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उत्तरकाशी की बेटियां...

Bhola Tiwari Jul 25, 2019, 1:35 PM IST टॉप न्यूज़
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 कबीर संजय

नीचे जो तस्वीर आप देख रहे हैं, वह उत्तरकाशी की बेटियों की नहीं है। ये तस्वीर चंद्रयान-2 के सफल प्रक्षेपण के बाद की है। चंद्रयान-2 से जुड़ी महिला वैज्ञानिक एक-दूसरे को बधाई दे रही हैं। तो फिर उत्तरकाशी की बेटियां कहां गईं। वो एक सामूहिक हत्याकांड का शिकार हो गईं। एक ऐसा हत्याकांड जिसमें हम और आप भी किसी न किसी तरह से शरीक हैं। 

देवभूमि उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले से यह भयावह समाचार आया है। यहां के 133 जिलों में बीते तीन महीने से एक भी लड़की पैदा नहीं हुई। जबकि, इस दौरान पैदा होने वाले लड़कों की संख्या 216 है। अब अगर प्राकृतिक संतुलन की बात करें तो जितने लड़के पैदा हुए, उतनी ही लड़कियां भी पैदा होनी चाहिए। क्या समझा जाए, कितनी लड़कियों की हत्या हुई है। 

इस सामूहिक हत्याकांड का खुलासा भी ठीक उसी समय में हो रहा है जब एक बेटी बीस दिनों के अंदर छह स्वर्णपदक ला रही है। जबकि, इससे ठीक पहले साक्षी मिश्रा नाम की एक बेटी की मौत की कामना सिर्फ इसलिए की जा रही थी क्योंकि उसने खुद से यह तय कर लिया कि उसे किसके साथ जीवन बिताना है। उसके इस निर्णय से असहमत न जाने कितने दिमागों में यही विचार सबसे पहले कौंधा कि इससे अच्छा तो वह मर ही गई होती। ऐसी बेटियों को क्यों न कोख में ही मार दिया। 

बड़े अफसोस की बात है कि यह बीमारी पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश से होते हुए पहाड़ों तक चली गई। गंगोत्री यहीं पर है। जहां पर इन बेटियों का हत्याकांड हुआ है। यह वही पहाड़ जहां की महिलाएं पहाड़ जैसा धीरज और उसके जैसे ही हिम्मत लेकर पैदा हुई हैं। महिलाओं को पीठ पर सिलेंडर लादकर पहाड़ लांघते यहीं पर देखा जा सकता है। अपने आदमी को पीठ पर लादकर अस्पताल पहुंचाने वाली भी यही औरतें हैं। पहाड़ की यही मातृशक्ति थी जिसने चिपको आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई थी, एक-एक पेड़ को कटने से बचाने के लिए वे पेड़ को पकड़कर खड़ी हो गईं। काटना है तो पहले हमें काटो। 

पहाड़ की इसी मातृशक्ति के बलिदान से आज उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आया है। उसी देवभूमि में अब बेटियों को कोख से ही विदा किया जा रहा है। यूं तो यह बीमारी हमारे समाज की रगों में पहले से ही जड़ जमाए हुए थी। लेकिन, विज्ञान ने इस बीमारी को कई गुना बढ़ा दिया है। आज अगर पहली संतान बेटी पैदा हो गई, तो दूसरे बच्चे की कोख में ही लिंग जांच लगभग तय हो गया। दूसरी भी संतान अगर बेटी होने वाली है, तो फिर कोख में ही उसकी हत्या होनी है। अगर पहली संतान बेटा हो गया तो फिर हो सकता है कि भ्रूण का लिंग जानने की जरूरत ही नहीं पड़े। चलो एक बेटा पहले से है, एक बेटी हो भी गई तो क्या फर्क पड़ता है। 

अपनी बेटियों का हत्यारा। यह एक बीमार समाज है। अपने आस-पास निगाह उठाकर देखा जाए। क्या यह हत्यारे हमारे आस-पास नहीं घूम रहे हैं। हमारे खुद के नाते-रिश्तेदार नहीं हैं। क्या उनके बारे में कहीं न कहीं से जानकर भी या फिर उसका आभास होने के बावजूद चुप रहना, हमारे खुद उस अपराध में शामिल होने का सबूत नहीं है। 

गौर से देखेंगे तो चंद्रयान-2 की सफलता को सेलीब्रेट करने वाली महिला वैज्ञानिकों की तस्वीर में उन अजन्मी बेटियों की रूहें भी पीछे से झांकती हुई दिखेंगी। ऐसा ही कुछ हिमादास और द्युती चंद की तस्वीरों के पीछे भी देखा जा सकता है और साक्षी मिश्रा की भी।

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