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सोनभद्र नरसंहार :अतीत में हुई गलतियों का खामियाजा

Bhola Tiwari Jul 21, 2019, 8:36 AM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

सोनभद्र के गाँव उम्भा में हुए नरसंहार ने इस जिले को लाइमलाइट में ला दिया है,नहीं तो इस जिले की गिनती सदैव "अवैध खनन में अव्वल" में की जाती थी।आज सोनभद्र का "क्रसर उद्योग" लगभग मृतप्राय है,तमाम कोशिशों के बावजूद शासन-प्रशासन आँखें बंद करके पड़ा है।विडंबना देखिए कभी खनन उद्योग के कारण हीं यह जिला प्रदेश के सबसे अधिक राजस्व देनेवाले प्रथम तीन जिलों में शामिल था मगर आज यहाँ भूखमरी है,पलायन है।यहाँ के मूल निवासी गोड़,चेरो,बैगा,खरवार आदि जातियाँ जो खनन उद्योग में मजदूरी करके अपना पेट भरते थे आज पलायन के लिए मजबूर हैं।सोनभद्र के खनन उद्योग पर भू माफियाओं,भ्रष्ट अधिकारियों, नेताओं के अलावा एनजीटी, हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट की नजर लग गई है।इन सभी के शिकंजे में कसा सोनभद्र का खनन उद्योग अब लगभग मृतप्राय है,जिसके कोमा से वापस आने की कोई उम्मीद दूर दूर तक नहीं दिखती।

17 जुलाई,2019 की एक आम दुपहरी।ग्रामीण अपने काम पर लगे थे,वे देखते हैं कि ग्राम प्रधान यज्ञदत्त गुर्जर 32 टैक्टर ट्रालियों से करीब तीन सौ आदमी को लेकर विवादित जमीन पर आता है और जमीन को जोतने लगता है।सदियों से वहाँ रह रहे गोंड जाति के आदिवासी वहाँ आकर ग्राम प्रधान को जमीन जोतने से रोकते हैं।प्रधान यज्ञदत्त गुर्जर और उसके साथी वहाँ पहुँचे गोडों को मारकर भगा देते हैं।गोंड भागकर गाँव आते हैं और फिर बडी संख्या में गाँववाले लाठी-डंडा, तीर-धनुष और बर्छी लेकर मुकाबले के लिए पहुंचे जाते हैं।फिर मारपीट शुरू हो जाती है, फिर प्रधान के गुंडे अंधाधुंध फायरिंग करने लगते हैं जिसमें 11 पीडित गाँववालों की मौत हो जाती है और लगभग बीसों घायलावस्था में जिला अस्पताल, राबर्ट्सगंज में भर्ती कराये जाते हैं।ग्रामीणों का आरोप है कि एक घंटे के बाद पुलिस आती है जब सबकुछ खत्म हो चुका होता है।डायल 100 भी नरसंहार के बाद पहुँचती है।समय से एंबुलेंस अगर घटनास्थल पर पहुंच जाती तो बहुत से गंभीर घायलों को बचाया जा सकता था जिन्होंने खेत में या एंबुलेंस में दम तोड़ दिया था।

दोपहर के दो से ढाई के बीच सारा सरकारी अमला वहाँ पहुंच जाता है।प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तुरंत डीजीपी ओम प्रकाश सिंह को निर्देश देते हैं कि वह इस मामले में खुद नजर रखे और प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करे।मुख्यमंत्री ने मीरजापुर के कमिश्नर और वाराणसी जोन के एडीजी को भी निर्देश दिये कि वे संयुक्त रूप से इस घटना के कारणों की जाँच करें और चौबीस घंटे के अंदर जिम्मेदारी तय करें।

ग्रामप्रधान के एक भाई और दो भतीजे को छह साथियों समेत शाम तक गिरफ्तार कर लिया जाता है।तीन दिनों के बाद आरोपी प्रधान को भी पुलिस एक दबिश देकर पकड लेती है।आरोपियों के पास से सारे हथियारों को जब्त कर लिया जाता है।

ग्रामीण रामराज की तहरीर पर 27 नामजद के साथ 50 अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया।

आपको बता दें ये विवाद लगभग पाँच दशक पुराना है।1952 में एक आईएएस/आईएफएस अफसर के भष्टाचार ने इस हत्याकांड की नींव रखी थी।1952 में आईएएस प्रभात मिश्रा ने अपने परिवार के सदस्यों के नाम पर एक सोसायटी की स्थापना की।उन्होंने हीं इस सोसायटी को 112 बीघा जमीन के इस विवादित प्लाँट का संरक्षक नियुक्त किया।दरअसल यह जमीन ग्राम सभा की थी और तत्कालीन तहसीलदार को मिलाकर इसे सोसायटी के नाम करवा लिया गया।यहीं से विवाद शुरू हुआ और आज भी बदस्तूर जारी है।आपको बता दें यह जमीन सोनभद्र के प्रतिष्ठित राजा बडहर की है।यह 600 बीघा जमीन एक समय बड़हर के राजा आनंद ब्रह्मशाह के कब्जे में था।जमींदारी प्रथा के खत्म होने के बाद इस बंजर जमीन को राजस्व विभाग के अभिलेखों में बंजर भूमि घोषित कर दिया गया था।राजा साहब को अपने जमीन की चिंता भी नहीं थी और उन्होंने इसके लिए वाद भी दायर नहीं किया।ये जमीन उ.प्र और म.प्र की सीमा पर है और वाकई ये पथरीली जमीन है।उन दिनों वहाँ सिंचाई के साधन नहीं थे।गोंड आदिवासी खाली पडे जमीन के ऊपर थोडा बहुत खेती करके अपनी जीविकोपार्जन करते थे।आईएएस मिश्रा जी की नजर उस जमीन पर थी और वे राजस्व विभाग के लोगों को मिलाकर विवादित जमीन को अपने सोसायटी के नाम लिखा लिया।यह जमीन मिश्राजी ने अपने ससुर और मुज्जफरपुर निवासी माहेश्वरी प्रसाद सिन्हा को "आदर्श कोआपरेटिव सोसायटी लि.आँफ उम्भा" का अध्यक्ष और अपनी पत्नी आशा मिश्रा को पदाधिकारी बना दिया।इसी तरह अपनी बेटी विनिता को मैनेजर बताते हुए कुल 463 बीघा जमीन उनके नाम पर रजिस्ट्री कर दी।सिन्हा की मृत्यु के बाद 06 सितंबर 1989 को 200 बीघा जमीन आशा और विनिता के नाम ट्रांसफर कर दी गई।

इसी 200 बीघे जमीन में से ग्राम प्रधान को 144 बीघे दो करोड़ रुपए में बेची गई।

ग्राम प्रधान ने 19/10/2017 को एक आवेदन जिलाधिकारी के पास दाखिल किया गया, जिसमें कहा गया था कि इस जमीन का नामांतरण यज्ञदत्त गुर्जर के नाम होना चाहिए।गाँव वालों को जब पता चला तो उन्होंने जिलाधिकारी से मिलकर ये सारी बातों को बताया।तब जिलाधिकारी ने अस्सिटेंट रेवेन्यू आँफिसर को आदेश दिया कि वह यह जाँच करें कि यह जमीन सोसायटी और फिर यज्ञदत्त के नाम पर कैसे ट्रांसफर हुआ।

मुख्यमंत्री ने सख्त कदम उठाते हुए घोरावल के उप-जिलाधिकारी पीपी तिवारी,सीओ अभिषेक सिंह, कोतवाल अरविंद मिश्रा व क्षेत्र के दारोगा सहित चार सिपाहियों को निलंबित कर दिया है और अभी कईयों पर गाज गिरनी बाकी है।आकंठ भष्टाचार में डूबे रिश्वतखोर अधिकारियों के इस खेल में 11 मासूम सिस्टम की बलि चढ़ गए और मुख्यमंत्री का कहना है कि उस समय प्रदेश में कांग्रेस का शासन था और वही इसके लिए जिम्मेदार हैं।

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