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••• चांद पर उनके नाम का हल्ला है

Bhola Tiwari Jul 20, 2019, 5:43 AM IST टॉप न्यूज़
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कबीर संजय

पानी आसमान से किसी नियामत की तरह बरसता है, लेकिन जमीन पर आते ही वह हमारे लिए विभीषिका बन जाता है। अव्यवस्था, मुनाफाखोरी, लापरवाही और भ्रष्टाचार ने देखिए हमारा क्या हाल कर दिया है। हम एक ऐसे देश में तब्दील हो गए हैं जो महीने भर पहले तक बादलों की ओर तकते हुए उसके बरसने की उम्मीद लगाए हुए थे। और जैसे ही बादलों ने बरसना शुरू किया हमारी व्यवस्था त्राहिमाम करने लगी है। 

बाढ़ के कीचड़ में पड़े हुए एक बच्चे की तस्वीर कल से इंटरनेट पर तैर रही है। इस बच्चे को भी बाढ़ की विभीषिका का शिकार बताया जा रहा है। कुछ लोग विरोध कर रहे हैं कि यह बच्चा बाढ़ में मरने वालों में से नहीं है। इस बहस से बचते हुए सबसे पहले तो हमारी जानकारी में यह होना चाहिए कि आज के दिन तक असम और बिहार में बाढ़ के चलते मरने वालों की संख्या सौ से ज्यादा हो चुकी है। बाढ़ से प्रभावित होने वाले लोगों की संख्या भी मोटा-मोटी एक करोड़ के लगभग हो चुकी है। असम के 33 में से 28 जिले बाढ़ की चपेट में हैं। बिहार का बड़ा हिस्सा डूबा हुआ है। काजीरंगा नेशनल पार्क का नब्बे फीसदी हिस्सा डूब गया है। असम और बिहार के बाद केरल में भी भारी बारिश और बाढ़ की चेतावनी दी जा रही है। 

पानी आसमान से किसी नियामत की तरह बरसता है। लेकिन, नीचे जमीन पर आते ही यह हमारे लिए विभीषिका बन जाता है। ऐसा आखिर है क्यों। प्रकृति का वरदान ही हमारे लिए विनाश का कारण क्यों बन जाता है। पानी से जीवन की उत्पत्ति हुई है। इसके चलते ज्यादातर प्राणियों का पानी के साथ बड़ा ही सहज रिश्ता है। अभी भी हमारे जीवन का आधार पानी ही है।वही पानी कैसे हमारी मौत में तब्दील हो जाता है।

महीने भर पहले ही देश के अलग-अलग जलाशयों में पानी की कमी के चलते पेयजल तक का संकट खड़ा हो गया था। अभी भी कई शहर इससे उबर नहीं सके हैं। इस बार मानसून देर से आया। जबकि, हाल के दिनों में एक यह भी प्रवृत्ति देखने को मिली है कि मानसूनी बरसात का क्रम बिगड़ने लगा है। बहुत ज्यादा पानी कम दिनों में बरस जाता है। इसके चलते मुंबई जैसे शहर तो तुरंत ही डूबने लगते हैं और त्राहिमाम करने लगते हैं। 

जलवायु संकट ने इस बार पहले तो मानसून को देर किया फिर मानसून का क्रम बिगड़ने के चलते कुछ खास जगहों पर ही भारी बारिश का क्रम शुरू कर दिया। पर्यावरण बार-बार खतरे का संकेत कर रहा है। 

लेकिन, हम कहां डूबे हुए हैं। हम तो ऐसी आत्मप्रवंचना के सागर में गोते लगा रहे हैं, जिसका शायद ही कोई उदाहरण अन्यत्र मिले। हम अपने यहां पानी को संरक्षित करने और बाढ़ को रोकने का भले ही कोई इंतजाम नहीं कर पाए हों, लेकिन हम चांद पर यान जरूर भेजने जा रहे हैं। हमारे पास गटर की सफाई के लिए भले ही मशीनों का अभाव हो लेकिन हम तीन-तीन हजार करोड़ की मूर्तियों को बनाना अपना पवित्र राष्ट्रीय कर्तव्य मान चुके हैं। किसी को याद है कि हमने जो यान मंगल पर भेजा था, जिसके बारे में यह भी कहा गया था कि मंगल को मॉम मिल गई, उस यान ने अभी तक क्या उपलब्धि हासिल की है। 

क्या वैज्ञानिक उपलब्धियां सिर्फ अंतरिक्ष में हासिल की जाती है। उनका आम लोगों के जीवन में कोई उपयोग नहीं होता। उसका आम लोगों को कोई फायदा नहीं होता। आम आदमी बाढ़ में डूबते अपने बच्चों की मौत देखता रहेगा और इस बात पर खुश होता रहेगा कि हमारे देश के आकाओं ने भले ही हमें बाढ़ से बचाने का कोई उपाय नहीं किया हो लेकिन चांद पर भी उनके नाम का हल्ला है। हम मर भले जाएं, लेकिन हमारे पास अंतरिक्ष में मौजूद सेटेलाइट को मार गिराने की भी क्षमता है। भले ही हम खाने को तरसते रहें। 

याद रखिए कि जलवायु संकट भी सबसे पहले आम लोगों की ही जान लेगा। कारपोरेट तो इस दुनिया को खतम करने के बाद चांद पर बस्ती बसाने के सपने देखता रहेगा। लेकिन, हम क्या करेंगे। 

अंत, काजीरंगा में वन्यजीवन की सुरक्षा और देखभाल में लगे हुए लोगों को बधाई। बाढ़ की आशंका को देखते हुए यहां कई जगहों पर ऊंचे प्लेटफार्म बनाए गए हैं, जिस पर चढ़कर कई जानवर अपनी जान बचाने में कामयाब हो गए हैं। हालांकि, यह भी जाहिर है कि सब इतने खुशकिस्मत साबित नहीं हुए हैं और बिना समग्र योजना के ऐसा होना मुमकिन भी नहीं है। 

(बाढ़ की विभीषिका को दर्शाने वाली तस्वीर गूगल से साभार)

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