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सामाजिक संबंध बेहतर नहीं होंगे तो पानी का संकट भी गहराएगाः सोपान

Bhola Tiwari Jul 21, 2019, 8:19 AM IST टॉप न्यूज़
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 दिनेश त्रिनेत

पानी का संकट जो पर्यावरणविदों के बीच और सेमिनारों में चर्चा का विषय था, एक आसन्न संकट बन सामने खड़ा हो गया है. गांवों में पानी खरीदकर पीना पड़ रहा है. कई शहरों में पानी आने वाले वर्षों में बिल्कुल खत्म होने की चेतावनी मिली है. नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, देश इतिहास के सबसे गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है. करीब दो लाख लोग स्वच्छ पानी न मिलने के चलते हर साल जान गंवा रहे हैं. लगभग 60 करोड़ लोग पानी की किल्लत का सामना कर रहे हैं. ‘समग्र जल प्रबंधन सूचकांक (सीडब्ल्यूएमआई)’ रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक देश में पानी की मांग उपलब्ध जल संसाधनों की तुलना में दोगुनी हो जाएगी. दूसरी तरफ 70 प्रतिशत प्रदूषित पानी के साथ भारत जल गुणवत्ता सूचकांक में 122 देशों में 120वें पायदान पर है.

बजट में सरकार भी पानी संकट के प्रति गंभीर दिख रही है. देश के हर व्यक्ति को पीने का स्वच्छ पानी उपलब्ध कराने के संकल्प के साथ-साथ जल शक्ति मंत्रालय का गठन करना इसका संकेत है कि पानी राजनीतिक चिंताओं का केंद्र बनने जा रहा है. हमने इस मुद्दे पर जाने-माने पत्रकार व पर्यावरणविद सोपान जोशी से बात की. पिछले दिनों वे अपनी किताब 'जल थल मल' की वजह से चर्चित रहे हैं. पर्यावरण के अलावा वे विज्ञान, राजनीति, खेल और टेक्नोलॉजी पर भी खूब लिखते हैं. प्रस्तुत है सोपान जोशी से दिनेश श्रीनेत की बातचीत.

इन दिनों पानी राजनीतिक चर्चा में शामिल हो गया है. यह संकट अचानक आया है या इस बीच लोगों में जागरूकता बढ़ी है?

मुझे इसमें कोई जागरूकता के लक्षण नहीं लगते. इसका मतलब ये नहीं कि कोई काम नहीं कर रहा है. काम हो रहा है मगर उसकी तुलना में रोना-गाना ज्यादा हो रहा है. जो अच्छा काम करेगा वो चुपचाप करेगा. जिनके पास और कुछ करने के लिए नहीं है उनके पास रोना-गाना ही होगा. तो ये जागरूकता नहीं है ये एक तरह की प्रतिक्रिया है. क्योंकि हम लगातार पानी लूट रहे हैं. तो जाहिर है कि कभी न कभी उसकी तंगी बढ़ेगी ही.

ये जो आपने 'पानी लूटना' कहा है, इसे थोड़ा और विस्तार देंगे?

हमारे भारतीय उपमहाद्वीप में जीवन का तरीका यह रहा है कि हमारा लगभग 70 से 90 प्रतिशत पानी मानसून से गिरता है. तीन महीने के दौरान दिनों और उनके कुछ घंटों में ये सारा पानी गिर जाता है. तो पानी की किल्लत जब होती है और टैंकर से पानी आता है तो लोग क्या करते हैं? लोग उसे बरतन में भरकर रख लेते हैं. पहले लोग पानी को जमीन में भरकर रख लेते थे. तो जो पानी आता है उसको रोककर रखने के तरह-तरह के इंतजाम अपनी मिट्टी और समाज के हिसाब से होते थे. उसको तालाबों में, बावड़ियों में और कुओं में रोका जाता था.

ये पानी का पुरुषार्थ करने वाले समाज के लक्षण हैं. जब पानी है उसको संजोकर रख लो ताकि जब पानी न हो तो उसका इस्तेमाल हो जाए. पिछले 30-40 साल में हमने विकास के झंडे तले जो काम करना शुरू किया है वो पानी की लूट है. सब हड़बड़ी में हैं कि सबको तुरत-फुरत इंतजाम चाहिए. अब साधन बढ़ गए हैं. बिजली के बड़े-बड़े पंप आ गए हैं. लेकिन पानी तो उतना ही है। पानी वही चौमासे से आता है. अब हम भर-भरके पंप से, पाइप से पानी निकाल रहे हैं. उसको रोकने के इंतजाम नहीं कर रहे हैं क्योंकि हमको सस्ते में पानी मिल रहा है. लूट का पानी मिल रहा है. पानी को रोकने के लिए आपको जमीन छोड़नी पड़ती है. 'काल' जो आपको नहीं दे पाता उसकी भरपाई करने के लिए 'देश' दिया जाता है. ये 'देश-काल' का खेल है. स्पेस और टाइम का. अगर टाइम कम है तो स्पेस ज्यादा देना होगा.

पानी को रोकने के लिए जिन वैकल्पिक व्यवस्थाओं की बार-बार चर्चा होती है, उसमें वाटर हार्वेस्टिंग का जिक्र आता है. यह कितना उपयोगी है?

बातचीत में कुछ जुमले चल पड़ते हैं. जो पानी को समझदारी से बरतना चाहे उसके लिए बहुत आसान है. सीधी सी बात है आकाश से बारिश का पानी गिर रहा है. अगर आप उसको रोक पाए तो आप समृद्ध हैं. नहीं रोक पाए तो बारिश से बाढ़ आएगी और गर्मी में सूखा पड़ेगा. तो ये तो आप कहीं भी कर सकते हैं. कोई ऐसी जगह नहीं है जहां पानी नहीं गिरता. उसको वहां रोका जा सकता है. लेकिन जहां पर लोगों के आपसी संबंध अच्छे नहीं होंगे वहां पर ये वाटर हार्वेस्टिंग वगैरह काम नहीं करेगा. जहां पर जमीन की लूट है वहां पानी का संकट भी बढ़ेगा. जमीन की लूट वहां होती है जहां समाज टूटा हुआ है। वहां ये सोच नहीं है कि हम सब इसी तालाब और इसी जमीन से जुड़े हुए हैं.

यानी आपका कहना है कि समाज से सामूहिकता का बोध खत्म हो रहा है?

बिल्कुल, जहां आपके आपसी संबंध ठीक होंगे, वहां आपस में मिलजुलकर किसी भी संकट से निटपना आसान होता है. और जहां सामाजिक संबंध खराब होंगे वहां आप कैसे भी इसको ठीक नहीं कर सकते.

इस बार बजट में सरकार का संकल्प है कि सबको पीने का स्वच्छ पानी उलब्ध कराया जाएगा. इसमें विरोधाभास है. क्या देश में पानी का संकट इतना गहरा हो चुका कि सरकार को संकल्प लेना पड़ रहा है? कहीं इससे पानी के व्यवसायीकरण को और बढ़ावा तो नहीं मिलेगा?

पानी के बाजारीकरण की बात करेंगे तो हमें सबसे पहले मानसून को बिल चुकाना होगा. बाजार में तो यही देखा जाता है न कि खरीद-फ़रोख्त कैसे हो रही है. पानी समुद्र से आ रहा है. मानसून दक्षिणी गोलार्ध से पानी उठाकर हवा के रास्ते हमारे पास ला रहा है. मानसून ने कोई बिल दिया आपको? मानसून ने चालान काटा क्या? डिलीवरी चार्ज, सर्विस चार्ज, सर्विस चार्ज पर टीडीएस... कुछ लिया क्या? बाजार इसलिए बन रहा है क्योंकि जिस चीज की लूट है उसका बाजार बन सकता है. हर चीज बाजार के लिए नहीं होती. कुछ चीजें सामाजिक मूल्यों से होती हैं. आप पानी का ठीक मोल कर सकते हैं. लेकिन ठीक मोल करना अलग रहता है और भाव तोल करना अलग. प्रकृति मे आपके पैसे का कोई मोल नहीं है.

अभी मैंने खबर आई है कि समुद्र के पानी को पीने योग्य बनाने के प्रस्ताव पर विचार हो रहा है. संभवतः यह एक बड़ा और खर्चीला प्रोसेस होगा आप इसे कैसे देखते हैं?

देखिए, ये तो हो रहा है अभी. समुद्र का पानी पीने लायक बनाकर ही बादल आपके पास ला रहे हैं, क्योंकि वो मुफ्त में डाल रहे हैं तो हमें दिखता नहीं. अगर वो महंगी व्यवस्था में बने तो हमें लगता है कि ये विकास हो गया. समुद्र का जो पानी बादल बनकर आ रहा है उसको रोकने में आपको कोई लाभ नहीं दिखता.

अगर मैं ये आपसे पूछूं कि जल संकट से उबरने के लिए आपके हिसाब से ऐसे कौन से सूत्र हो सकते हैं तो आप क्या कहेंगे?

कौन करेगा ये? सबकी भूमिका के हिसाब से ही जिम्मेदारी तय होती है. कोई एक उपाय तो हो नहीं सकता. अलग अलग लोगों के लिए अलग-अलग उपाय होंगे. तो देखना यह होगा कि समाज का कौन सा हिस्सा है जो इसमें अपनी भूमिका निभाएगा.

छोटे शहरों और गांव में जो संकट बढ़ रहा है उसके लिए क्या करना होगा?

पहले हम इस मसले को इस तरह देखते हैं कि सरकार की क्या जिम्मेदारी होनी चाहिए. उन्हें कोई भी नई योजना पानी पर चालू करने से पहले आज तक जो योजनाएं चलती रही हैं उनका ठीक आंकलन करना चाहिए और ईमानदारी से यह बताना चाहिए कि पहले गलत क्या हुआ है. जिसकी वजह से आज हम यहां पहुंच गए हैं. नई नई योजनाएं आती रहती हैं वो पुरानी गलतियों को दोहराने के नए तरीके ढूंढ़ लेती हैं.

समुदायों के बीच किस तरह से पानी के प्रति जागरूकता बढ़े?

समाज के नाते सबसे बड़ी चीज अगर आपने जमीन और पानी से संबंध बिगाड़ लिया है, क्योंकि आपके आपस में संबंध बिगड़ गए हैं. जिनके आपस में संबंध अच्छे होंगे वो मिलजुलकर पानी और जमीन के संबंध अच्छे कर सकते हैं. उसके तरीके क्या होंगे वो हर जगह वहां की जमीन और वहां के मिट्टी-पानी के स्वभाव से तय होगा और सबसे बड़ी बात वहां के समाज के हिसाब से तय होगा. बिहार में ये चीज अलग होगी, बंगाल में अलग और राजस्थान में अलग. इसका मूल एक ही है कि पानी गिरे तो उसको बहने से पहले जमीन में ही रोक लिया जाए. जमीन मे पानी रहे. जमीन में पानी अगर रुका हुआ है तो वह भाप बनकर उड़ता नहीं है. वह एक तरह से बचत है. बचत इतनी बढ़ाई जाए कि हम लोग समृद्ध रहें. बारिश का पानी रोक लिया जाए ताकि मानसून के समय बाढ़ न आए और गर्मी के समय सूखा न पड़े. जो पानी बाढ़ के समय बह रहा है ये वही पानी है जो जमीन के अंदर रुक सकता था.

नदियों को जोड़ने की परियोजना को आप किस तरह देखते हैं? क्या इससे मौजूदा संकट का कोई हल निकलेगा?

योजना से जुड़े लोग नदी को नदी की तरह नहीं देख रहे हैं. वो नदी को पाइपलाइन की तरह देख रहे हैं. ये हिमालय की नदियां इतनी विराट नदियां हैं कि इनको आपके सारे पक्की बनाई हुई योजनाओं को निपटाने में एक क्षण नहीं लगेगा. तो ये 'नदी जोड़ो' भी पानी की लूट का हिस्सा है. ये जोड़ना संभव भी नहीं है. इसका मूल सिद्धांत सब जगह एक ही है. उसको करना कैसे है यह उस जगह के हिसाब से तय होता है. सरकार के लिए जरूरी है कि पहले वह अपनी ऐतिहासिक योजनाओं का आंकलन करे और उसके बाद तय करे कि करना क्या है.

 आभार

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