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गाय और इस्लाम

Bhola Tiwari Jul 29, 2019, 8:02 AM IST टॉप न्यूज़
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Neeraj Krishna

भारत में गो-हत्या वस्तुत: प्रथम साक्ष्य इब्राहीम लोदी के काल में मिलती है। लोदी वंश के संस्थापक बहलोल लोदी के मरने के बाद उसके बेटे सिकंदर लोदी ने 1489 ई. में जब सत्ता संभाली तो भारत में मंदिरों के ध्वंस का तीसरा अभियान शुरू हुआ। पहला अभियान महमूद गजनवी और दूसरा मुहम्मद गोरी ने क्रमश: 1024 ई. और 1175 ई. में चलाया था। तीसरे अभियान के एक वर्ष बाद ही सिकंदर लोदी की मौत हो गई और उसके बेटे इब्राहीम लोदी ने पिता के अभियान को आगे बढ़ाते हुए 66,000 हिन्दुओं को गुलाम बनाया और गोमांस बेचने के आदेश दिये।

इसके बाद बाबर का हमला हुआ, जिसने लोदी को परास्त कर 16 सितम्बर 1526 ई. को अपना शासन स्थापित किया। इतिहास में 1526 ई. से 1678 ई. तक (बाबर, हुमायूं और अकबर के शासन तक) गो-हत्या के प्रमाण नहीं मिलते। 1679 ई. में औरंगजेब के सत्ता में आने के बाद हिन्दुओं के धर्मान्तरण और गो-मांस का प्रचलन शुरू हुआ, जिसका हिन्दुओं ने डटकर विरोध भी किया।

उधर शिवाजी के हाथों अफजल खां के मारे जाने के बाद औरंगजेब ने शाइस्ता खां की कमान में पुन: एक सेना भेजी, जिसने पुणे पर कब्जा कर लिया। कब्जे के बाद शाइस्ता खां ने घोषणा की कि वह शिवाजी को गिरफ्तार करेगा और उन्हें गो-मांस खिलाकर मुसलमान बनाएगा। उसी रात शिवाजी ने अचानक हमला कर दिया और शाइस्ता खां भाग गया। 

गो-हत्या को अंग्रेजी सरकार ने 1891 ई. में कानूनी रूप से वैध ठहराया। ब्रिटिश पूंजी की एक तिहाई हिस्सेदारी से पारसियों ने कानपुर में मांस-निर्यात केन्द्र बनाया, जहां से प्रमुख रूप से गाय और सूअर के मांस का निर्यात होने लगा।

1892 ई. में "मांस-व्यापार' को ब्रिटिश सरकार ने सार्वजनिक कर दिया और कोलकाता में "मटन-मार्केट' बनाई। यहां से आज भी बकरी, भैंस, बैल, सूअर और गाय आदि कई पशुओं के मांस बाजार में भी जाते हैं और निर्यात भी होता है। कानपुर, सहारनपुर, बिहारशरीफ, केरल और कई उत्तर-पूर्वी राज्यों में गोहत्या आम बात है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संविधान के अनुच्छेद 48 के तहत पशुधन की वैज्ञानिक व्यवस्था के नाम से राज्यों को पशु हत्या के संदर्भ में जो निर्देश दिए गए हैं, उनमें गाय और बछड़े की विशेष चर्चा करके प्रतिबंधित किया गया है। हिरन, नीलगाय और कबूतर को भी इसी अनुच्छेद के अन्तर्गत सुरक्षा मिली है। कई राज्यों में यह संवैधानिक प्रतिबंध लागू है, लेकिन ज्यादातर राज्यों में या तो प्रतिबंध लागू नहीं है या प्रतिबंध का उपहास उड़ाया जाता है। यह स्थिति निरन्तर जारी है।

1958 ई. में हनीफ कुरैशी ने सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर करके केन्द्र सरकार से बकरीद के अवसर पर गाय की कुर्बानी की इजाजत मांगी थी, लेकिन न्यायालय ने इस सम्बन्ध में फैसला देते हुए दो प्रमुख बातें कहीं- 1. हिन्दुओं की पवित्र भावना का मान अनिवार्य है। 2. गाय की ही कुर्बानी अनिवार्य कर्तव्य नहीं है, दूसरे जानवरों की कुर्बानी से मजहबी रस्मों को निभाया जा सकता है।

1994 ई. में पश्चिम बंगाल सरकार ने भी केन्द्र सरकार से बकरीद में गाय की कुर्बानी के लिए इजाजत मांगी थी। उस समय भी सर्वोच्च न्यायालय का उपरोक्त फैसला ही सामने आया था।

संवैधानिक प्रतिबंध को स्वीकार करते हुए जमीअतुल-उलेमा-ए-हिन्द (जिसके अध्यक्ष मौलाना असद मदनी हैं) तथा आल इंडिया जमीअत-ए-कुरैश ने भी गोहत्या प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव पारित करके सरकार को भेज दिया है।

जिस तरह सूअर के मांस के नाम से मुसलमानों को दु:ख होता है, उसी तरह गो-हत्या हिन्दुओं को दु:खी करती है। इसी अहसास के तहत बाबर, हुमायूं, अकबर, शाहजहां, हैदर अली, टीपू सुल्तान, बहादुरशाह जफर, कश्मीर के महाराज जैनुल आबेदीन, नवाब वाजिद अली शाह तक ने गोहत्या को प्रतिबंधित किया था। अंग्रेजों ने इस संदर्भ का लाभ उठाकर दोनों के बीच फूट डालने का काम किया, लेकिन स्वतंत्रता संग्राम के सिपाहियों सर सैयद अहमद खां, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि ने भी हिन्दू भावनाओं की महत्ता को समझते हुए गोहत्या पर प्रतिबंध का समर्थन किया।

कुरान में खुदा-ए-करीम ने कहा है: "या अइयोहन्नासो कोलुमिम्मा फिलअर्जेहलालन तइय्यबा।' ऐ लोगो जिस कदर जमीन से उपजी हलाल (साफ-सुथरी) चीजें हैं, उन्हें शौक से खाओ।

इसका अर्थ है कि इस्लामी आदेश सब्जी खाने पर बल देता है। मांस के लिए "अरबी' शब्द है: "लह्म'। कुरान में "फिल लह्मे हलालन तइय्यबा' (मांस में से साफ-सुथरी चीजें) कहीं नहीं लिखा है। यानी इस्लाम ने मांस खाने के बारे में कहीं कोई स्पष्ट आदेश नहीं दिया है। 

जिस प्रकार इस्लाम में हलाल किये गये मांस- गाय, बकरी, भैंस, मुर्गा, बटेर, खरगोश, हिरन आदि खाने की छूट है, उसी प्रकार मेहनत करके रोटी खाने का हुक्म भी है। "अक्लेहलाल' यानी "हलाल रोजी', मगर अनेक ऐसे भी हैं, जो दूसरों का अधिकार छीनकर खा रहे हैं। इस्लाम ने इसके अलावा भी बहुत सारे कार्यों का आदेश दिया है, लेकिन क्या तमाम इस्लामी कार्य ईमानदारी से किए जा रहे हैं? यकीनन नहीं! तो फिर गो-हत्या के मामले में प्रतिक्रियात्मक जिद का क्या मतलब है? अब हलाल चीजें या हलाल मांस खाने का अधिकार अगर मुसलमानों को प्राप्त है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि अपने अधिकारों को हर घड़ी जतलाया ही जाए। गोहत्या तब प्रतिबंध के हिन्दू आंदोलन की मर्यादा बहाल रखने में मुसलमान आगे आएंगे तो यह नये भारत के निर्माण में सहयोग होगा।

........क्रमश

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