्लिक्स सीरीज वाला त्रिवेदी है। उसी तरह आंध्र का वह परिवार भी इतने वर्षों तक नील बचा कर रखता रहा कि आज जब रासायनिक रंगों पर ऑर्गैनिक रंग भारी पड़ने लगे, तो नील की खेती फिर से चल पड़ी।

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