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आग लगे हमरी झोपड़िया में, हम गाई मल्हार

Bhola Tiwari Aug 21, 2019, 4:43 AM IST टॉप न्यूज़
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कबीर संजय

अभी जब मैं ये शब्द लिख रहा हूं तो दिल्ली में यमुना खतरे के निशान से ऊपर चल रही है। वो यमुना जो दिल्ली में किसी नाले की तरह बहती है, इस वक्त पूरे उफान पर है। उसका काला रंग, चिपचिपा गाढ़ा पानी, कीचड़ सबकुछ बह गया है। यमुना का पानी मटियाला हो गया है। 

दिल्ली में यमुना का 205.94 मीटर के स्तर पर पहुंच चुकी है। दिल्ली में 204.5 मीटर के स्तर पर पहुंचने को दिल्ली में खतरे की घंटी माना जाता है। जबकि, 205.33 मीटर के स्तर पर यमुना का खतरे का निशान है। दिल्ली में यमुना यह निशान पार कर चुकी है। कल निगम बोध घाट में चारों तरफ से यमुना के पानी में डूबी हुई जगहों पर शवों का अंतिम संस्कार किया जा रहा था। 

यमुना के खतरे का निशान पार करने के बाद से लोगों को हटाया जा रहा है। उन्हें तंबू में रहने को कहा जा रहा है। लोहे के पुल पर यातायात रोक दिया गया है। कुछ रेलगाड़ियों का भी मार्ग परिवर्तन किया गया है। 

 वो यमुना जो दिल्ली में किसी नाले की तरह बहती है, इस समय नदी लग रही है। साल भर के ये कुछ दिन होते हैं जब प्रकृति आपात कदम उठाकर यमुना की सारी गंदगी को साफ कर देती है। फिर साल भर हम उसे गंदा और गाढ़ा करते हैं। 

ऐसा लगता है कि देश के कई हिस्से पिछले डेढ़ महीने से किसी विपदा का सामना कर रहे हैं। तमाम जगहों पर बाढ़, भूस्खलन की तबाही है। लोगों के घर डूब रहे हैं। वो अपना सारा मालमत्ता छोड़कर भाग रहे हैं। बाढ़ में डूबने से उनकी मौत हो रही है। बसें और कारें बह जा रही हैं। मगरमच्छ सड़कों पर घूम रहे हैं। जंगल डूबने से बाघ लोगों के घरों में पनाह लेने को बाध्य हो रहे हैं। पहाड़ दरक जा रहे हैं।

बाढ़ की आपदा आसाम, बिहार, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान से होते हुए इन दिनों केरल, उत्तराखंड और हिमांचल पर केन्द्रित हो चुकी है। एक करोड़ से ज्यादा लोग प्रभावित हुए हैं। जबकि, सैकड़ों की मौत हो चुकी है। पशु-पक्षियों की तो अभी गणना भी करना संभव नहीं है। 

आखिर ऐसा हो क्यों रहा है। इसके कई कारण हैं। जिन पर ध्यान देना बेहद जरूरी है। कुछ कारण तो ऐसे हैं, जिन्हें थोड़े प्रयास से ठीक किया जा सकता है। जबकि, कुछ कारण इस स्तर पर पहुंच गए हैं कि अब उन्हें जल्दी ठीक करना भी संभव नहीं रहा। 

जैसे नदियों में बाढ़ आने की एक बड़ी वजह नदियों और नालों का रास्ता रोककर किया गया निर्माण है। नदियों को उनकी पुरानी जगह देनी चाहिए। उनका पुराना रास्ता छोड़ा जाना चाहिए। ऐसा नहीं होगा तो कुछ-कुछ अंतराल पर नदियां हमें खदेड़ती रहेंगी। नदियां पाइप में बहने के लिए नहीं बनी है। 

लेकिन, इससे बड़ा कारण है सिर्फ एक करोड़ लोगों के हितों को पूरा करने वाली यह पूंजीवादी व्यवस्था है। इसमें पूरी मानवता का खयाल कहीं नहीं है। सिर्फ एक करोड़ बड़े पूंजीपति, व्यवसायी, नौकरशाह, बैंकर, नेता अपने हितों के हिसाब से दुनिया चला रहे हैं। उनकी नीतियों के चलते पर्यावरण बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। इससे मौसम का चक्र बिगड़ गया है। पिछला जुलाई माह अभी तक के इतिहास में सबसे गर्म जुलाई के महीनों में दर्ज किया गया। यूरोप के देशों में भी लू का प्रवाह महसूस किया गया। हाल के कुछ दिनों में गर्मी में लगातार इजाफा हो रहा है। आप को शायद होगा कि लोगों को लू से बचाने के लिए धारा 144 तक अपने देश के कुछ जगहों पर लगानी पड़ी थी।

जबकि, बरसात का पूरा क्रम बिगड़ा हुआ है। कम समय में ज्यादा बारिश भी जलवायु संकट का एक बड़ा संकेत है। सोचिए अगर एक महीने में होने वाली बरसात सिर्फ तीन दिन में हो जाए तो क्या होगा। कुछ ऐसा ही हमारे देश में भी जगह-जगह देखने को मिल रहा है। 

कुछ जगहों पर भारी बारिश हो रही है, जबकि, अभी भी कई ऐसी जगहें हैं जहां पर जलाशय सूखे पड़े हैं। लेकिन, सबसे हैरानी की बात यह है कि सबकुछ तबाह होते देखकर भी हम चुप हैं। हमारे विमर्श में कहां है यह चिंता।

शायद सगीना महतो फिल्म का गाना है कि आग लगे हमरी झोपड़िया में, हम गाई मल्हार, ही हमारी स्थिति को बेहतर ढंग से प्रगट कर सकता है।

(तस्वीर इंटरनेट से साभार)

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