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मध्यस्थता की बात केवल स्वार्थ के लिए बोल रहें हैं डोनाल्ड ट्रंप

Bhola Tiwari Jul 24, 2019, 12:44 PM IST टॉप न्यूज़
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 अजय श्रीवास्तव

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान से व्हाइट हाउस में बातचीत करते समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह कहकर सनसनी फैला दी कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें कश्मीर मसले पर मध्यस्थता करने को कहा था।उन्होंने कहा कि,"मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दो हफ्ते पहले मिला था और हमने इस मुद्दे पर बात की थी।उन्होंने कहा कि आप मध्यस्थता करेंगे?मैंने कहा किस पर तो उन्होंने कहा कि कश्मीर।उन्होंने कहा बहुत सालों से ये विवाद चल रहा है,वो मुद्दों का हल चाहते हैं और आप भी इसका हल चाहते हैं।मैंने कहा कि मुझे इस मुद्दे में मध्यस्थता करके खुशी होगी।"

डोनाल्ड ट्रंप के इस बात पर इमरान खान भी भौचक रह गए, उन्हें तो बिन मागें सबकुछ मिल गया था।वे मुक्तकंठ से राष्ट्रपति ट्रंप की प्रशंसा में बिछ से गए।उन्होंने कहा आप दूनिया के सबसे ताकतवर मुल्क के ताकतवर राष्ट्रपति हैं और अगर आप पहल करें तो सबकुछ मुमकिन हो सकता है।आपके प्रयास से 70 साल की अदावत दोस्ती में तब्दील हो सकती है।

डोनाल्ड ट्रंप और इमरान खान की मीटिंग खत्म होते हीं अमेरिका के डेमोक्रेट सांसद ब्रैड शेरमैन ने ट्रंप को लताडते हुए कहा,"हर कोई जो दक्षिण एशिया की विदेश नीति के बारे में कुछ भी जानता है, वह जानता है कि कश्मीर मसले में भारत लगातार तीसरे पक्ष की मध्यस्थता का विरोध करता रहा है।सभी जानते हैं कि पीएम मोदी कभी ऐसी बात नहीं करेंगे, ट्रंप का बयान गलत और शर्मनाक है।"

अपने दूसरे बयान में ब्रैड शेरमैन ने कहा,"मैंने डोनाल्ड ट्रंप की शौकिया और शर्मनाक गलती के लिए भारतीय राजदूत हर्ष वी श्रृंगला से माफी मांगी।"

इधर भारत का विदेश मंत्रालय पल पल की खबर पर नजर रख रहा था, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने त्वरित प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि,"हमने अमेरिका के राष्ट्रपति की टिप्पणी देखी कि यदि भारत और पाकिस्तान कश्मीर के मुद्दे पर अनुरोध करते हैं तो वह मध्यस्थता करने को तैयार हैं।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से ऐसा कोई अनुरोध नहीं किया, भारत अपने रूख पर अडिग है।"

दूसरे ट्वीट में रवीश कुमार ने लिखा,"पाकिस्तान के साथ सभी लंबित मुद्दों पर केवल द्विपक्षीय चर्चा की जाती है।पाकिस्तान के साथ तभी बातचीत होगी जब वह सीमा पर आतंकवाद को खत्म करे।शिमला समझौता और लाहौर घोषणा भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय रूप से सभी मुद्दों को हल करने का आधार प्रदान करते हैं।"

आपको बता दें ये सारी कवायद अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज को पूरी तरह से निकालने और वहाँ पर शांति स्थापित करने के लिए है,जिसमें भारत को मोहरा बनाया जा रहा है।डोनाल्ड ट्रंप जानते हैं कि बिना पाकिस्तान की मदद से अफगानिस्तान में शांति स्थापित नहीं की जा सकती क्योंकि तालिबान पर पाकिस्तानी हुकूमत की अच्छी पकड़ है और हो भी क्यों नहीं पाकिस्तान हीं तो तालिबान को हथियार और गोलाबारूद मुहैय्या करवाता है।आतंकी हमले के बाद भागकर आतंकी अपने सुरक्षित पनाहगाह में छूप जाते हैं।ट्रंप को अच्छी तरह से पता चल गया है कि अफगानिस्तान में शांति प्रक्रिया की बहाली के लिए पाकिस्तान बेहद जरूरी है।डोनाल्ड ट्रंप युद्धरत अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज की पूर्ण वापसी चाहते हैं और ये पाकिस्तान के सहयोग के बिना संभव नहीं, उधर लगभग कंगाल हो चुके पाकिस्तान भी डेढ साल से अमेरिकी सहायता के बिना बदहवासी की अवस्था में है।वो अमेरिका से करोड़ों डाँलर की रूकी हुई आर्थिक सहयाता को बहाल करवाना चाहता है।दोनों के हित एक दूसरे से जुड़े हैं।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने ये दावा किया है कि उसके शासनकाल में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में अपनी दशकों पुरानी रणनीतिक पहुंच की नीति छोड़ दी।उन्होंने कहा कि यह पूर्व में इस भय के चलते शुरू हुई कि अफगानिस्तान में भारतीय प्रभाव होने पर पाकिस्तान को दोनों ओर से खतरे का सामना करना होगा।इमरान खान ने कहा,"हम मानते हैं कि हमें अफगानिस्तान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए,यह अब बड़ा अंतर आया है।हमारी(निर्वाचित सरकार और सेना)की ही सोच है।"

इमरान खान का यह बयान दर्शाता है कि पाकिस्तान कहाँ तक अफगानिस्तान में दखल देता है और यही वैश्विक जगत की भी धारणा है कि तालिबान के साथ पाकिस्तान के सामांतर रिश्ते हैं।अफगानिस्तान में आतंकवाद को बढ़ावा देने में पाक की अहम भूमिका है मगर अब ट्रंप की नजर में क्षेत्र में अशांति और आतंकवाद के लिए पाकिस्तान की तालिबान के साथ प्राक्सी रिश्ते जिम्मेदार नहीं है।अमेरिकी राष्ट्रपति की नजर में पाकिस्तान से बडा खतरा अफगानिस्तान है,जिससे निपटना उनकी प्राथमिकता है।

गौरतलब बात तो ये है कि अब अमेरिका युद्धरत अफगानिस्तान से अपने सैनिकों की वापसी चाहता है।डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव के समय ये वायदा भी किया था मगर हकीकत तो ये है कि अफगानिस्तान में तालिबान अमेरिकी फौज के दांत खट्टे कर रहा है।रात के अंधेरे में तालिबान की हुकूमत चलती है, तालिबान हीं वहाँ विभिन्न टैक्सों की वसूली करता है।मंडियों और बाजारों पर तालिबान के लडाके हीं राज करते हैं।यद्यपि पाकिस्तान के सहयोग से अमेरिका तालिबान से एक मजबूत संधि करने के फिराक में है और इस वार्ता में पाकिस्तान ने अमेरिका का सहयोग भी किया था।

भारत सदा हीं पाकिस्तान से द्विपक्षीय वार्ता का हिमायती रहा है और कोई भी भारतवासी ये स्वीकार नहीं कर सकता है कि नरेंद्र मोदी ने डोनाल्ड ट्रंप को मध्यस्थता के लिए कहा होगा।भारत हमेशा पाकिस्तान से शिमला समझौता के प्रावधानों के तहत बातचीत करता है और आगे भी करेगा।विदेश मंत्री ने संसद में विदेश नीति में किसी तरह के बदवाल से इंकार किया है।

अमेरिका और पाकिस्तान के बहुत से समाचार पत्रों ने लिखा है कि इमरान खान का ये यात्रा पूरी तरह प्रायोजित था।इस वार्ता का मुख्य एजेंडा अफगानिस्तान था ना कि पाकिस्तान।अमेरिका युद्धरत अफगानिस्तान में 18 सालों से है और वह आतंक को रोकने में विफल रहा है।कई बार तो अमेरिका को तालिबान को रोकने के लिए धन मुहैया करवाना पडा है।

डोनाल्ड ट्रंप ने मध्यस्थता की बात कहकर पाकिस्तान को खुश कर दिया है मगर इससे कुछ हासिल होने वाला नहीं है।भारत किसी भी दवाब में मध्यस्थता की बात स्वीकार नहीं करेगा ये तो तय है।आज नहीं तो कल अमेरिका पाकिस्तानी सहायता को बहाल कर देगा और अफगानिस्तान को उसके उसी हालत में छोड़कर अमेरिकी सैनिक वापस अपने घर चले जाएंगे।

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