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यह जलवायु परिवर्तन नहीं बल्कि जलवायु संकट है

Bhola Tiwari Jul 19, 2019, 5:41 AM IST टॉप न्यूज़
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 कबीर संजय

इंसानी नस्ल यानी होमो सेपियंस का इवोल्यूशन शुरू होने से भी बहुत पहले। आठ लाख सालों में पृथ्वी पर कभी भी कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा इतनी नहीं थी, जितनी की अब हो चुकी है। और इसके लिए जिम्मेदार भी हम इंसान ही है। हवाई में स्थित माउना लोआ ऑब्जरवेटरी की 12 मई को जारी रिपोर्ट के मुताबिक वातावरण में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा 415 पार्ट पर मिलियन (पीपीएम) तक पहुंच गई है। यह आठ लाख सालों के इतिहास में यह सबसे ज्यादा है। 

पिछले तीस सालों में पूरी दुनिया में ही कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए बातें तमाम होती रही हैं। सबसे पहले मई 1986 में इसके लिए विश्व जनमत बनाने का प्रयास किया गया। उस समय कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा 350 पीपीएम थी। मई 1992 में इसकी मात्रा 359.99 पीपीएम तक पहुंच गई। जबकि, अप्रैल 2000 में इसकी मात्रा 371.82 पीपीएम हो गई। वर्ष 2014 में वातावरण में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा 401.78 पीपीएम हो गई। जो कि सुरक्षित सीमा से पचास पीपीएम ज्यादा हो चुकी थी। 

वर्ष 1986 से लगातार विश्व के तमाम प्रतिनिधि इस बात को लेकर बैठकें करते रहे हैं कि कैसे वातावरण में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा को कम किया जाए। लेकिन, इसमें लगातार बढ़ोतरी ही होती रही है। इसके पीछे कारण क्या है। इसके पीछे कारण है फासिल फ्यूल यानी डीजल-पेट्रोल आदि पर हमारी निर्भरता। एक आंकड़े के मुताबिक बीते पांच दशकों में ही हम दो सौ फीसदी ज्यादा फासिल फ्यूल जला रहे हैं। एक तरफ तो हम पेट्रोलियम पदार्थ जलाकर पृथ्वी को गरम कर रहे हैं, वातावरण में कार्बन डाई आक्साईड की मात्रा में इजाफा कर रहे हैं, दूसरी तरफ हम जंगलों को भी काट रहे हैं। ये जंगल कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा को संतुलित करने में मदद करते। पृथ्वी को ठंडा रखते। 

लेकिन, धरती पर आक्सीजन की मात्रा बढ़ाने वाले पेड़-पौधे और जंगल कम हो रहे हैं जबकि कार्बन उत्सर्जन बढ़ रहा है। इसके चलते दुनिया एक तरह के असंतुलन का शिकार हो रही है। इसका असर मौसम से लेकर तमाम पर्यावरणीय घटनाओं में दिखाई पड़ रहा है। इन घटनाओं को लेकर अब नई शब्दावली पर भी विमर्श चल रहा है। क्लाईमेट चेंज की बजाय क्लाईमेट क्राइसिस कहा जाना चाहिए। 

यह जलवायु परिवर्तन नहीं बल्कि जलवायु संकट है।  

(चित्र इंटरनेट से। लेख के कुछ तथ्य पर्यावरण पत्रिका डाउन टू अर्थ से लिए गए हैं)

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