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लीलापुरुषोत्तम भगवान ‘श्रीकृष्ण’

Bhola Tiwari Aug 24, 2019, 6:48 AM IST टॉप न्यूज़
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 नीरज कृष्ण

अन्याय सहकर बैठ रहना यह महादुष्कर्म है।

न्यायार्थ अपने बन्धुओं को दण्ड देना धर्म है। ..... मेथिलीशरण गुप्त 

भारत एक धर्मप्राण देश है। भारतीय संस्कृति के प्रत्यक्ष रूप हैं, श्रीराम एवं श्रीकृष्ण। श्रीराम एवं श्रीकृष्ण इसके स्पन्दन हैं। श्रीराम मर्यादापुरुषोत्तम हैं तो श्रीकृष्ण लीलापुरुषोत्तम। भारतीय अवतारी पुरुषो की समृद्ध परम्परा में मर्यादापुरुषोत्तम राम के साथ ही जो महापुरुष चन्दन-चर्चित होते रहे हैं वे हैं योगीश्वर कृष्ण। उन्होंने 'जन्म कर्म च मे दिव्यम्' का जो उद्घोष किया था, वह अक्षरशः सत्य है। 

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।

देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥ 

भारतीय साहित्य में श्रीकृष्ण शौर्य, ज्ञान, सौन्दर्य, प्रेम एवं आनन्द के पर्याय माने जाते हैं। सर्वप्रथम वैदिक साहित्य ‘ऋग्वेद’ एवं ‘अथर्ववेद’ में श्रीकृष्ण का विवरण मिलता है। छान्दोग्योपनिषद् में श्रीकृष्ण का देवकी-पुत्र के रूप में वर्णन है।

कृष्ण के जन्म ने नन्द को खुशियों का वरदान दिया, वसुदेव को पुत्री वियोग का दुःख दिया तथा कंस को आश्चर्य और भय के चक्कर में डाल दिया। कृष्ण का लालन-पालन बड़े ही दुलार से हुआ। माता यशोदा बालक कृष्ण के नटखटपन को देख सदा मोद मनाती रहीं।

जब बालक श्रीकृष्ण कुछ बड़े हुए तो वे अपने साथियों- गोप-ग्वालों के साथ गाय चराने यमुना-तट जाने लगे। उनके साथ उनका व्यवहार इतना मृदुल था कि सभी उनके दास बने रहते थे। जब वे वंशी बजाने लगते तो गोपांगनाएँ सुध-बुध खो बैठती थीं। उनकी स्वर-माधुरी की आकर्षण-डोर में वे अपना सारा काम-काज बिसारकर खिची-खिंची चली आती थीं। अस्त-व्यस्त अवस्था में ही गोपियाँ श्रीकृष्ण से मिलने को बेताब हो जाती थीं। वेद व्यास ने तो भागवत में मोहन के वंशीवादन के मोहक प्रभाव का सविस्तर वर्णन किया है। मनुष्य तो मनुष्य, पशु-पक्षी, नदी-पर्वत तक वंशी की तान से वशीभूत हो जाते थे।

युद्धस्व विगतज्वरः - गीता

[ सारी चिन्ताओं को छोड़कर युद्ध करो ]  

महाभारत में श्रीकृष्ण की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका है। पद–पद पर श्रीकृष्ण की नीतिज्ञता, सर्व शक्ति सम्पन्नता एवं भगवत्ता के अद्भुत समन्वय के दर्शन होते हैं। वे ब्रह्म एवं विष्ण के अवतार माने गये हैं। महाभारत के सभापर्व में श्रीकृष्ण वेदों के पण्डित, राजनीति में पारंगत, पराक्रमी एवं अजेय योद्धा के रूप में आते हैं। उद्योगपर्व में उनके पराक्रम से सम्बद्ध अनेक शौर्यपूर्ण कार्यों का वर्णन है, वे इन्द्र से भी अधिक पराक्रमी हैं। युद्ध में एकाकी श्रीकष्ण को प्राप्त कर अर्जुन को विजयश्री प्राप्त करने में पूर्ण विश्वास है।

महाभारत में श्रीकृष्ण के देवत्व एवं ऐश्वर्य का विस्तार को साथ विवरण है, उनके जीवन के मधुर भाव से सम्बद्ध पक्ष का वहाँ उल्लेख नहीं है। सभापर्व में श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का संकेत मात्र है, किंत महाभारत के परिशिष्ट हरिवंश में श्रीकृष्ण की माधुर्य एवं ललित लीलाओं का गोपालरूप में विस्तृत विवरण अवश्य प्राप्त होता है। 

श्रीकृष्ण भीष्म पितामह के शब्दों में पूज्यतम व्यक्तित्व हैं। महाभारत में श्रीकृष्ण के अलौकिक चरित्र से उनकी लोकोत्तरता प्रकट होती है। दुर्योधन की सभा में तथा महाभारत-युद्ध में उनका विश्वरूप-दर्शन उनके अलौकिक चरित्र एवं ईश्वरत्वका उद्घाटन करता है। 

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्। 

देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ ( महाभारत )

- यह महाभारत का बीजमन्त्र है, जो मंगलाचरण के रूप में प्राय: प्रत्येक पर्व के प्रारम्भ में है। इसका तात्पर्य है कि श्रीकृष्ण (नारायण), अर्जुन (नर) तथा सरस्वती जो क्रमश: परमात्मा, जीव एवं ब्रह्मविद्या के प्रतीक हैं। इनका स्मरण कर इस ग्रन्थ का पारायण करना चाहिये। महाभारतके अनुसार जहाँ धर्म है, वहाँ श्रीकृष्ण हैं और जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहाँ विजय है। 

यतो धर्मस्ततः कृष्णः यतः कृष्णस्ततो जयः॥ 

गीता में धर्मसंस्थापन एवं दुष्टों के नाश के लिये श्रीकृष्ण का अवतार वर्णित है। सम्पूर्ण महाभारत के ताने बाने में वासुदेव श्रीकृष्ण को महिमा का सूत्र महाभारत का आधार है। गीता में श्रीकृष्ण ने अत्यन्त गुह्य ज्ञान का उपदेश दिया है। गीता में ज्ञान, भक्ति, कर्म का अद्भुत समन्वय है। गीता योगी एवं गृहस्थ सभी के लिये समान रूप से उपयोगी है। यह सम्पूर्ण उपनिषदों का सार है। गीता में ज्ञान, कर्म, भक्ति रूप सभी धर्मो की फलाशा का त्याग कर निष्काम कर्मा करते हुए भगवत्-शरण में आने का उपदेश है -

सर्वधर्मान्यरित्यज्य मामेकं शरणं बजा 

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ (गीता 18/66) यहाँ श्रीकृष्ण का परम ज्ञानी योगेश्वर स्वरूप प्रकट होता है। 

पुराणों में अनेक कथाओं के माध्यम से श्रीकृष्ण के महत्त्व का प्रतिपादन हुआ है। गोवर्धन धारण- कथा में इन्द्र द्वारा उनका अभिषेक एवं उपेन्द्र नामकरण श्रीकृष्ण के गौरव एवं उनकी महिमाको प्रकट करते हैं। विष्णु, पद्म, ब्रह्मवैवर्त एवं श्रीमद्भागवतादि पुराणों में उनकी गोपाल कृष्ण रूप की मधुर कथाओं का विस्तार मिलता है। 

श्रीमद्भागवतमहा पुराण श्रीकृष्ण के मधुरतम प्रेम-रस का उद्वेलित समुद्र है, इसमें भावुक मन निरन्तर अवगाहन करता रहता है। इसका दशम स्कन्ध श्रीकृष्ण की लीलाओं का अक्षय भण्डार है। श्रीकष्ण लीला पुरुषोत्तम हैं। भागवत में श्रीकृष्ण के प्रेम एवं सौन्दर्य के मनमोहक चित्र उभरे हैं। श्रीकृष्ण ने गोपाल नाम को सार्थक बना कर गो-सेवा के महत्त्व को प्रतिपादित किया है-

 गावो मे हृदये सन्तु गवां मध्ये वसाम्यहम् ।। 

श्रीकृष्ण का गोचारण में, गोप एवं गायों से अत्यन्त प्रेम है। शरीर एवं मस्तिष्क के विकास के लिये गोरस सर्वोत्तम पोषक आहार है। गो-सम्पदा सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की केन्द्र रही है। श्रीकृष्ण की गोरस एवं दान लीला का रहस्य यह है कि गाय का दूध, दही, घृत आदि बहुत उपयोगी तथा पालन पोषण करने वाला है। गोवर्धन पूजा में गोवर्धन प्राकृतिक वन सम्पदा का प्रतीक है; अतः वन सम्पत्ति, वृक्ष, गोधन, गोपों (कृषकों) - का संरक्षण आज भी महत्त्वपूर्ण है। 

श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण की #रासलीला योगेश्वर की दिव्य लीला कही गयी है। जगद्गुरु श्रीवल्लभाचार्य, श्रीधरस्वामी एवं जीवगोस्वामी आदि आचार्यों एवं सन्तों ने इस दिव्य लीला को लौकिक न मानकर काम पर अलौकिक प्रेम की विजय माना है। महारास के समय श्रीकृष्ण की आयु केवल ग्यारह वर्ष की थी। कृष्ण आत्मा हैं, राधा आत्माकार वृत्ति हैं और गोपियाँ आत्माभिमुखी वृत्तियाँ हैं। इनका धारा प्रवाह रूप में निरन्तर आत्मरमण ही रास है। अन्तरात्मा (भगवान्) - के मध्य से जीवात्मा का माया जनित अभिमान के हरण (दूर करने) - का प्रयास ही चीर हरण है।

भागवत में श्रीकृष्ण की सर्वाधिक प्रिय गोपी का वर्णन है, जो पूर्वजन्म से कृष्णाराधन में मग्न है। यही गोपी कृष्ण प्रिया राधा के रूप में कृष्ण-काव्यों में वर्णित है। ब्रह्मवैवर्त, 'श्रीमद्देवीभागवत' एवं 'पद्मपुराण' में राधा-कृष्ण की दिव्य प्रेम-लीलाओं का विस्तृत विवरण है। राधा का प्रमुख उल्लेख ‘गोपालतापिन्युपनिषद’ में है। यह ग्रन्थ राधाभक्ति- सम्प्रदाय के भक्तों में अत्यन्त मान्य है। 

श्रीकृष्ण के ब्रह्मत्व को आधार मानने वाले भारतीय दर्शन के क्षेत्र में चार प्रमुख आचार्य हैं- मध्वाचार्य, विष्णस्वामी, निम्बार्काचार्य एवं #वल्लभाचार्य। द्वैत सिद्धान्त के प्रवर्तक श्रीमध्वाचार्य जी के अनुसार श्रीकृष्ण विष्णु के रूप में अविनाशी ब्रह्म हैं। भक्ति द्वारा ही ब्रह्म प्राप्ति सम्भव है। आचार्य विष्णुस्वामी ने अद्वैतवाद का प्रवर्तन किया। उनके अनुसार श्रीकृष्ण (ब्रह्म) की आह्लादिनी शक्ति राधा का प्रमुख स्थान है। 

श्रीकृष्ण भक्ति के तीसरे आचार्य श्रीनिम्बार्क हैं। उन्होंने श्रीकृष्ण के साथ राधा की महत्ता स्वीकार की है और मधुरा भक्ति को प्रधानता दी है। द्वैताद्वैत के प्रवर्तक श्रीनिम्बार्क जी ने राधा-कृष्ण के प्रेम को आत्मा-परमात्मा के प्रेम के रूपमें चित्रित किया है। 

श्रीकृष्ण भक्ति के चौथे महत्त्वपूर्ण आचार्य हैं श्रीवल्लभाचार्य। वे श्रीविष्णुस्वामी के अनुयायी हैं। उनके अनुसार श्रीकृष्ण परम ब्रह्म हैं, राधा उनकी शक्ति हैं। ब्रह्म अपनी लीलाओं से सृष्टि का विस्तार करता है। जीव और ब्रह्म का सम्बन्ध सेव-स्वामी का है। प्रभुकृपा (अनुग्रह) से भक्ति द्वारा जीव ब्रह्म को प्राप्त होता है। इस अनुग्रह (प्रभुकृपा) - को वल्लभाचार्य ने पुष्टि (पोषणं तदनुग्रहः) कहा है। यह पुष्टिमार्ग एवं वल्लभ सिद्धान्त हिन्दी कृष्ण-काव्य का दार्शनिक आधार माना गया है। 

संस्कृत के महाकवि जयदेव के 'गीतगोविन्दकाव्य में राधा-कृष्ण के जिस उत्कृष्ट प्रेमका वर्णन है, उसके मूल में धार्मिक भावना है- सरस मन से हरि स्मरण है। जयदेव की यही सरस्वती कालान्तर में विद्यापति के काव्य का आधार बनी। गीतगोविन्द के पश्चात संस्कृत के अनेक मुक्तक एवं प्रबन्ध ग्रन्थों में कृष्ण लीलाओं का वर्णन है, जो कृष्ण के लोकरंजनकारी ललित एवं उदात्त व्यक्तित्व को लेकर भक्ति के चरम विकास का द्योतक है।

उत्तर भारत में भक्ति-आन्दोलन के साथ श्रीकृष्ण को लेकर कृष्ण भक्त कवियों ने हिन्दी में उत्कृष्ट साहित्य की रचना की। श्रीवल्लभाचार्य द्वारा प्रवर्तित पुष्टिमार्ग में दीक्षित ‘अष्टछाप’ के कवियों का इस दिशा में महत्त्वपूर्ण योगदान है। इनमें अग्रणी सूरदास थे। अष्टछाप के कवियों में नन्ददास की ‘रासपंचाध्यायी’ एवं ‘भँवरगीत’ कृष्ण भक्ति परक उत्कृष्ट रचनाएँ हैं। अष्टछाप के अतिरिक्त हिन्दी के भक्ति काल में हितहरिवंश, मीरा, रसखान- जैसे प्रसिद्ध कृष्ण भक्त कवि हुए हैं। 

भक्त कवियों से लेकर रीतिकाल एवं आधुनिक युग तक श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व से जैसी शाश्वत प्रेम, सौन्दर्य एवं आनन्द की धारा प्रवाहित हुई है; वह आज भी सरस हृदयों को आप्लावित करने में समर्थ है। भगवान् श्रीकृष्ण के उदात्त चरित्र का प्रभाव हमारी संस्कृति एवं साहित्य पर भी पड़ा है तथा उसी से उनके लोकरंजक लीलामय रूपके साथ उनके ऐश्वर्य एवं ईश्वरत्व की प्रत्यक्ष अनुभूति होती है।

महाभारत- युद्ध के दौरान सायंकाल में श्रीकृष्ण अपने पीताम्बर में दाने भरकर थके-माँदे घोड़ों को खिलाते और उनकी पीठ सहलाते हैं, कभी अपने पुराने मित्र सुदामा के अपने यहाँ आने पर वे मित्र के दारिद्र्य से दुःखी होकर पिघल उठते है। मित्र के नंगे पैरों की फटी बिवाइयाँ देखकर उनकी आँखों से आँसुओं की झड़ी लग जाती है, और पास में रखे जल के बदले अपने आखों के अश्रु से ही अपने मित्र सुदामा के पैर धोते हैं। तभी तो मित्रता के इतिहास में कृष्ण सुदामा- सा दूसरा जोड़ा नहीं दिखा आज तक। वस्तुतः भारत माता धन्य है जिसकी गोद में श्रीकृष्ण- जेसे कर्मवीर हुए। धन्य हैं हम भारतवासी भी जिन्हें श्रीकृष्ण कर्म और शान की अनमोल विरासत अपने चरित्र और 'भगवद्गीता' के रूप दे गये हैं। 

मेरे जन्मदिन की, अरे मतलब श्रीकृष्ण के जन्मदिन की आप सबों को हार्दिक शुभकामना.........

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