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अंग्रेजों को समझ में आ गया था, आपको क्यों नहीं समझ में आता

Bhola Tiwari Jul 19, 2019, 5:23 AM IST टॉप न्यूज़
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 दिनेश मिश्रा

अंग्रेजों के समय में भारत में जो भी तटबंध थे उन्होंने उनकी नाक में दम कर रखा था। ऐसा कैसे हुआ वह हम पहले बता आए ह़ै। क्योंकि वह अपनी सरकार के प्रति जवाबदेह थे इसलिए उन्हें तटबंधों के रख-रखाव में दिक्कतें आती थीं। कम खर्च में तटबंधों का रख-रखाव मुमकिन नहीं था इसलिए वह तटबंधों के झमेले में पड़ना नहीं चाहते थे। उनका स्पष्ट मानना था कि अगर कोई तटबंध दस साल तक सुरक्षित रहे और ग्यारहवें साल टूट जाये तो पिछले दस साल में हुआ फायदा एक झटके में स्वाहा हो जाता था। उसके ऊपर राहत, पुनर्वास, हरजाने का खर्च अलग से। नदी पर तो वैसे भी तटबंधों का दुष्प्रभाव पड़ता ही था।यह उनके लिए कभी फायदे का सौदा नहीं था। फायदे का सौदा यह अभीभी नहीं है पर यह उनकी समझ में तो आ गया था पर आपकी समझ में अभी तक नहीं आया। समझ में आएगा इसकी संभावना भी बहुत कम है।


इसलिए वह तटबंधों का विरोध करते थे। उनको जनता के नफ़ा-नुकसान की उतनी चिंता नहीं थी। साथ में उन्होंने चीन की ह्वांग हो और अमेरिका की मिस्सिस्सिप्पी नदियों का अध्ययन करके तटबंधों की ख़ामियों को अच्छी तरह समझ लिया था। वह जान गये थे कि तटबंधों के निर्माण के बाद नदी की तलहटी ऊपर उठेगी, बाहर का पानी नदी में न आ पाने के कारण कंट्रीसाइड में जल-जमाव होगा, तटबंधों में निर्मित स्लुइस गेट बरसात भर बंद रखने पड़ेंगे वरना नदी का पानी बाहर कंट्रीसाइड में फैलेगा, नदी की उठती पेटी के अनुरूप तटबंध को हमेशा ऊंचा करते रहना पड़ेगा, स्लुइस गेट समय पर नाकाम रहने के कारण नदी की सहायक धाराओं पर भी तटबंध बनाना पड़ेगा, मुख्य नदी और सहायक धारा पर बने तटबंधों के बीच पानी अटक जायेगा और कोई भी तटबंध ऐसा नहीं होता जो टूटेगा नहीं। तटबंध अगर टूट गया तो बाढ़ नहीं होगी, प्रलय जरूर होगी।

उन्हें अपनी सैलरी का प्रबंध भी विभाग के बजट से करना पड़ता था, विभाग कोई योजना बनाने के लिये ऋण लेता था तो उसका मूल और ब्याज बैंक या दूसरे वित्तीय संस्थान को लौटाना पड़ता था और कुछ राशि राजकोष में भी देना पड़ता था। विभाग और उसके अधिकारी अपने पैरों पर खड़े रहते थे। उनको एक सुविधा जरूर थी कि वो अपनी बात खुल कर कह सकते थे और उनकी बात सुनी भी जाती थी। मतांतर होने पर भी बात कार्रवाई रिपोर्ट में लिखी जाती थी लेकिन काम सर्वमान्य निर्णय के अनुसार ही होता था। वह उनके काम करने का तरीका था। काम करने का तरीका अब क्या बचा है वह आप लोग बेहतर जानते होंगे।

मैंने तीन साल पहले जल संसाधन मंत्रालय, दिल्ली को लिखा था कि हमारी बाढ़ ढाई दिन की जगह ढाई महीने की हो गई और बाढ़ ने अपनी चपेट में गांवों के साथ साथ शहरों को भी ले लिया है। कम से कम अब हमें पानी की निकासी पर गहन अध्ययन करके इस समस्या का समाधान खोजना चाहिए। देश और बिहार में फ्लड कमीशन तो कई गठित किए गए पर अब समय आ गया है कि जल निकासी के लिए भी एक आयोग गठित किया जाए। साल भर बाद जवाब आया कि आपका सुझाव विचारणीय है। फिर क्या हुआ पता नहीं.

बिहार मेंं पब्लिक को पिछले 82 साल से कोसी हाई डैम की गाजर लटका कर मूर्ख बनाया जा रहा है। मेरी बहुत से इंजीनियरों से बात होती है जो यह कहते हैं कि हमको साइट दिलवा दीजिये, हम बाँध बना देंगे। ये लोग इतने भोले तो नहीं हैं कि उन्हें मालूम ही न हो कि साइट दिला देना बिहार या केन्द्र सरकार के अख़्तियार में नहीं है, यह नेपाल ही करेगा और जब उसकी मर्ज़ी होगी तब करेगा।

मुझे नहीं मालूम कि इन विषयों पर विभाग के सभी अनुभवी इंजीनियर कभी मिल कर चिंता करते हैं या नहीं? उन्हें जरूरत भी नहीं है क्योंकि जब बराहक्षेत्र, नुनथर और शीसापानी का नाम ले भर देने से काम चल जाता है तो फिर किसी को क्या परेशान होना? 

रहा तटबंध की मरम्मत का सवाल कि जब तटबंध है तो उसकी मरम्मत होगी ही। यह एकदम सही बात है। मगर मरम्मत होने के बाद उसे सुरक्षित रहना चाहिए, यह भी किसी की जिम्मेवारी बनती होगी या नहीं या मरम्मत जैसी भी हो वह पूरा कर देने के बाद किसी का कोई दायित्व ही नहीं रह जाता।

मुझे याद है जब 1967 में कोसी कुनौली के पास अपने पश्चिमी तटबंध पर चोट कर रही थी तब डा. के.एल. राव ने लोकसभा में बयान दिया था कि तटबंध बनेगा तो वह टूटेगा ही। तभी से शायद यह ब्रह्मवाक्य हो गया कि तटबंध है तो वह टूटेगा ही। सारी जिम्मेवारी समाप्त।

हमारे इंजीनियर बड़े रुतबे से पूछते हैं कि तब लोगों को डूबने दें। सवाल इस बात का है कि आप और कितना डुबाना चाहते हैं कि आपको तसल्ली हो जाए।1987 की बाढ़ में सरकार के अपने रिकॉर्ड के अनुसार 1399 लोग मरे थे। यह आपको पता है या हमें बताना पड़ेगा। आपको कम लगता है। 17 लाख घर गिरे थे यह बताना हमारा काम है क्या? आप हैं कि अपनी असफलताओं की कहानी सुनना भी नहीं चाहते। आप ख़ुश हैं कि आपने जितनी भी इंजीनियरिंग पढ़ी उसका आप सदुपयोग हो रहा है। जो आपके विद्वत्व को भोग रहा है कभी उससे भी पूछा आपने? जिसका घर बह गया, जिसके बच्चे मारे गये, जिसका गांव कट गया, जिसके खेत पर बालू पड़ गया, जिसकी रोज़ी-रोटी आपकी इंजीनियरिंग और लापरवाही तथा स्वार्थ ने छीन ली उसका कभी ख्याल आपको आया? जवाबदेही की परिभाषा कभी आपको पढ़ाई गई थी या नहीं?

हमें अपनी ज़मीन पर और जहाँ तक हो सके अपने संसाधन से और अपनी तकनीक से बाढ़ समस्या का समाधान खोजना चाहिए ताकि लोग चैन से रह सकें। हमारे पास काबिल इंजीनियर हैं पर वह भी नेपाल में प्रस्तावित बाँधों का ही मंत्रजाप करते हैं, अलग से कुछ सोचना ही नहीं चाहते और अगर वो सोच लेते हैं तो किसी अग्यात भय से बोलना नहीं चाहते अथवा यह काम सरकार का है हमसे क्या मतलब की मनोवृत्ति वाले हैं कह कर खा़मोशी अख़्तियार कर लेने वाले हैं। यह स्थिति बहुत दिनों तक चलने वाली नहीं है ।

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