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वामपंथ का मर्सिया !

Bhola Tiwari Jul 17, 2019, 6:05 AM IST टॉप न्यूज़
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ध्रुव गुप्त

ताज़ा संसदीय चुनाव में वामपंथ को देश में चार पांच सीटों पर सिमटता देखना एक त्रासद अनुभव है। देश की मौज़ूदा फिरकापरस्त, पूंजीवादी, भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था में भी सी.पी.आई, सी.पी.एम, माले सहित सभी वामपंथी पार्टियां अगर राजनीतिक विमर्श के बाहर हैं तो यह चिंता का सबब है। न लोग उन्हें गंभीरता से ले रहे हैं और न वे ख़ुद अपने को लेकर गंभीर है। उनके पास अब कार्यकर्ता बहुत कम, बुद्धिजीवी ज्यादा रह गए हैं ! अपने देश की संस्कृति और परिस्थितियों में ख़ुद को ढालने के बजाय लेनिन, माओ, स्टालिन और चे ग्वेवारा में रास्ता तलाशने वाले, ज़मीन से कटे उनके किताबी, आत्ममुग्ध और अहंकारी नेतृत्व ने न सिर्फ वामपंथ को टुकड़ों में बांटा है, बल्कि उसकी लुटिया ही डुबा दी। दशकों से देश की दिशाहीन राजनीति को न तो वे कारगर विकल्प दे सके और न परिवर्तनकामी युवाओं-किसानों-मज़दूरों को दिशा। एक क़ायदे का विपक्ष तक खड़ा न हो सका उनसे। कभी इन्होंने वंशवादी, भ्रष्ट कांग्रेस की पूंछ पकड़ी तो कभी अवसरवादी क्षेत्रीय दलों का पिछलग्गू बनकर चुनावी वैतरणी पार करने की कोशिश की। यह राजनीतिक अवसरवाद उनके लिए आत्मघाती साबित हुआ। आज वे जे.एन.यू का एक कोना पकड़कर अपनी डूबती नब्ज़ टटोल रहे हैं। वैसे वामपंथ से असहमत लोग भी मानते हैं कि देश के वर्त्तमान अधोगामी सियासी परिदृश्य में नीतियों के प्रति निष्ठा और व्यक्तिगत ईमानदारी अगर बची है तो वामपंथी दलों में बची है। इसके पहले कि मतदाता उनका अंतिम संस्कार कर दें, उन्हें अपनी अबतक की यात्रा पर ठहरकर सोचना ज़रूर चाहिए। इस देश की धर्म और संस्कृति में सब कुछ बुरा नहीं है। लोगों को भरोसे में लेकर उनमें सुधार की कोशिशों की जगह परंपराओं की खिल्ली उड़ाने की प्रवृति को देश का आमजन स्वीकार नहीं करेगा।   

सवाल यह है कि क्या देश के वामपंथी अपने छद्मलोक से बाहर निकलने को तैयार भी हैं ?

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