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बाढ़ के कहर से सिसकता बिहार

Bhola Tiwari Jul 17, 2019, 4:07 PM IST टॉप न्यूज़
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अजय श्रीवास्तव

हर साल की तरह इस बार भी पूरा उत्तर बिहार बाढ़ की विभीषिका झेल रहा है।एक तरफ बिहार में जबरदस्त मानसून है तो दूसरी तरफ नेपाल में चारों तरफ बाढ़ आई है।नेपाल से भारी मात्रा में पानी विभिन्न बैराजों से छोडा जा रहा है जिससे उत्तर बिहार के कई जिलों अररिया, किशनगंज, फारबिसगंज, पुर्णिया, सुपौल, मधुबनी, दरभंगा, कटिहार में बाढ़ का पानी कहर बरपा रहा है।बिहार का शोक कही जानेवाली कोसी, कमला, बागमती, गंडक, महानंदा समेत सभी नदियाँ तटबंध को तोड़कर हाहाकार मचा रहीं हैं।

आपदा प्रबंधन के आंकड़ों को हीं माने तो उत्तर बिहार के आठ जिलों के 1324 गाँव की लगभग पाँच लाख की आबादी बाढ़ के प्रलय से ग्रसित है।मगर हकीकत कुछ और बयां कर रहे हैं।एक गैरसरकारी आंकडों के अनुसार तकरीबन आठ लाख लोग इस आपदा से बुरी तरह प्रभावित हैं।चार लाख मिट्टी और फूस के घर बर्बाद हो गए हैं।मवेशियों के मरने या बह जाने का आंकड़ा अभी आना बाकी है।चारों तरफ हाहाकार मचा है मगर राहत की कोशिश ऊँट के मुँह में जीरा हीं साबित हो रही है।बिहार सरकार जानती है कि हर साल बाढ़ भारी तबाही मचाती है फिर भी तटबंधों के रखरखाव पर कुछ भी काम नहीं किया गया।जल के बेग से तटबंध सुखे पत्तों की तरह बह गए, गाँव वालों के बार बार कहने के बावजूद कमजोर तटबंधों की मरम्मत नहीं किया गया,जिस जगह थोडा बहुत काम हुआ वहाँ काम कम घोटाला ज्यादा हुआ।बिहार के मुख्यमंत्री हवाई सर्वेक्षण कर अपने बिल में घुस गए।जनता को दिखाने के लिए नीतीश कुमार ने अपने साथ मुख्य सचिव दीपक कुमार, जल संसाधन विभाग के अपर मुख्य सचिव अरूण कुमार, आपदा प्रबंधन विभाग के प्रधान सचिव प्रत्यय अमृत और मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव चंचल कुमार को भी साथ लाए थे,मगर ये सब दिखावा है जो चतुर नीतीश कुमार हमेशा करते रहते हैं।

कहने को तो एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की 26 टीमें लगीं हैं मगर जब 25 लाख की आबादी बाढ़ से प्रभावित है तो केवल 26 एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें क्या करेगी ये प्रश्न मुँह बाये खडा है।अभी तक 29 लोगों के मरने की खबर है।

रविवार को कोसी बैराज के सभी 56 गेटों को एक साथ खोल दिया गया जिससे लोगों को संभलने का मौका भी नहीं मिला।जब तक लोग संभलते पानी घरों में घुस चुका था,अनाजों को बरबाद कर चुका था।

हम पिछले साल की बात कर लेते हैं,2018 में बिहार के 17 जिले बाढ़ से प्रभावित थे।तकरीबन 8.5 लाख लोगों के कच्चे घर या तो टूट गए थे या बह गए थे।आठ लाख हेक्टेयर फसल पूरी तरह बर्बाद हो गया था।लाखों मवेशी या तो बह गए थे या डूबकर मर गए थे।सरकार ने बाढ़ पीडितों को बाढ़ राहत का मुआवजा देने का जोरशोर से ऐलान किया था मगर पिछले साल का मुआवजा अभी तक बंटा नहीं है और इस बार फिर बाढ़ आ गई है।राहत के झुनझुने का अभी भी लोग इंतजार कर रहे हैं।कुछ बाढ ग्रस्त इलाकों में तो जानवरों के मरकर सड़ने से बीमारी का खतरा उत्पन्न हो गया है।लोगों के पास पीने के शुद्ध पानी का पूर्णतया अभाव है।सरकार की तरफ से कुछ इलाकों में हीं पीने के पानी का वितरण हो रहा है जो प्रभावित आबादी के 1% को भी नहीं मिल पा रहा है।सरकार केवल खानापूर्ति हीं कर रही है लोगों को उनके हालत पर छोड दिया गया है।

इस बाढ़ के लिए बहुत हद तक भारत-नेपाल की जल प्रबंधन नीतियों को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।दोनों देशों के संबंधित अधिकारियों में तारतम्य का अभाव है, दोनों एक दूसरे को इसके लिए जिम्मेदार मानते हैं।नेपाल के जल प्रबंधन विभाग का कहना है कि बाल्मीकी नगर में बने गंडक बराज और कोशी पर बने बराज के कारण नेपाल संकट में है।जब नेपाल को सिंचाई के लिए पानी की जरूरत होती है भारत गंडक नहर में पानी नहीं देता और बारिश के समय बाल्मीकी नगर बैराज से इतना पानी छोड दिया जाता है कि नेपाल में बाढ आ जाती है।

नेपाल के बहुत से लोगों का मानना है कि भारत ने नदियों पर बहुत से बाँध बना लिए हैं इस वजह से तराई क्षेत्र में एकाएक पानी घुस जाता है।

नेपाल का कहना बहुत हद तक सही भी है क्योंकि 1954 से पहले नदियों में बाँध नहीं थे और पानी धीमे वेग से आता था।पानी का फैलाव बहुत देर में होता था जिससे लोग संभल जाते थे, अब सरकार का कहना है कि उन्हीं पानी को विभिन्न बाँधों में रोककर बिजली बनाई जाती है।गर्मियों में सिंचाई के लिए नहरों में पानी को छोडा जाता है।

हर साल बिहार में हजारों करोड़ की हानि होती है, लोग मेहनत से घर बनाते हैं और वह बाढ़ में बह जाता है।बिहार की अधिकांश जनसंख्या कृषि पर आधारित है और बाढ के समय खरीफ की फसल पूरी तरह बर्बाद हो जाती है।गाँव के पगडण्डी और सड़कें बह जाती हैं जिससे खेती और व्यवसाय करने में काफी परेशानी होती है।यही वजह है कि बिहार के लोग हर साल दूसरे राज्यों में जीविकोपार्जन के लिए पलायन करते हैं।केन्द्र सरकार और राज्य सरकार को मिलकर इस मसले का स्थाई समाधान खोजना होगा नहीं तो यूँहीं हर साल सैकड़ों लोग कालकवलित होते रहेंगे।

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