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जहांगीरी घंटा लोकतंत्र में नादान बजाते हैं किरण..

Bhola Tiwari Aug 17, 2019, 7:39 AM IST पॉलिटिकल
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 राजीव मित्तल

यह प्रहसन थोड़ा पुराना है लेकिन भारतीय लोकतंत्र में हर समय मौजूं है अब चाहे ताली पीटो या सिर धुनो..

खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे तो सुना था और आगे भी सुनेंगे, लेकिन जब वो खिसियाती हैं तो उन्हें 16 साल की किरण में सपनों को मटियामेट कर देने वाली सोनिया क्यों नजर आती है..

दशकों से पूरे ब्राह्मांड में लोकतंत्र की अलख जगा रहे भारतवर्ष में लोकहित की बात करने लोकतांत्रिक तरीके से मुख्यमंत्री बनीं अपनी नेता से मिलने किरण लखनऊ पहुंच गयी.. लेकिन वो भूल गयी कि यह सन् 2008 का लखनऊ है सन् 1620 का आगरा नहीं..वो जमाना जहांगीर का था..

सलीम को बादशाह जहांगीर बनने के लिये किसी वोटबैंक की जरूरत नहीं पड़ी, किसी गरीब या अमीर से कोई वादा नहीं करना पड़ा. माबदौलत तेरे पास वोट मांगने कभी नहीं आएंगे, हां, तू कुछ भी मांगने हमारे पास कभी भी आ सकता है..तेरे लिये अपने किले के बाहर एक घंटा लगवा दिया है, हमारी तरफ से जब भी कोई परेशानी हो या हमारा कोई अफसर या कर्मचारी तुझे परेशान करे, तू टनटना देना, सब ठीक हो जाएगा..

बताया जाता है कि उस बादशाही घंटे की जद में मलिका नूरजहां तक आ गयी थीं..

अनुमान है कि किरण को इस लोकतंत्र में जहांगीरी घंटे की ही याद रही और वह पहुंच गयी लखनऊ.. लखनऊ भी वह साइकिल से गयी ताकि राजदरबार में हौसलाअफजाई भी हो कि वाह क्या लड़की है..

लेकिन मेरठ से साइकिल चला कर लखनऊ गयी किरण यह क्यों भूल गयी कि भारतीय लोकतंत्र पांच सौ किलोमीटर साइकिल चला कर लखनऊ गयी किरण का नहीं, वोटों का मोहताज है और तब तो किरण के होने या उसके पांच सौ किलोमीटर साइकिल चलाने का वैसे भी कोई अर्थ नहीं, जब चुनाव के तीन साल बाकी हों..सत्ता की कुर्सी को दूर-दूर तक छूने वाला तो दूर, उसकी तरफ देखने का साहस रखने वाला तक कोई न हो..

उत्साह से भरी किरण को राजदरबार में घुसने देना तो दूर, लखनऊ की सड़कों या गलियों तक में कदम धरने की बंदिश लगा दी गयी.. और जब वह अपनी नेता से मिलने के लिये अड़ गयी तो उसे जीप में डाल कर उसके शहर मेरठ पहुंचा दिया गया..

अपनी नेता या मुख्यमंत्री से उसकी मात्र इतनी सी डिमांड थी कि जिस सरकारी मदद से उसने अपनी पढ़ाई पूरी की, अन्य लड़कियों को भी वह मदद मिलती रहे, उसे बंद न किया जाए, जो एक धचके में बंद कर दी गयी.. किरण भूल गयी कि अब जहांगीरी घंटा इतिहास की गर्द में धूल फांक रहा है और लोकतंत्र में बादशाहों की ये सब बकवासें नहीं चला करतीं..

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