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संघप्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण पर बयान के "निहतार्थ"

Bhola Tiwari Aug 20, 2019, 11:22 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

आपको 2015 के बिहार के विधानसभा चुनाव में ले चलते हैं।चुनाव के पूर्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने एक बयान में कहा कि आरक्षण नीति की समीक्षा होनी चाहिए।उन्होंने तर्क दिया कि यह वर्षों पुरानी व्यवस्था है और इसमें सुधार की जरूरत है।

संघप्रमुख के बयान के पहले भाजपा बिहार में बहुत अच्छी स्थिति में थी मगर उनके एक बयान ने सब गुड गोबर कर दिया।अश्वमेधी घोडे पर सवार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रथ बिहार में रोक दिया गया, कारण केवल आरक्षण पर मोहन भागवत का बयान बना।पिछडों के सबसे बड़े मसीहा लालू प्रसाद यादव ने इस मुद्दे को लपक लिया और अपने हर चुनावी सभा में मोहन भागवत और नरेंद्र मोदी को ललकारते हुए कहते थे कि अगर हिम्मत हो तो आरक्षण खत्म करके देखो,देश में आग लग जाएगी।

बिहार में फ्रंट फुट पर खेल रही भाजपा बैकफुट पर आ गई, प्रधानमंत्री ने बिहार के विकास के लिए तमाम वायदे किए मगर आरक्षण मुद्दे के सामने सब बेअसर रहा और बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा की करारी हार हुई।

बिहार की हार के बाद बहुत सालों तक संघप्रमुख मोहन भागवत इस मुद्दे पर चुपचाप बैठे थे मगर अब जब तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं उनके इस विवादित बयान खलबली मचा सकते हैं।विधानसभा चुनाव हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में होने हैं,अब ये वहाँ के विपक्षी नेताओं पर है कि वे इस मुद्दे को कैसे कैस कराते हैं।

आपको बता दें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने "ज्ञान उत्सव" के समापन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि आरक्षण का पक्ष लेने वालों को उन लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए बोलना चाहिए।आरक्षण पर चर्चा हर बार तीखी हो जाती है जबकि इस दृष्टिकोण पर समाज के विभिन्न वर्गों में सामंजस्य जरूरी है।नरेंद्र मोदी सरकार पर आरएसएस के प्रभाव की धारणा के बारे में बात करते हुए भागवत ने कहा कि चूँकि भाजपा और इस सरकार में संघ कार्यकर्ता हैं,वे आरएसएस को सुनेंगे लेकिन उनके लिए हमारे साथ सहमत होना जरूरी नहीं है।वे असहमत भी हो सकते हैं।उन्होंने कहा कि चूंकि भाजपा सरकार में है उसे व्यापक आधार पर देखना होगा और वह आरएसएस की बात से असहमत हो सकता है।उन्होंने कहा कि एक बार पार्टी के सत्ता में आने के बाद उसके लिए सरकार और राष्ट्रीय हित प्राथमिकता बन टिप्ें हैं।

संघप्रमुख के बयान पर विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने कडी प्रतिक्रिया दी है।बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा है कि हिम्मत है तो आरक्षण हटा के देख लें।कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने भी संघप्रमुख के बयान की कडी आलोचना की है।

लगातार कडी आलोचना झेल रहे मोहन भागवत के बचाव में संघ उतर आया है।आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख अरूण कुमार ने सरसंघचालक मोहन भागवत की टिप्पणी से पैदा हुए विवाद को अनावश्यक करार देते हुए खारिज कर दिया।अरूण कुमार कहते हैं कि वह महज इस आवश्यकता पर बल दे रहे थे कि समाज में सद्भावनापूर्वक परस्पर बातचीत के आधार पर सभी प्रश्नों के समाधान ढूंढ़ें जाए।

अरूण कुमार ने एक ट्वीट करके कहा कि,"जहाँ तक संघ का आरक्षण के विषय पर मत है,वह कई बार स्पष्ट किया जा चुका है कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछडा वर्ग और आर्थिक आधार पर पिछडों के आरक्षण का पूर्ण समर्थन करता है।"

आपको बता दें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमेशा से जातिगत भेदभाव का विरोधी रहा है और उसकी सोच है कि आरक्षण जैसी कुप्रथा को खत्म किया जाए।इस वजह से हीं समय समय पर मोहन भागवत का बयान सुर्खियां बटोरता रहता है मगर भाजपा एक राजनीतिक दल है और वे जानते हैं कि पार्टी को कैसे चलाया जाता है, वोट कैसे हासिल किये जाते हैं।भाजपा कभी आरक्षण हटाने के समर्थन में बयान नहीं देगी,वो इसका परिणाम जानती है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ चाहता है कि जैसे अमेरिका काले लोगों का आरक्षण क्रमबद्ध तरीके से खत्म कर रहा है वैसी हीं व्यवस्था भारत में बनें।अमेरिका में आरक्षण के नकारात्मक परिणाम सामने आए थे और समाज में सभी को बराबर का अधिकार देने के लिए अमेरिकी सरकार ने इसे खत्म करने की योजना पर काम करना शुरू भी कर दिया है।

जातिगत आरक्षण पर 1963 में सुप्रीमकोर्ट ने अपने आदेश में व्यवस्था दी थी कि आरक्षण की सीमा 50% से ऊपर नहीं हो सकती।आज समाज का हर वर्ग आरक्षण चाहता है और इसके लिए आंदोलनरत है।आप गुजरात में पटेल समुदाय की बात कर लें, हरियाणा में जाटों के आरक्षण की बात करें या महाराष्ट्र में मराठा आंदोलन की।सभी को आरक्षण चाहिए, उन्हें इससे मतलब नहीं है कि ये आरक्षण की सीमा सुप्रीमकोर्ट द्वारा निर्धारित 50% से ऊपर तो नहीं हो जा रहा।

आरक्षण व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए सन् 1970 में पूर्व वाणिज्य सचिव और अमेरिकी राजदूत आबिद हुसैन ने कहा था प्रतिभा के नष्ट होने से बेहतर है कि वह पलायन कर जाए।

आबिद हुसैन की बात आज सत्य हो रही है।बहुमुखी प्रतिभा के धनी छात्र जिन्हें भारत में आरक्षण के कारण नौकरी नहीं मिल रही है वे विदेशों में पलायन कर रहें हैं।वे प्रतिभाएँ जो भारत में रहकर देश की सेवा कर सकती थी वो बाहर जा रहीं हैं और हम उन्हें रोक नहीं पा रहें हैं।रोकना तो दूर हम उस विषय में खेलकूद बातचीत भी नहीं कर सकतें क्योंकि उनपर आरक्षण विरोधी होने का तमगा भी तो लग सकता है जो राजनीति करनेवाला कोई व्यक्ति नहीं चाहेगा।

संघप्रमुख मोहन भागवत का बयान जरूरी है या गैरजरूरी है इसपर एक लंबी बहस हो सकती है मगर परिणाम सिफर हीं आएगा।ये एक के लिए बेहद जरूरी है तो दूसरे के लिए उनके हकों की हत्या है।

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