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“ यह गाँव बिकाऊ है ” के बहाने किसानों की व्यथा

Bhola Tiwari Jul 27, 2019, 7:30 AM IST टॉप न्यूज़
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 नीरज कृष्ण 

किसान की फसल जब तबाह हो जाती है 

तब सियासत की फसल लहलहा उठती है।

'भारत एक कृषि-प्रधान देश है' जब यह पंक्ति हमारे नीति-निर्माता, योजनाकार जब मौके-मौके पर कहते हैं तो उनके मुँह से यह सुनकर न तो हँसी आती है और न ही गुस्सा, बल्कि यह सोचना पड़ता है कि हमारे ये नीति-नियामक या तो मूर्ख हैं या फिर धूर्त। हाँ, भोले तो कतई नहीं। 

अगर वे देश के कृषि प्रधान होने के मर्म को वाकई समझते होते तो देश के किसानों का दर्द या उनकी बदहाली को भी शिद्दत से अवश्य ही महसूस करते जब वे इस तथ्य से अवगत हैं कि देश की दो तिहाई आबादी की आजीविका खेती से जुड़ी हुई हो तो। 

खेती-किसानी कभी मुनाफे का धंधा हुआ करती थी, लेकिन अब वह घाटे का कारोबार हो गई है। देश में खेती-बाड़ी की बदहाली हाल के वर्षों की कोई ताजा परिघटना नहीं है, बल्कि इसकी शुरूआत आजादी के पूर्व ब्रिटिश हुकूमत के समय से ही हो गई थी। अंग्रेजों से पहले के राजे-रजवाड़े खेतीबाड़ी के महत्व को समझते थे। इसलिए वे किसानों के लिए नहरें-तालाब इत्यादि बनवाने और उनकी साफ-सफाई करवाने में पर्याप्त दिलचस्पी लेते थे। 

एम. एम. चन्द्र जी का उपन्यास “ यह गाँव बिकाऊ है ” की पुरी कथानक गाँव एवं किसानों के इर्द-गिर्द घूमते हुए उनकी परेशानियों पर मूलतः केन्द्रित है। उदारीकरण के झांसे में आकर बेहतर भविष्य की तलाश में फतह जब अपने पैत्रिक गाँव नंगला से हजारों किलोमीटर दूर शहर से अपने मिल के अनायास ही बंद हो जाने के कारण अपने जीवन-निर्वहन के लिए पुनः 23 वर्षों के अपने गाँव लौटता है और गाँव के ही एक प्रतिष्ठित जमींदार बल्ली का रैयत बन जाता है। जी हां.... यह वही बल्ली है जो सकरार के गलत उपभोक्तावादी नीतिओं का शिकार बनता है और नयी तकनीक एवं नयी बीजों के माध्यम से खेती-बाड़ी प्रारंभ करता है। शुरूआती दौर में तो यूज़ काफी मुनाफा होता है..... जिसकी नक़ल उसके अन्य मित्र एवं ग्रामीण भी करते हैं.......पर अत्यधिक कीटनाशक दवाओं के प्रयोग के प्रभाव से जब किसान की खेत बंजर भूमि में परिवर्तित होने लगती है एवं सरकार के तरफ से नाम मात्र के कुछ रूपये मुआवजे के तौर पर बल्ली को मिलते हैं तो वह आहत होकर अपने ही खेत में लगे एक वृक्ष में रस्सी के फंदे के सहारे अपने जीवन का अंत भी कर लेता है। रचनाकार ने कर्ज के कुचक्र को दर्शाने के लिए फतह से इच्छा जाहिर करवाता है कि वह बल्ली से कर्ज लेकर अपने पुत्र को आगे की पढाई जारी रखेगा, तब उसकी अनपढ़ पत्नी कर्ज लेने से मना कर देती है क्यूंकि वे लोग कर्ज के कुचक्र को पूर्व में भोग चुके है। पुस्तक के रचनाकार ने भारतीय शासन व्यवस्था पर बहुत ही गहरा कटाक्ष किया है– ‘जब किसान ही दिल्ली तक अपनी बात रखने के लिए मजबूर हो गया, तब इससे आपतिजनक घटना और क्या हो सकती है’, परंतु किसानों की बात को हलके में लेने एवं उनका प्रतिकार करने पर बड़े ही खूबसूरती से रचनाकार ने अपने दर्द को व्यक्त किया है- ‘भारत जैसे देश में प्रश्न करना आज भी गैर लोकतान्त्रिक माना जाता है। ‘हमें ही विकल्प देना होगा’की मानसिकता से जब नंगला के ही चार किसान-पुत्र जब अतिरेक उत्साह के साथ किसानों के उत्थान एवं उनकी समस्याओं के निराकरण के लिए विशुद्ध गैर-राजनैतिक एक किसान-संगठन की आवश्यकता महसूस करते हैं तो बड़े ही बेबाकी से रचनाकार ने- ‘भारत में हर बदलाव, क्यों परिवार तक आते-आते, बदहाल हो जता है?’, लिखकर हमारे सामाजिक संरचना पर प्रश्न उठा दिया है क्यूंकि ‘पढ़ लिख कर इंसान डरपोक और हिसाबी हो जाता है’परंतु उत्साही युवकों को ने इस बात को अच्छी तरह से इस रहस्य को समझ लिया था कि ‘जागरूकता कोई सामान्य घटना नहीं है। जागरूकता इतिहास बदल देती है। ये चारो युवक अपने गाँव समेत निकटवर्ती गाँव के किसानों को यह समझाने में सफल हो चले थे कि ‘घोषनाएँ और आश्वासन नेताओं का अचूक हथियार है, जिन्हें अभी तक अपनाया जा रहा है’ ष्और वर्तमान राजनीतिज्ञ अपनी छुद्र लिप्सा के लिए हमें जात-पात एवं हिन्दू-मुसलमान जैसे मुद्दों में उलझाए रहते है जबकि ‘समूह की ताकत ही, हमारी ताकत है, बिखराव या अलगाव हमें ज्यादा दिन जिन्दा नहीं रहने देगी।  नंगला गाँव के चारो युवाओं के निःस्वार्थ प्रयासों से एक स्थानीय पत्रकार कबीर काफी प्रभावित होता है और वह अपने समाचार-पात्रों के माध्यम से स्थानीय सांसद पर ग्रामीणों की समस्याओं पर ध्यान देने की दबिश बनाए रखने में सफल भी हो जाता है। चारो युवाओं के प्रयास के परिणामों का फल यह निकला कि समाचार पत्रों में स्थानीय सांसद की लागातार आलोचना छपने लगी और इस मुहीम को कमजोर करने के लिए युवाओं के इस संगठन को छिन्न-भिन्न करने के लिए जातीय हथकंडे को भी अपनाने से बाज नहीं आते हैं और तब रचनाकार ने बड़े ही सरल शब्दों में बहुत कुछ कह दिया है ‘दुनिया बदलने चला था। एक ही फैसले ने उसकी दुनिया बदल दी।‘आन्दोलन जरुर कुछ कमजोर पड़ता है क्यूंकि आन्दोलनकारी समूह का सबसे तेज-तर्रार सदस्य अचानक शहर की ओर भेज दिया जाता है पर यह युवक इस मर्म को भली-भांति जनता है कि ‘बदलाव के लिए कहीं से भी प्रयास हो सकते हैं। जहाँ भी रहो, सामाजिक बदलाव में अपनी भूमिका निभाते रहना चाहिए।‘ युवाओं की सामूहिकता के ताकत की समझ का यह परिणाम हुआ कि नंगला समेत अन्य निकटवर्ती गाँव की महिलों ने भी किसान हित के लिए सड़कों पर उतरने का फैसला लिया और दूसरी तरफ लोगों ने बैनर के माध्यम से अपने गाँव की समस्याओं के निराकरण के लिए आर्थिक सहयोग प्राप्त करने के लिए अपने किडनी को बेचने का निर्णय लिया जो कालांतर में ‘यह गाँव बिकाऊ है’ जैसे मुहीम में तब्दील हो गयी जिसका सुखद परिणाम यह हुआ कि आस-पास के कई गाँव भी इसके प्रभाव में आ कर अपने गाँव को बेचने के लिए खरीदारों का इन्तजार करने लगे। 

एक बहुत ही सुनियोजित तरीके से आज तक की सभी सरकारों की यह मंशा रही है कि गाँव के किसानों को बाध्य कर दिया जाये कि वह लचर होती किसानी को छोड़ कर शहर के पूंजीपति उद्योगपतिओं के कल-कारखानों/ उद्योगों में उन्हें एक मजदुर के रूप में उपलब्ध हो सकें। किसान फसल आने के पहले ही कर्जा लेते हैं तो छोटे व्यवसायी और अन्य श्रमिक वर्ग आय के मौसम के आधार पर उधार पर खरीददारी करने लगा है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे देश में उपभोग प्रवृत्ति में गुणात्मक परिवर्तन आया है जबकि आय के विषय में यह बात नहीं कही जा सकती। स्थिति यह है कि लोगों ने खाने पीने से अधिक आधुनिक सामानों पर व्यय करना शुरु कर दिया है। किसान, छोटे व्यापारी तथा लघु उद्योगपति की आय के स्वरूप में वैसी प्रगति नहीं हुई पर उपभोग प्रवृत्ति के बदलाव ने उन्हें निम्न वर्ग में ला खड़ा कर दिया है।

कहने का अभिप्राय यह है कि हमारे देश के आर्थिक, सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक विद्वानों को समाज को एक इकाई मानकर विचार करना चाहिये। इस देश में भूमिस्वामी तथा मजदूर दोनों ही किसान की श्रेणी में आते हैं। अगर परेशान हैं तो दोनों ही हैं। किसानों की आत्महत्या का एक सामाजिक पहलु अवश्य दर्दनाक है कि आमतौर से ग्रामीण क्षेत्रों में इस तरह की घटनायें नहीं होती थीं पर यह भी सच है कि शहरी हवाओं ने अब ग्रामों में बहना शुरु कर दिया है। इसलिये पूरे समाज की स्थिति पर दृष्टिपात करना होगा।.....

जिस खेत से दहका को मयस्सर नहीं रोटी 

उस खेत के हर गोशा ए गंदुम को जला दो !

अल्लामा इकबाल ने जब ये शेर कहा था तब के दौर की यही इन्तहा रही होगी मगर आज इंतिहा अपने हदे पार कर चुकी है। किसानो के नाम पर बेशर्म सियासत का बाजार गर्म है। मगर मुल्क के किसान की निगाह में उसका आसरा अब महज रस्सी का वो टुकड़ा ही रह गया है जिसे गले में फंसा कर वो मौत की पनाह में चला जा रहा है।

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