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...वोट अगर चाहिए तो भाषण भी दिया जाएगा

Bhola Tiwari Aug 22, 2019, 5:13 AM IST टॉप न्यूज़
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 दिनेश मिश्रा

आमतौर पर मैं राजनीतिज्ञों पर अपना समय व्यर्थ नहीं करता मगर 2008 में जिस समय कुसहा का बाँध टूटा था उस समय मैं अपनी ‘बागमती की सद्गति’ नाम की पुस्तक पूरी कर रहा था. उन दिनों लगातार अखबारों में डॉ. जगन्नाथ मिश्र के लेख अखबारों में छपा करते थे और वैसी विषयक मीटिंग में उनके भाषण के अंश भी छपते थे. मैं यह भी जानता था कि डॉक्टर साहब का अधवारा योजना की डी. पी. आर. के निर्माण में बड़ी भूमिका थी और यह मेरी किताब का एक अध्याय बनाने जा रहा था तो मैंने बड़े बेमन से डॉ. जगन्नाथ मिश्र से बात करने की सोची. उनसे समय माँगा और वह मिल गया.

मैं उनसे मिलने गया तो पता लगा मेरी लिखी हुई कई पुस्तकें उन्होनें पढ़ राखी थीं. उनसे मेरी पहली दरखास्त थी कि मैं टेप रिकॉर्डर का इस्तेमाल कर सकता हूँ क्या? उन्होनें इसकी स्वीकृति दे दी. मैंने उन्हें बताया कि मैं उनकी बातों को शब्दशः उद्धृत करना चाहूँगा जिस पर उन्हें कोई ऐतराज़ तो नहीं होगा. उन्होनें फिर स्वीकृति के लिए सर हिलाया. मैंने उनसे सीधा सवाल किया कि आपका लेख और भाषण आजकल रोज़ अखबार में छपता है कि बिहार की बाढ़ की समस्या का समाधान नेपाल में निर्मित किये जाने वाले बांधों में है. यह बाँध कब बनेंगें? उनका वैसा ही सीधा जवाब था कि कभी नहीं बनेंगें. मैंने फिर उनसे पूछा कि फिर वह आपका भाषण और लेख जो रोज़ छपता है कि नेपाल में बांध के निर्माण के बिना बिहार की बाढ़ की समस्या का समाधान नहीं होगा – उसका क्या? उन्होनें स्पष्ट कहा था की कि वोट अगर चाहिए तो भाषण भी दिया जाएगा और लेख भी लिखा जाएगा क्योंकि यह एक राजनैतिक अजेंडा है. लोगों की पार्टियां हैं, उनके संगठन हैं और जनता के पास कुछ भी नहीं है, न संगठन और न पार्टी. इसलिए पार्टियां जो भी चाहें बयान दे सकती हैं और जनता का क्योंकि संगठन नहीं है इसलिए वह कुछ भी नहीं कर सकती.

उनका मानना था कि बागमती पर नुन्थर में, कमला पर शीशापानी में और कोसी पर बराहक्षेत्र बाँध का निर्माण कर पाना और उनसे बाढ़ का स्थायी समाधान कर पाना संदेहास्पद लगता है. वैसे भी इन बांधों का बन पाना कोई आसान काम नहीं है. पॉलिटिकली हम लोग बोलते रहें, भाषण करते रहें, भारत सरकार को दोष देते रहें मगर इसकी संभावना आर्थिक रूप से, रचना की दृष्टि से, सामरिक दृष्टि को ध्यान में रखते हुए है नहीं. नेपाल से इसकी सहमति लेना कोई आसान काम है क्या? हम लोग बोलते रहते हैं. वोट लेना है तो भाषण भी चलता रहता है लेकिन यह सब संभव नहीं दीखता. यह स्थिति बहुत दुर्भाग्यपूर्ण जब हम सत्ता में होते हैं तो विपक्ष हमें दोष देता है और जब हम विपक्ष में रहते हैं तो वही काम हम करते हैं. यह सारी बातें जनता के हितों के विरुद्ध जाती हैं. जनता जब किसी या सारी पार्टियों पर कुछ भी न करने का आरोप लगाती है तब वह एकदम सही होती है.इस पर राजनीति होनी नहीं चाहिए. पांच साल लालू जी केंद्र में मंत्री थे, 6-6 साल नीतीश कुमार और राम बिलास केंद्र में मंत्री थे. क्यों नहीं तब कुछ हुआ? जनता खंडित है, उसका कोई संगठन नहीं है और इसलिए इन समस्याओं के प्रति कोई भी पार्टी गंभीर नहीं है क्योंकि उसे उनके वोट के अलावा और किसी से कोई मतलब नहीं है. यह ठीक है कि सरकार को इस दिशा में प्रयास करते रहना चाहिए मगर इसमें जनता और उसके हितों को घसीटना ठीक नहीं हैं.

उन्होनें मुझे सलाह दी कि जो सवाल आप मुझसे पूछ रहे हैं, यही सवाल जाकर नीतीश कुमार, लालू प्रसाद और राम बिलास पासवान से भी जाकर पूछ लूँ और देखूं कि वह क्या कहते हैं. इसके साथ ही उन्होनें यह भी सलाह दी कि मैं अपना समय बेकार की बातों में नष्ट न करूं क्योंकि मेरी पहुँच बहुत सीमित है. उनका कहना था कि आप किताब लिखेंगें और दो हज़ार प्रतियां छाप भी लेंगें तो उसकी पाठक संख्या अगर 20,000 तक हो जाए तो बड़ी बात होगी. इतने लोग तो उनकी एक मीटिंग में आ जाते हैं. उन्होनें मुझे उनके साथ काम करने का प्रस्ताव भी किया जिसे मैंने विनम्रता पूर्वक अस्वीकार कर दिया.

उनसे हुई बातचीत का रिकॉर्ड अब भी मेरे संग्रह में कहीं होगा. उनकी स्पष्टवादिता का मैं कायल होकर उनके घर से लौटा था.

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