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आर्टिकल 35-A और सियासी बवाल

Bhola Tiwari Jul 30, 2019, 10:52 AM IST टॉप न्यूज़
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मधुकर श्रीवास्तव

रांची : नरेंद्र मोदी की दुबारा सत्ता में वापसी और अमित शाह के गृह मंत्री बनने के बाद जम्मू कश्मीर का सियासी पारा चरम पर है। कभी आतंकवादी, अलगाववादी, पत्थरबाज तो कभी आर्टिकल 35 ए। इसी दरमियान अजीत डोभाल का जम्मू कश्मीर जाना और जम्मू कश्मीर में सेना बढ़ाने की बात। खैर।

भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर में सेना बढ़ा दी है। इसके बाद से अटकलें लगाई जाने लगी हैं कि केंद्र सरकार आर्टिकल 35-ए खत्म करने जा रही है। हालांकि, सरकार की ओर से अभी तक ऐसा कोई बयान नहीं आया है। लेकिन जम्मू और कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती इसको लेकर आक्रामक हैं। उन्होंने कहा कि 35-ए के साथ छेड़छाड़ बारूद को हाथ लगाने के बराबर है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने भी 35-ए के मामले में केंद्र सरकार को बचने की सलाह दी। अब ऐसे में आपके दिमाग में सवाल चल रहा होगा कि आखिर आर्टिकल 35-ए है क्या, जो इतना बवाल मचा चुका है। तो आइए जानते हैं आर्टिकल 35-ए है क्या...

दरअसल में आर्टिकल 35-ए कश्मीर को विशेष दर्जा देता है। आर्टिकल 35-ए से जम्मू और कश्मीर के नागरिकों को विशेष दर्जा मिलता है। इस विशेष अधिकार का फायदा उन्हें नौकरियों, संपत्ति की खरीद-विरासत, स्कॉलरशिप, सरकारी मदद और कल्याणकारी योजनाओं में मिलता है।

1. आर्टिकल 35-ए से जम्मू और कश्मीर के नागिरकों के स्थाई नागरिकता और अधिकार तय होते हैं।

2. इस नियम के तहत 4 मई 1954 के पहले कश्मीर में बसे लोग ही जम्मू और कश्मीर के स्थाई निवासी हैं।

3. किसी और राज्य का निवासी जम्मू और कश्मीर में स्थाई निवासी के तौर पर नहीं बस सकता।

4. किसी दूसरे राज्य के निवासी ना तो कश्मीर में जमीन खरीद सकते हैं, ना राज्य सरकार उन्हें नौकरी दे सकती है।

5. जम्मू कश्मीर के स्थाई निवासी ही जमीन खरीदने, रोजगार हासिल करने और सरकारी योजनाओं में लाभ लेने का अधिकार रखते हैं।

6.जम्मू कश्मीर की महिला भारत के किसी और राज्य के पुरुष से शादी करती है, तो वह स्थाई निवासी नहीं रह जाएगी। हालांकि, यह नियम पुरुषों पर लागू नहीं होता। इस वाले मामले को लेकर लंबे समय से विवाद हो रहा है।

(इसकी एक बानगी शेख अब्दुल्लाह के पोती और पोती का मामला है उनके पोते और पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और उनकी पोती सारा दोनों ने राज्य के बाहर के निवासियों से विवाह किया उम्र के बच्चों को राज्य के सारे अधिकार हासिल हो गए जबकि सारा को संपत्ति के अधिकार से और उसके बच्चों को राज्य की स्थाई नागरिकता के अधिकार से बेदखल कर दिया गया।)

 गौरतलब है कि आर्टिकल 370 के तहत जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा दिया गया। 1954 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद के आदेश से धारा 35-ए का प्रावधान जोड़ा गया। इसके तहत जम्मू कश्मीर विधानसभा को राज्य के अस्थाई निवासी की परिभाषा तय करने का अधिकार दिया गया था।

हुआ यूं कि जब 1956 में जम्मू कश्मीर संविधान अपनाया गया तो उसमें स्थाई निवासी उसे कहा गया जो 14 मई 1954 को राज्य का निवासी था या जो 10 साल से बाहर रह रहा था। अनुच्छेद 35-ए के तहत स्थाई नागरिक को ही संपत्ति, रोजगार और सरकारी योजनाओं का लाभ लेने का हक दिया गया। इससे भारत के किसी अन्य राज्य का कोई नागरिक ना तो वहां अचल संपत्ति खरीद सकता है और न सरकारी योजनाओं का लाभ ले सकता है।

अब सवाल उठता है कि 35-ए को संसद की मंजूरी से हुए संविधान संशोधन के माध्यम से लागू नहीं किया गया था फिर कई विशेषज्ञ इसे खत्म करने के लिए संविधान संशोधन की बात क्यों करते हैं। 35-ए को राष्ट्रपति के आदेश से लागू किया गया था तो फिर उसे राष्ट्रपति के आदेश से ही खत्म क्यों नहीं किया जा सकता। राष्ट्रपति को आदेश पारित करने के लिए राज्य सरकार की अनुशंसा या सहमति चाहिए जो राज्यपाल द्वारा दी जा सकती है।

लिहाजा 35-ए तहत मिलने वाले संरक्षण वादी अधिकार को खोने का डर ही अलगाववादियों और जम्मू कश्मीर की नेताओं की असल परेशानी है।

अगर वाकई में राज्य की असली विकास की बात की जाए तो निजी क्षेत्र से निवेश हासिल करने के लिए अब भारत के अन्य क्षेत्रों के लोगों को राज्य में आवाजाही कि स्वतंत्रता देनी होगी जो उनका संवैधानिक हक भी है। और यही राज्य के साथ-साथ देश के लिए भी हितकर होगा।

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