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नाजियों का यातना शिविर

Bhola Tiwari Jul 20, 2019, 5:08 PM IST टॉप न्यूज़
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एसडी ओझा

 सन् 1933 में एडोल्फ हिटलर ने जब सत्ता सम्भाली तो सबसे पहले यहूदियों को सब ह्यूमन करार दिया गया . कितनी आश्चर्यजनक बात है कि मानव होते हुए भी यहूदियों को मानवी नस्ल का नहीं माना गया . सन् 1939 में हिटलर ने यहूदियों को जड़ से खत्म करने के लिए अंतिम हल ( final solution ) को अमल में लाना शुरू किया . इसके लिए उसने विजित देश पोलैंड के आस्तिविच नामक स्थान पर एक यातना शिविर का निर्माण कराया .

रोज रेलगाड़ियों में भर भर कर हज़ारों यहूदी इस यातना शिविर के gate of death ( मौत के दरवाजे ) से अंदर लाए जाते . जो बूढ़े लाचार थे . उन्हें गैस के चैम्बर में जहरीली गैस छोड़ कर मार दिया जाता था . जो काम कर सकते थे , उनसे यातना शिविर केअंदर बने फैक्ट्री में काम लिया जाता था . काम बहुत कठोर और भोजन कम . लोग वीमार होते थे तो दवाई नहीं कराई जाती थी . बहुत से लोग कुपोषण व वीमारी की वजह से मर जाते . वीमार लोगों को एक विशेष बनी दीवार के पास खड़ा कर गोली मार दी जाती . इस दीवार को wall of death ( मौत की दीवार ) कहा जाता था .

यहूदियों को इस तरह मारे जाने की कार्यवाही को हेलाकास्ट कहा जाता था . हिटलर के इस सनकीपन की वजह से 5 - 6 सालों के अंदर 60 लाख यहूदी मारे गए , जिसमें 15 लाख बच्चे थे . इस प्रकार यहूदियों की 1/3 आबादी का खात्मा कर दिया गया .पता नहीं नाजियों को यह कैसे मुगालता हो गया था कि यहूदी लोग हर उस चीज की नुमाइन्दगी करते हैं , जो जर्मनों के खिलाफ़ है . नाजियों का कहना था कि दुनियां से यहूदियों का मिटाना जर्मनवासियों के लिए फायदेमंद होगा .

ऐनलिज मेरी एन फ्रैंक एक यहूदी लड़की थी , जिसके पिता ने उसके 13 वें बसन्त पर उसे एक डायरी दी थी . उसी समय से ऐनलिज ने अपनी डायरी लिखनी शुरू कर दी थी . नाजियों के डर से एनलिज मेरी एन फ्रैंक का परिवार जर्मन छोड़ नीदर लैंड के एम्स्टर्डम में जा बसा . सन् 1940 में एम्स्टर्डम पर भी नाजियों का कब्जा हो गया , जिससे एनलिज का पूरा परिवार एम्स्टर्डम में फँस गया . एक तहखाने में गुप्त रूप से इन लोगों ने शरण ली थी .खिड़कियों पर हमेशा मोटे कपड़े के परदे पड़े होते थे . कभी कभी एनिलिज परदे की ओट से सड़क की तरफ देख लेती थी , जहाँ उसे रोते कलपते यहूदी परिवार नाजी सेना के संगीनों के साये में जाते हुए दिख जाते . वह उस मंजर को अपने डायरी में कलमबद्ध कर लेती .एनिलिज का परिवार 2 साल तक तहखाने में छुपा रहा . बाद में विश्वास घात के कारण ये पकड़े गए . 

इन्हें यातना शिविर में रखा गया , जहाँ भूख , कुपोषण व हाड़ तोड़ कठिन श्रम के कारण परिवार के सदस्यों की एक एक कर मौत होती गई . अंत में एनिलिज मेरी एन फ्रैंक की भी मृत्यु टाइफाइड से हुई . परिवार के एकमात्र सदस्य बचे एनिलिज के पिता . 27 जनवरी सन् 1945 को रूस की सेना द्वारा पोलैंड पर कब्जा कर लिया गया . आस्टिविच के यातना शिविर से 5000 यहूदी कैदियों को छुड़ाया गया , जिसमें एनिलिज के पिता भी थे .

एनिलिज मेरी एन फ्रैंक के पिता सबसे पहले एम्स्टर्डम स्थित अपने पूर्व निवास में पहुँचे . वहाँ उन्हें अपनी पुत्री एनिलिज की डायरी मिली , जिसमें उसने 12 जून सन् 1942 से 1 अगस्त सन् 1944 के बीच के घटना क्रम का बयान किया था . यह डायरी छपकर किताब की शक्ल में सन् 1947 में बाज़ार में आई . बाज़ार में आते हीं यह किताब दुनिया की सबसे पढ़ी जाने वाली किताब बन गई . 67 भाषाओं में इस किताब का अनुवाद किया गया . नाजियों के अत्याचारों को कलम बद्ध करने वाली एनिलिज मेरी एन फ्रैंक मरकर भी इस किताब के माध्यम से अमर हो गई . एनिलिज उन 15 लाख बच्चों की सूचि में शामिल थी , जो मात्र यहूदी होने के कारण मरी .

रूस ने इस यातना शिविर को म्युज़ियम में तब्दील कर दिया . आज इस म्युज़ियम में 2 टन मानव बाल रखे गए हैं . मारने से पहले यहूदियों के बाल काट लिए जाते थे . नाजी इन बालों से कपड़े बनवाते थे . मानव इतिहास में इस तरह का क्रूरतम अत्याचार बहुत कम देखने को मिलेगा , जब मात्र नस्ली नजरिये के कारण हर उम्र , हर लिंग व आस्था की परवाह न करते हुए किसी जाति / धर्म के लोगों को मौत के घाट उतारा गया हो . 

आज भी लोग इस म्युज़ियम में आते हैं . अपने पूर्वजों को याद करते हैं , आँखें नम करते हैं , उनकी तस्वीर टांगते हैं , अपनी जड़ों को तलाश करते हुए सोचते हैं कि शायद ये इतिहास दुबारा नहीं दुहराया जाएगा ?

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