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युगांडा के तानाशाह "ईदी अमीन" ने 90,000 "एशियाई मूल" के लोगों को देश निकाला दे दिया था

Bhola Tiwari Sep 03, 2019, 1:16 PM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

09 अक्टूबर 1962,युगांडा को ब्रिटेन से आजादी मिली,वहाँ के अश्वेत लोग जो बहुसंख्यक थे वे बेहद खुश थे मगर एशियाई मूल के लोग बेहद सशंकित थे।उन्हें युगांडा की आजादी बिल्कुल भा नहीं रही थी।19 वीं सदी के आखिर में अंग्रेजों ने पूर्वी अफ्रीका के एक बडे हिस्से पर अपना उपनिवेश कायम कर लिया था।वहाँ के निजाम को चलाने के लिए अंग्रेजों को ऐसे लोग चाहिए थे जो उनके रहन सहन को जानें और अफ्रीकी लोगों से संवाद का जरिया बनें।उन दिनों पूर्वी अफ्रीका में अंग्रेजी बोलने वाले अंगुली पर गिने जाते थे।

ब्रिटिश हुकूमत ने भारतीय मूल के बहुत सारे लोगों को युगांडा में बसाया।शुरुआत में तो एशियायी लोगों ने युगांडा के मूल निवासियों से अच्छा व्यवहार किया मगर बाद में वे अहंकारी हो गए।अंग्रेजों के मदद से उन्होंने अपना कारोबार शुरू किया और कुछ हीं दिनों में वे वहाँ के सफल व्यवसायी बन बैठे।भारतीय मूल के लोगों ने युगांडा में अपनी बस्ती बसा ली,अपने बच्चों के लिए अलग स्कूल बना लिया।धीरे धीरे वे वहाँ के मूल निवासियों से अलग थलग पड़ गए।विस्तारवादी ब्रिटिश हुकूमत के हुक्मरान को इतनी फुरसत नहीं थी कि वे दोनों समुदाय में फैले असंतोष का भांप पाएं।भारतीयों का दबदबा इस कदर था कि कंपाला जो युगांडा की राजधानी थी,शाम के वक्त जब एशियाई समूदाय के लोग बाहर टहलने के लिए निकलते थे तो उस समय उन्हें बाहर घुमने की मनाही होती थी।एशियायी मूल के लोग "ब्राउन साहब" कहलाते थे और पिक्चर हाँल में सिर्फ भारतीय पिक्चर हीं लगाई जाती थी।अफ्रीकी समुदाय और एशियाई मूल के लोगों के बीच खा

आजादी के बाद मिल्टन ओबेटो युगांडा के पहले प्रधानमंत्री बने और एडवर्ड मोटेसा को राष्ट्रपति बनाया गया।

आजादी के चार साल बाद हीं प्रधानमंत्री ओबेटो ने राष्ट्रपति को पद से हटाकर सत्ता की चाभी अपने हाथ में रख ली थी।उस समय तक सबकुछ ठीक था।आर्थिक हालात भी कुछ हद तक सुधरे थे।उस समय युगांडा में अगर किसी के पास पूंजी थी तो वो भारतीय या यूरोपीय मूल के समुदाय के पास थी।आजादी के बाद से हीं दोनों समुदायों के हित टकराने लगे थे।हालात से निपटने के लिए ओबेटो की सरकार ने आर्थिक विकेन्द्रीकरण की नीति अपनाई।नतीजा ये हुआ कि जिस संपत्ति और कारोबार पर भारतीय मूल के लोगों का एकाधिकार था,उस पर अचानक अफ्रीकी कब्जा करने लगे।

ओबेटो युगांडा में अलोकप्रिय होने लगे थें और उसने ये जान लिया था कि कभी भी उनपर हमला हो सकता है।ओबेटो ने अपने विश्वासपात्र जनरल ईदी अमीन को सेनाध्यक्ष नियुक्त कर तानाशाही हुकूमत चलाने की कोशिश शुरू कर दी।

1971 ओबेटो के सबसे विश्वस्त सेनाध्यक्ष ईदी अमीन ने ओबेटो का तख्ता पलट उस समय कर दिया जब वे राष्ट्र मंडल की बैठक में शामिल होने सिंगापुर गए थे।ईदी अमीन ने तख्तापलट बेहद शांतिपूर्ण ढंग से किया।पश्चिमी देश जो ओबेटो के साम्यवादी रूस के करीब जाने से परेशान था,अमीन को हाथों हाथ लिया।ब्रिटेन ने अमीन का स्वागत बर्किघम पैलेस में किया मगर ईदी अमीन ने कुछ और करने का ठान लिया था।जल्द हीं उसकी नीति से पश्चिमी देशों में निराशा फैल गई।

ईदी अमीन ने ओबेटो की नीति को आगे बढाते हुऐ एक विस्फोटक घोषणा कर दी,अमीन ने एशियायी समुदाय पर देश के लोगों के शोषण का आरोप लगाते हुए उनके देश निकाले का एलान किया।उस समय 90,000 एशियायी लोग युगांडा में थे और उनमें 20,000 लोगों के पास ब्रिटिश पासपोर्ट था।तकरीबन 10,000 लोग भारत वापस आए और भारत ने उन्हें संरक्षण दिया था।

असम में एनआरसी की अंतिम लिस्ट घोषित हो चुकी है जिसमें 19,00,000 लाख लोगों का नाम नहीं है।क्या वे युगांडा की तरह देशनिकाला किये जाएंगे और अगर बांग्लादेश ने इन्हें अपना नागरिक मानने से इंकार किया तो वे कहाँ जाएंगे?क्या उनकी स्थिति रोहंगियों की तरह होगी जिसका कोई देश नहीं होगा।ये बहुत से प्रश्न अनुत्तरित हैं जिसका जवाब शायद किसी के पास नहीं है।

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