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मानव जाति और उसकी कारगुजारियां

Bhola Tiwari Jul 31, 2019, 5:17 AM IST टॉप न्यूज़
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 कबीर संजय

अपने पैदा होने के बाद से पृथ्वी महाविनाश के छठवें दौर से गुजर रही है। इससे पहले पांच महाविनाश आ चुके हैं। अफसोस की बात यह है कि महाविनाश के इस छठवें दौर का सबसे बड़ा कारण मानव जाति और उसकी कारगुजारियां हैं। 

माना जाता है कि पृथ्वी का जन्म लगभग साढ़े चार अरब साल पहले हुआ था। हजारों सालों तक पृथ्वी रहने लायक नहीं थी। फिर धीरे-धीरे वातावरण सुधरा तो जीवों की उत्पत्ति हुई। लेकिन, पृथ्वी के इतिहास में ऐसे पांच दौर आ चुके हैं जब जीवों का महाविनाश हुआ है। इसे मॉस एक्सटिंक्शन कहा जाता है। जब ये महाविनाश आए तो बड़े पैमाने पर जीवों का खात्मा हो गया। जीवों की हजारों-लाखों प्रजातियां नष्ट हो गईं। पूरी तरह से समाप्त हो गईं। 

कभी पृथ्वी पर राज करने वाले डायनासोर भी इन्हीं में शामिल हैं। महाविनाश के चलते पूरी की पूरी डायनासोर फैमिली ही नष्ट हो गई। उस समय के अन्य जीवों के फासिल भी आज पाए जाते हैं और उनके बारे में जानकर हमें आश्चर्य भी होता है कि अरे ऐसे भी जीव कभी पृथ्वी पर हुआ करते थे। 

पृथ्वी पर पहले आए पांचों महाविनाश के कारण आमतौर प्राकृतिक घटनाएं रही हैं। किसी उल्का का टकरा जाना या मौसम में हुआ परिवर्तन, हिमयुग के आ जाने से जैसे कारकों से तमाम प्रजातियां नष्ट हो गईं। लेकिन, छठवें महाविनाश के लिए इंसानों की कारगुजारियों को सबसे ज्यादा जिम्मेदार माना जाता है। 

और इस महाविनाश में इंसानों को छोड़कर स्तनपायी या मैमेल जानवरों की कई प्रजातियां, सरीसृप या रेप्टाइल, पक्षी, एंफीबियन, आर्थोपोडा सभी शिकार हो रहे हैं। पृथ्वी पर मौजूद स्तनपायियों का 96 फीसदी हिस्सा इंसान और इंसानों द्वारा पाले जाने वाले जानवर हैं। केवल चार फीसदी में बाकी सारे स्तनपायी जीव हैं। इनमें बाघ से लेकर जिराफ और हाथी तक शामिल हैं। जबकि, पृथ्वी पर मौजूद पक्षियों का 70 फीसदी हिस्सा इंसानों का पालतू बनाया हुआ है और उसमें भी मुख्यतः चिकन है। यानी जंगलों और मुक्त विचरण करने वाले पक्षियों की तादाद केवल तीस फीसदी ही रह गई है। 

पृथ्वी को आज हम जिस रूप में देखते हैं, उसे बनने में करोड़ों साल लगे हैं। इस जीव जगत में एक चीता जिंदा रहने के लिए तितलियों तक पर निर्भर है। जीवों के बीच इन अंतरसंबंधों को अभी बहुत ज्यादा समझा भी नहीं गया है। जाहिर है कि ईकोसिस्टम के नष्ट होने का खामियाजा सभी को भुगतना पड़ेगा। 

हम छठवें महाविनाश के बीच में हैं। यानी महाविनाश पहले ही शुरू हो चुका है और महाविनाश का बड़ा हिस्सा हो भी चुका है। फिलहाल जो स्थिति दिख रही है, उसमें इसकी भी संभावना बहुत कम दिखती है कि इस महाविनाश को समय से रोकने के उपाय किए जा सकेंगे। 

इस महाविनाश के बाद भी पृथ्वी बची रहेगी। जैसे पहले के पांच महाविनाशों के बाद भी पृथ्वी बची रही थी। लेकिन, उसे दोबारा से हरी-भरी होने में हो सकता है कि फिर से लाखों साल लग जाएं। फिर से जीवन पनपने में हो सकता है कि लाखों साल लग जाएं। लेकिन, तब पनपने वाले जीव आज जैसे नहीं होंगे। कुछ अलग होंगे। इस महाविनाश को समझना जरूरी है। क्योंकि यह खतरा वास्तविक है। 

(पृथ्वी पर उल्का गिरने का काल्पनिक चित्र इंटरनेट से)

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