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"देश के भाग्य का फैसला सरजमीं से होगा,विदेशी धरती से नहीं" :अशरफ गनी

Bhola Tiwari Aug 12, 2019, 12:46 PM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने रविवार को "ईद-उल-अधा" के मुबारक मौके पर कहा कि अफगानिस्तान के भाग्य का फैसला यहाँ इस मातृभूमि से होगा।हम अफगान शांति वार्ता के लिए विदेशी हस्तक्षेप अस्वीकार करते हैं।आगे वे कहते हैं बगैर अफगान सरकार के अमेरिका और तालिबान के बीच किसी भी प्रकार की शांति वार्ता अधूरी है।अफगान राष्ट्रपति कहते हैं कि अगले महीने राष्ट्रपति चुनाव जरूरी है, लिहाजा वर्षों युद्ध के बाद देश के भविष्य के फैसले के लिए अफगान नेता को एक शक्तिशाली जनादेश की दरकार है।

गौरतलब है कि अफगान तालिबान ने शांति वार्ता में अफगान सरकार को शामिल करने से मना कर दिया है और उसने कहा है कि अफगानिस्तान में राष्ट्रपति चुनाव दिखावा भर है।यह इंकार ऐसे वक्त किया गया है जब अमेरिकी राजदूत जालमी खलीलजाद और प्रमुख तालिबान वार्ताकार मुल्ला अब्दुल गनी बरादर हाल में हीं शांति वार्ता के लिए कई देशों की यात्राएं की है।

अभी कुछ दिनों पहले अमेरिका अफगानिस्तान में दहशत फैलाने वाले पाकिस्तान को शांति वार्ता का प्रमुख घटक नियुक्त किया है और पाकिस्तान के आग्रह पर भारत को इस महत्वपूर्ण वार्ता से दूर रखा गया है।अमेरिका की नजर में अब तालिबान और पाकिस्तान हीं प्रमुख वार्ताकार हैं,अफगान सरकार को भी बाईपास किया जा रहा है जो चिंतनीय है।

दरअसल अमेरिका अफगानिस्तान से जल्द से जल्द निकलना चाहता है, तालिबान के पास अमेरिका और नाटों के करीब 20,000 सैनिक कैद में हैं।अमेरिका शांति समझौता कर पूरे रूप से अफगानिस्तान से निकलना चाहता है।अमेरिका अफगानिस्तान में सुरक्षा व्यवस्था में काफी खर्च कर रहा है,जिसके विरुद्ध वहाँ आवाज उठ रहें हैं।एक और चिंता जो विश्व को सता रही है कि अगर अमेरिका अफगानिस्तान से अपने पूरे सैनिक बुला लेगा तो तालिबान वहाँ और मजबूत हो जाएगा जो पड़ोसी देशों की सुरक्षा के लिए खतरनाक होगा।भारत के लिए तो तालिबान और खतरनाक है ये भारतीय हवाई जहाज अपहरण में स्पष्ट हो चुका है।जब अपहृत जहाज को कांधर लाया गया था तो उस समय अफगानिस्तान में तालिबान की हुकूमत थी,जिसे भारत सरकार ने मान्यता नहीं दी थी।तालिबान हुकूमत ने भारत सरकार को जरा भी सहयोग नहीं किया था।

भारत की चिंता जायज है,2001 में तालिबान सरकार के पतन के बाद अफगानिस्तान के पुनरूत्थान में भारत ने काफी निवेश कर रखा है। ये तो तय है कि अगर अफगानिस्तान में तालिबान सरकार बनाती है तो वह भारतीय परियोजना को या तो बंद कर देगी या तो उन्हें शंट कर देगी।

अमेरिका सबसे पहले अपना हित देख रहा है, 2020 के चुनाव से पहले अपने वादे को पूरा करते हुए ट्रंप लड़ाई के बजाए अब राजनीतिक तौर पर तालिबान के साथ निपटना चाहता है। तालिबान को राजनीतिक ढ़ांचे में शामिल करने को तैयार है।अमरीका और तालिबान के बीच सात दौर की बातचीत हो चुकी है। ट्रंप के इस फैसले से यह तो साफ है कि अमरीका तालिबान को अफगानिस्तान की सियासत और सरकारी तंत्र का मुख्य हिस्सा बनाना चाहता है।

आपको बता दें 1990 की शुरुआत में उत्तरी पाकिस्तान में तालिबान का उदय माना जाता है।ये वो दौर था जब सोवियत सेना अफगानिस्तान से वापस जा रही थी।पश्तून आंदोलन के सहारे तालिबान ने अफगानिस्तान में अपनी जड़ें जमा ली थीं।इस आंदोलन का उद्देश्य था कि लोगों को धार्मिक मदरसों में जाना चाहिए।तालिबान इस्लाम के शरिया कानून को अफगानिस्तान में लागू किया।इस कानून के तहत महिलाओं पर कई तरह की कड़ी पाबंदियां लगा दी गई थी।विभीत्स सजा के कारण तालिबान थोडे हीं समझ में अलोकप्रिय हो गया।हर पुरूष को दाढ़ी रखना अनिवार्य कर दिया गया, महिलाओं को बुर्का में रहने का फरमान जारी कर कहा गया कि अगर कोई महिला बिना बुर्के के देखने में मिली तो उसे शरियत के अनुसार दंड मिलेगा।अफगानी महिलाओं को नौकरी करने की मनाही थी, अफगान महिला टीवी,म्यूजिक, सिनेमा नहीं देख सकती थी।दस साल की उम्र के ऊपर की लड़कियों को स्कूल, काँलेज जाने की मनाही थी।

बताते हैं कि तालिबान के शासन में 97% औरतें डिप्रेशन का शिकार थीं।पुरूष डाक्टर महिला कि ईलाज नहीं कर सकता था, प्रेमी के साथ भागने पर महिला या लड़की को पत्थर मारकर हत्या कर दी जाती थी।

जिस प्रकार अमेरिका तालिबान से वार्ता कर रहा है और उसके कहने पर अफगानिस्तान में चुनी हुई सरकार की अवहेलना कर रहा है,उससे तो ऐसा लगता है कि अमेरिका को अपने फायदे के लिए तालिबानी हुकूमत भी पसंद है।अफगानिस्तान के राष्ट्रपति का विरोध जायज है और व्यापक हित में अफगान सरकार और भारत का शांति वार्ता में शामिल होना बेहद जरूरी भी है।

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