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"वर्सोवा संधि" की छाया में किया गया "शिमला समझौता"

Bhola Tiwari Jul 24, 2019, 5:13 PM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

1971 के युद्ध में पाकिस्तान बुरी तरह पराजित हुआ।भारत ने पाकिस्तान के पूर्वी प्रदेश को अलग कर एक अलग देश बांग्लादेश के उदय का मार्ग प्रसस्त कर दिया था।जो जुल्फिकार अली भुट्टो कहते थे कि हम घास की रोटी खाकर हिंदुस्तान से हजार साल लड़ेंगे, समझौते का रास्ता खोजने लगे थे।1971 के युद्ध में पाकिस्तानी सेना के 93,000 हजार जवान जनरल नियाजी के नेतृत्व में आत्मसमर्पण कर दिया।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को अच्छी तरह समझ आ गया था कि भारत से युद्ध में नहीं जीता जा सकता।अमेरिका की तरफ से भारत के ऊपर कई तरह से दवाब बनाया गया मगर इंदिरा गांधी टस से मस नहीं हुईं फिर पाकिस्तान के वजीरेआजम भुट्टो अपनी 19 वर्षीय बेटी बेनजीर के साथ शिमला पहुँचें।

पाकिस्तान की तरफ से बातचीत का जिम्मा वरिष्ठ डिप्लोमेट और प्रशासनिक सेवा के सबसे अनुभवी अधिकारी अजीज अहमद को सौंपा गया था।वाकई वे बेहद मिलनसार और सुलझे हुए इंसान थे।सबसे बड़ी बात ये थी कि उन्हें पाकिस्तान की सेना और आईएसआई भी पसंद करती थी।

भारत की तरफ से बातचीत का जिम्मा प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दुर्गा प्रसाद धर जो बहुत सुलझे हुए डिप्लोमेट थे उन्हें सौंपा गया।ऐन वक्त पर धर बीमार पड़ गए, आननफानन में ये जिम्मेदारी वरिष्ठ नौकरशाह परमेश्वर नारायण हक्सर(पी.एन.हक्सर)को सौंपी गई।हक्सर इंदिरा गांधी के बेहद करीब थे और लगातार छह साल उनके प्रिंसिपल सेक्रेटरी रह चुके थे।

हक्सर का नजरिया पाकिस्तान को लेकर कुछ अलग सा था।वो इस सिद्धांत पर विश्वास करते थे कि किसी को भी हद से ज्यादा झुकाना ठीक नहीं है, मजबूर व्यक्ति विद्रोही हो जाता है और वह ज्यादा नुकसान करता है।हक्सर के दिमाग में "वर्साय संधि" थी।ये संधि जर्मनी के लिए बेहद अपमानजनक थी मगर दवाव में आकर जर्मनी को इस समझौते पर हस्ताक्षर करना पड़ा था और यही अपमानजनक संधि द्वितीय विश्वयुद्ध का कारण बनी।

हक्सर ने इसी वजह से हारे हुए पाकिस्तान पर ज्यादा दवाब नहीं डाला।

शिमला संधि के मुक्कमल होने के बाद भारत ने पाकिस्तान के 93,000 सैनिकों को छोड़ दिया, युद्ध में जीती हुई 5,600 वर्ग मील जमीन भी पाकिस्तान को लौटा दिया।जबकि पाकिस्तान ने अपने जैल में बंद 54 युद्धबंदी को भारत के लाख कहने के बाद भी नहीं छोडा।

कहने का लब्बोलुआब ये है कि "वर्सोवा संधि" की छाया में भारत ने "शिमला समझौता" किया, जो कहीं से भी भारत के लिए फायदेमंद साबित नहीं हुआ।पाकिस्तान को समझौता के अनुसार वैश्विक मंच पर इस मामले को नहीं उठाना था,मगर पाकिस्तान ने समझौते के बाद हीं कई बार समझौता को तोडा और आज भी वही कर रहा है।भारत शिमला समझौता और लाहौर घोषणापत्र के अनुसार द्विपक्षीय वार्ता का हिमायती है मगर पाकिस्तान कश्मीर मामले पर मध्यस्थता चाहता है।पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर में रेफरेंडम की बात करता है जो शिमला समझौते के विरुद्ध है।

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