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बिहार के मधुबनी जिले में दूल्हों का मेला लगता है

Bhola Tiwari Jul 30, 2019, 5:14 AM IST टॉप न्यूज़
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 एसडी ओझा

बिहार के मधुबनी जिले में एक गांव है सौराठ । इस गांव के 22 बीघे जमीन पर दूल्हों का मेला लगता है। इस मेले को " सौराठ सभा " कहते हैं । इस मेले में केवल मैथिली ब्राह्मणों के हीं दूल्हे मिलते हैं । लड़की के पिता घूम घूम कर अपनी कन्या के लिए योग्य वर की खोज करते हैं । जब योग्य वर की खोज हो जाती है तो कन्या के पिता पंजीकार के पास जाते हैं । पंजीकार भी उसी मेले में बैठते हैं । इनका हलका बंटा होता है । कन्या के पिता उस हलके के पंजीकार से मिलते हैं । पंजीकार के पास ननिअवुरा और ददिअवुरा तक का रिकार्ड मौजूद होता है । पंजीकार को देखना होता है कि वर और कन्या का एक हीं गोत्र न हो । नानी और आजी की तरफ से भी दोनों पक्षों का दूर दूर तक कोई रक्त सम्बंध न हो । सब कुछ सही होने पर पंजीकार कहता है -" अधिकार होइए "। यह एक तरह से हरी झण्डी होती है । फिर कन्या का पिता वर के गले में अपना अंगौछा डाल देता है । वर उसका दामाद हो जाता है ।

यह मेला ज्येष्ठ या आषाढ़ माह में 7-11 दिन तक चलता है । इस मेले की एक विशेष खासियत यह होती है कि इसमें दान दहेज नहीं लिया / दिया जाता। यह परम्परा तकरीबन 700 सालों से चली आ रही है । 1971 में यहां डेढ़ लाख लोगों का जमावड़ा हुआ था । इसके पहले भी डेढ़ लाख लोगों से ज्यादा हीं आते थे , पर 1991 से इस परम्परा को ग्रहण लग गया । 1991 में मात्र पचास हजार लोग हीं आ पाए । उसके बाद से यहां आने वाले लोगों में उत्तरोत्तर कमी आती गयी । इस कमी का एक कारण यह था कि लोग अब ज्यादा पढ़े लिखे हो गये हैं । उनको यह सब करना हास्यास्पद लगता है । दूसरी बात यह कि अब आवागमन का साधन हर जगह सुलभ हो गया है । लोग चार पांच घंटे में मिथिलांचल के किसी कोने तक पहुँच जाते हैं । इसलिए लोग खुद दौड़ धूप कर रिश्ता तय कर लेते हैं । जब यातायात के साधन नहीं थे तब सबको इस मेले की जरुरत थी । यहां बैठे बिठाए पूरे मिथिलांचल के लोगों से मुलाकात हो जाती थी । अच्छे रिश्ते मिल जाते थे ।

आजकल वर पक्ष और कन्या पक्ष के लोग आपसी तय तापर के बाद हीं इस मेले में आते हैं ताकि पंजीकार से गोत्र व रक्त सम्बंधी शुद्धता की जांच करवा सकें । कुछ अत्याधुनिक लोगों को गोत्र ओत्र से भी कोई मतलब नहीं होता । उनके लिए "मियाँ बीवी राजी तो क्या करेगा काजी " वाली बात सही लगती है । ऐसे लोग कोर्ट मैरिज करते हैं और बाद में रिसेप्शन देते हैं । लेकिन बड़े बुजुर्गों को सात सौ साल की यह परम्परा यूँ सेंत मेंत में खत्म होना बड़ा बुरा लग रहा है । पूर्वजों की सम्भाली यह संस्कृति ऐसे हीं बर्बाद होती हुई देखी नहीं जा रही है । उन लोगों ने " चलु सौराठ सभा " की मुहिम शुरु की है , जिसमें नौजवान भी शामिल हो रहे हैं । इस आंदोलन में शामिल लोगों ने बिहार सरकार से सौराठ में एक सामुदायिक भवन बनाने की मांग की है ताकि दूर दराज से आए लोगों के खाने व ठहरने का उत्तम प्रबंध किया जा सके ।

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