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इतिहास के पन्नों से---- भारत के गुलाम होने की यात्रा !!

Bhola Tiwari Jul 16, 2019, 6:18 AM IST टॉप न्यूज़
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 नीरज कृष्ण

मुग़ल बादशाह का अतिउत्साह में दिया हुआ एक छोटा सा वचन, जिसने भारत की तस्वीर बदल दी और कुछ ही दिनों के उपरांत भारत में व्यापार करने आई हुई ब्रिटिश साम्राज्य की एक छोटी सी व्यापारिक कंपनी ‘East India Company’ ने व्यापार के माध्यम से पुरे देश की शासन-प्रणाली पर अपना कब्जा कायम किया और भारत इस बार यूनियन जैक के अधीन अंग्रेजों का गुलाम हो गया।  

वर्ष 1644 की बात है, उन दिनों दिल्ली की गद्दी से मुग़ल बादशाह शाहजहाँ भारत पर शासन कर रहा था। शाहजहां की 13 वर्षीय बेटी जहान आरा अगर उस दिन यदि जली नहीं जाती तो शायद हिंदुस्तान की तस्वीर शायद कुछ और ही होती। 

जहान आरा एक दिन रसोई में चली गई और गरम पानी उसके शरीर पर गिर पड़ा। फूल की तरह नाजुक जहान आरा का शरीर बुरी तरह से जल गया। इस घटना के बारे में हालाँकि कुछ इतिहासकारों का कहना है कि जहान आरा इत्रदान में आग लग जाने से हुई आगजनी में जल गयी थी। खैर घटना जो भी घटी हो, पर यह तो तय है कि वर्ष 1644 में उस दिन मुग़ल बादशाह शाहजहाँ की लाडली पुत्री जहान आरा बुरी तरह जल गयी थी।

बादशाह शाहजहां ने हर संभव इलाज कराया लेकिन जहान आरा के शरीर पर पड़ा निशान जा ही नहीं रहा था। बादशाह ने कई जगहों पर पता कराया कि कहीं कोई हो जो जहान आरा के जले हुए शरीर से जलने के निशान को मिटा सके। किसी तरह पता चला कि गुजरात में सूरत के पास कोई अंग्रेज चिकित्सक आया है जो जले के का इलाज कर सकता है।

 बादशाह ने अपने दूत को सेना के साथ तत्काल सूरत की तरफ कुच करने का आदेश दिया, और स-सम्मान उस अंग्रेज चिकित्सक को लेकर आने का हुक्म दिया। ........अंग्रेज चिकित्सक हाजिर किया गया बादशाह के सामने और उसने बुरी तरह जली हुई जहान आरा का इलाज प्रारंभ किया। बहुत जल्द ही जहान आरा ठीक हो गई, शरीर पर जले होने का कोई निशान नहीं शेष रहा। ......बादशाह शाहजहाँ बहुत खुश हुआ। 

खुश पिता कुछ भी कह सकता था। और वह खुश पिता मुग़ल साम्राज्य का बादशाह था अतः वह कुछ भी दे सकता था। उसने अंग्रेज डॉक्टर से कहा, "जो चाहो मांग लो। जो मांगोगे, वही मिलेगा।"

अंग्रेज चिकित्सक पशोपेश में पड़ गया। बहुत सोच कर उसने कहा कि उसे कुछ नहीं चाहिए। कुछ भी नहीं, क्यूंकि उसने सिर्फ चिकित्सकीय धर्म का निर्वहन किया है। फिर भी आप कुछ देना चाहें तो अंग्रेज जो भारत में व्यापार की मंशा लेकर आए है, उन्हें बंगाल में फ्री ट्रेड की छूट दिला दें। 

हालांकि जहांगीर के समय सूरत में अंग्रेजी व्यापार की शुरुआत हो चुकी थी लेकिन बंदिशें बहुत थीं।

बादशाह के लिए ये कौन सी बड़ी बात थी। मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने इसकी इजाजत देते हुए मुगलिया फरमान जारी किया- “तुम सूरत में व्यापार करो। बंगाल में व्यापार करो। आजादी से व्यापार करो।“ शाहजहां के अतिउत्साह में दिए गए इसी आदेश के गर्भ में जन्म हुआ ‘East India Company’ का, और भारत का भविष्य गुलाम हो गया। 

इतिहास के पन्नों को पढ़ते समय मैंने बहुत करीब से जहान आरा की खूबसूरती को देखा। बादशाह शाहजहां की खुशियों को महसूस किया। उस अंग्रेज चिकित्सक के मक्कारिओं को भी परखा जिसने मांगा तो कुछ नहीं था, लेकिन उसने हमारी किस्मत को ही मांग लिया था।

याद कीजिये उस घटना को जब अयोध्या नरेश दशरथ के रथ के पहिये का एक जाल(Screw) खुल कर गिर गया था और जिस प्रकार से कैकेयी ने उस जगह पर अपनी ऊँगली उस रथ के पहिये में डाल कर जिस राजा दशरथ के प्राणों की रक्षा की थी। उस दिन अगर दशरथ ने कैकेयी से अतिउत्साह में यह नहीं कहा होता कि- “तुम मेरे प्राणों की रक्षा करने के एवज में जो चाहो मांग लो रानी”, तो शायद भारत का कोई और ही इतिहास होता।

राजा दशरथ ने अति उत्साह और अति प्रेम में कह कह कर वचनबद्ध तो हो गए ‘जो मांगोगी वही दे दूंगा’, पर उन्होंने शायद कल्पना भी नहीं की होगी कि रानी को दिया हुआ वचन ही एक दिन ‘अयोध्या के नागरिकों की किस्मत मांग लेगी, उसी वचन देने वाले वचनबद्ध राजा से उसके प्राण को ही मांग लेगी।‘

शायद आप सोच रहे होंगे कि आज मै ये सब क्या लिख रहा हूँ, क्यों इतिहास के उन पन्नों को कुरेद रहा हूँ जो जमींदोज हो चुके हैं। जिन्हें हम भूल चुके हैं......बिसरा चुके हैं।

इतिहास मेरा सर्वाधिक प्रिय विषय था क्यूंकि मै इतिहास को पढता नहीं था, उसे भोगता था, उस संत्रास को महसूस करता था जो समय ने.....समाज ने....पात्रों ने भोगा था। मैं अपने शिक्षक से प्रायः पूछता कि इस इतिहास को पढ़ने से हमें क्या लाभ? हम क्यों अतीत की घटनाओ को पढ़ते हैं? जिला–प्रशासन चलाने के लिए चन्द्रगुप्त मौर्य/ अशोक, बाबर-अकबर की क्या आवश्यकता पड़ेगी; तो गंभीर होकर वे कहते कि पढ़ने से कुछ न कुछ तो लाभ होगा ही, तुम पढ़ते रहो बस। परिपक्वता के इस दौर में उनकी बातें अब समझ आती है कि दरअसल वह पढ़ना क्या चाहते थे परंतु विडंबना कि हमलोग उसे सामान्य इतिहास समझ कर याद कर लिया करते थे।    दोस्तों, एक बात को हमें अपने जेहन में गाँठ मार कर रख लेनी चाहिए कि “जो इतिहास को याद नहीं रखते, उनको इतिहास को दुहराने का दंड मिलता है। और इतिहास जब खुद को दोहराता है तो उसकी बहुत बडी कीमत वसूल करता है।“ 

बिना सोचे-समझे हमें कोई भी वचन नहीं देना चाहिए। अति-उत्साह और अति-क्रोध में हम कहने को तो कह जाते हैं कि जो मांगोगे वो दे दूंगा, परंतु हम यह नहीं जानते कि मांगने वाला क्या मांग लेगा..... हमसे। 

वह हमारे..... अस्तित्व को मांग सकता है। वह हमारा..... वजूद मांग सकता है। वह हमारा.... भविष्य मांग सकता है। वो देश मांग सकता है......हमारे राम(आस्था) को मांग सकता है......शर्त कि आप एक संजीदा व्यक्ति हैं।

आजादी की जश्न की पूर्व संध्या पर लिखे गए इस पोस्ट का एकमात्र उद्देश्य यही है कि अति-क्रोध और अति उत्साह(प्रेम) में हमें कोई ऐसा वचन नहीं लेना/देना चाहिए जिसका बाद में मलाल हो, जिसका बहुत दूरगामी प्रभाव हमारी जिंदगी पर पड़े। क्रोध में एक छोटी सी चुप्पी अफसोस करने के हजार पलों से हमें बचा लेती है, वैसे ही अति-उत्साह में भी छोटी सी चुप्पी भी हमें बहुत से दुखों से बचा सकती है। 

हालाँकि यही गलती मैंने भी किया था 1995.....

वचन देना चाहिए, लेकिन सोच-समझ और विचार कर। बिना परिणाम सोचे दिया गया वचन कई बार हमारा खुद का सृजित किया हुआ भस्मासुर बन जता है जो रोज-रोज हमें मारता है।

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