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कचड़ा अगर सोना उगलने लगे तो•••

Bhola Tiwari Jul 15, 2019, 8:28 AM IST टॉप न्यूज़
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प्रवीण झा

(जाने-माने चिकित्सक नार्वे)

"हमने यह मशीन आपको सात साल पूर्व बेची थी। अब अगर वह प्रयोग में नहीं तो उसे वापस लेने का वक्त आ गया है। कृपया मशीन की वर्तमान स्थिति साझा करें।"

ऐसी चिट्ठी देख कुछ अजीब लगता है। 

अमूमन कोई उत्पादक जब कोई मशीन बेचता है, तो उसके बाद कुछ 'गारंटी-पीरियड' होता है और फिर ग्राहक-उत्पादक संवाद खत्म हो जाता है। मशीन की उम्र खत्म होने के बाद हम उसे फेंक देते हैं, या रद्दी में बेच देते हैं। किसी भी स्थिति में उत्पादक इसकी जिम्मेदारी नहीं लेता। यह कचड़े का रूप ले लेता है। 

'ईलेक्ट्रॉनिक कचड़ा' अब विश्व-संकट बन चुका है। यह बस कम्प्यूटर ही नहीं, फोन, टी.वी., वाशिंग-मशीन, स्वास्थ्य-उपकरण और तमाम विद्युत-इलैक्ट्रॉनिक यंत्र हैं, जो रोजमर्रा के जीवन में प्रयोग होते हैं। 

पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (ई.पी.ए.) के अनुसार अगर दस लाख मोबाइल-फोन को 'रिसाइकल' किया जाए तो तकरीबन 35000 पाउंड तांबा, 772 पाउंड चाँदी, 75 पाउंड सोना, और 33 पाउंड पैलेडियम निकलेगा। भारत के 28 लाख मोबाइल ग्राहक प्रति वर्ष के हिसाब से लगभग दस लाख डॉलर का सोना फेंक रहे हैं। 

पर प्रश्न यह है कि नॉर्वे कैसे दो दशकों से अपना 95 प्रतिशत ई-कचड़ा 'रिसाइकल' करता आ रहा है, जबकि बाकी विकसित देश भी इस समस्या से जूझ रहे हैं? 

नॉर्वे ने यह काम 1998-99 ई. में आए कानून से किया। इसके तहत उत्पादक पर जिम्मेदारी तय की गई, जिसे 'extended product responsibility (EPR)' कहते हैं। यानी जिसने भी यह सामान उत्पादन या वितरण किया, वो ही यह हिसाब रखेगा और कचड़े को उसके जीवन-काल के बाद वापस ले लेगा। मोटे तौर पर यह कठिन लगता है, पर यह नॉर्वे में सहज है। पिछले वर्ष ही लगभग 40 किलो प्रति व्यक्ति के हिसाब से दो लाख टन कचड़ा वापस लिया गया। 

इस बात को बिंदुवार समझना होगा। 

पहली बात कि यहाँ का हर उपकरण पंजीकृत है, अवैध या अपंजीकृत नहीं। यानी सरकार जानती है कि हमरा पास कुल कचड़ा कितना है।

दूसरी बात कि कंपनियाँ हर मशीन के औसत जीवन-काल का ब्यौरा रखती है और सरकार के पर्यावरण-मंत्रालय को देती है। यह कार्य कठिन नहीं। ब्यौरा उत्पादक के पास उपलब्ध ही होता है।

तीसरी बात कि कई 'टेक-बैक' कंपनियाँ इसका कार्यान्वयन करती हैं। यह उनकी जिम्मेदारी है कि पूरे नॉर्वे से कचड़ा लेकर 'रिसाइकल' करें। तो उत्पादक पर सीधी जिम्मेदारी नहीं बनती। वो बस सभी पंजीकृत उपकरणों का ब्यौरा इन अनुबंधित कंपनियों को दे देते हैं।

चौथी और सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी ग्राहक निभाता है। नॉर्वे में घरेलू कचड़ा निष्पादन भी दशकों से कुशल तरीके से किया जा रहा है। हर घर के बाहर एक धातु-कचड़ा पेटी अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त नगर-निगम के 'काउंटर' और बड़े दुकानों में यह सुविधा है कि आप अपना टी.वी.-मोबाइल इत्यादि जाकर फेंक सकें। औद्योगिक कंपनियाँ या बड़े ग्राहक सीधा 'टेक-बैक' कंपनी से अनुबंधित होते हैं, जो आकर कचड़ा ले जाती है। 

पाँचवी बात कि सरकार इन सब पर नियंत्रण रखती है, और जरूरी कानून संशोधन करती रहती है। सरकारी तंत्र ‘टेक-बैक’ कंपनियों की पड़ताल करता रहता है कि वह कार्य ठीक से कर रही है या नहीं। तकनीकी और आर्थिक सहयोग भी देती है। 

तो यह संभव है। दो दशकों से प्रायोगिक रूप से सिद्ध किया जा चुका है। जैसे-जैसे आधुनिकीकरण हो रहा है, कचड़ा बढ़ता जा रहा है और 'टेक-बैक' कंपनियाँ अच्छा मुनाफा कमा रही है। ओस्लो की 25 प्रतिशत घरेलू 'हीटिंग' कचड़ा जलाकर निकली ऊर्जा से की जाती है। इसके अतिरिक्त धातु को वापस 'रिसाइकल' कर बेच दिया जाता है। तो यह फायदेमंद सौदा है। 

जरूरी यह है कि देश में ‘ई-कचड़ा’ प्रबंधन कानून बने। उत्पादक कंपनियाँ सभी उत्पादों को पंजीकृत करे। यह राजस्व के लिए भी उपयोगी होगा, और कचड़ा निष्पादन के लिए भी। ‘टेक-बैक’ कंपनियाँ रोजगार भी देंगी, और कई ‘अंतरप्रेन्योर’ भी विकसित होंगें। ग्राहकों की जिम्मेदारी के लिए ग्राहकों को उत्पादक याद दिलाएँ, और उन्हें तमाम मीडिया माध्यमों से प्रशिक्षित भी किया जाए। यह ‘स्वच्छ भारत’ की परिकल्पना के लिए आवश्यक है। 

भारत में 'नमो ई-वेस्ट मैनेज़मेंट' नामक कंपनी अभी दस से ऊपर राज्यों में अपनी पहचान बना चुकी है। 2016-17 के दौरान इस कंपनी ने 4.4 करोड़ रूपए का धंधा किया, जो एक 'स्टार्ट-अप' की अच्छी आय कही जाएगी। 

तो यह पर्यावरण-संरक्षण ही नहीं, उपलब्ध संसाधनों से अच्छी पूँजी का स्रोत भी है। नॉर्वे तो छोटा देश है, भारत की जनसंख्या को देखते हुए यह नॉर्वे से सौगुणा अधिक पूँजी ला सकता है। जैसा पहले कह चुका हूँ, प्रति वर्ष दस लाख डॉलर का सोना। कचड़ा अगर सोना उगलने लगे तो क्या बात है!

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