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अमर्त्य सेन और राम नाम का अर्थशास्त्र

Bhola Tiwari Jul 14, 2019, 11:59 AM IST टॉप न्यूज़
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 मधुकर श्रीवास्तव

कोलकाता : शहर में युद्ध का ऐसा माहौल बना हुआ है। मैं देखता हूँ लोगों को बार में जाते, सिनेमा हॉल जाते, कैफ़े में बैठे उसके शीशे से शहर की गति को देखते हुए लोग। जीवन की गति भी डरे हुए, सहमे हुए से गुजर रही है। हर लोग इस क्षतिग्रस्त शहर को देख रहे है। मैं तो इस गुरिल्ला युद्ध की वजह से लगभग विक्षिप्त हो गया हूँ। सड़क पर किसी का शुक्रवार को कब्जा है तो किसी का मंगल और शनिवार को। अब ऐसे भी दिन आ गए हमारे शहर में।

मैं पिछले दस दिन से सोया नहीं हूँ, न ही ठीक से कुछ खा सका हूँ। क्या कहूं। अपने ही शहर में असुरक्षित हो गया हूं। सभी साग, सब्जी, दाल, रोटी, चावल ही खा रहे हैं, तो भी इतना भेदभाव। इतनी नफरत, की जान ले ले। साहब यह मोदी के मन की बात नहीं। यह तो ऐतिहासिक शहर कोलकाता में टैक्सी चला रहे हैं सुब्रतो दादा की दिल की बात है। 

दरअसल कोलकाता रेलवे स्टेशन उतरते ही बड़ा बाजार जाने के लिए टैक्सी पर बैठा। और आदतन जो हमारे लिए रिवाज की तरह है, मैं पूछ बैठा कि तुम्हारा नाम क्या है। कहां के रहने वाले हो और धंधा कैसा चल रहा है। बस इतना ही कहना था, हर एक प्रश्न का सिलसिलेवार जवाब। गाड़ी कब बड़ा बाजार पहुंची, पता ही नहीं चला। कब सुब्रतो दादा से आत्मा इतनी गहरी मेल खा गई, कुछ पता नहीं चला।

 दूसरे हालात के प्रवक्ता बने मालदा के बासु चटर्जी। शहर के हालात क्या पूछते हो पहले आप यह तो बताओ की आपने गोलियों की बौछार कभी देखी है? बमों और गोलियों की आवाज़ें कभी सुनी हैं? हमारे यहां ऐसा होता है। गोलियां चलती है। बम बरसते हैं। लोग आपस में ही लड़ते हैं। मरते हैं, फिर भी राजनीति का तमाशा देखो की कोई इस बात को बार-बार मुझे बता रहा है कि इस शहर में कोई बम-धमाका नहीं हो रहा, बल्कि यह सब मेरा मतिभ्रम है।  रोने के सिवा कुछ भी नहीं साहब। मैंने कभी अपने हाथ में किसी बम या गोली को लेकर नहीं देखा है, लेकिन मैंने गोली लगने की पीड़ा ज़रूर भोगी है। वह यूनिवर्सिटी के आख़िरी दिनों में से एक दिन था। मैं रोज़ की तरह लैबोरेटरी से निकलकर घर जा रहा था। फिर किसी शून्य में से निकलकर एक गोली मेरे कंधे पर लगी। मैं गिर गया। जब हॉस्पिटल में मेरे होश वापस आए तब तक मेरे उपचार के लिए मेरा घर, मेरी माँ के गहने और मेरा सब कुछ बिक चुका था, ऐसा इसलिए नहीं कि मुझे कोई बहुत घातक चोट लगी थी बल्कि इसलिए कि इन सबके अतिरिक्त मेरे पास कुछ और था भी नहीं। इन शब्दों के सहारे पश्चिम बंगाल के हालात को बहुत आसानी से समझा जा सकता है। 

  अफसोस पश्चिम बंगाल में अभी भी राजनीतिक रोटियां पक रही हैं। कौन सबक ले। किसको समझाएं। आगे जो देखने और सुनने में आया वह और ही भयावह है। शहर में कई स्थानों पर विख्यात अर्थशास्त्री नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन की तस्वीर के साथ कुछ चंद लाइनें लिखी हुई टंकी पड़ी है, जो गवाही देती है कि यह खेल अभी खत्म नहीं हुआ। खेल जारी रहेगा । और इस टंगे हुए होल्डिंग का खुलासा खुद दिग्गज अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन जादवपुर यूनिवर्सिटी में की।अमर्त्य ने कहा कि रामनवमी भी आजकल पश्चिम बंगाल में "लोकप्रिय हो रही है" और उन्होंने "इससे पहले कभी नहीं सुना था"। 

नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने शुक्रवार को कहा कि 'जय श्री राम' कभी भी पश्चिम बंगाल की संस्कृति का हिस्सा नहीं था और इसे "लोगों को पीटने के बहाने" के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। यह 'मां दुर्गा' हैं, जो बंगालियों के जीवन में सर्वव्यापी हैं, सेन ने यहां जादवपुर विश्वविद्यालय में एक कार्यक्रम में बोलते हुए कहा।

"जय श्री राम का नारा बंगाली संस्कृति से जुड़ा नहीं है," उन्होंने कहा कि आजकल भी राम नवमी "लोकप्रियता प्राप्त कर रही है" और उन्होंने "इसके पहले कभी नहीं सुना था"।

"मैंने अपने चार साल के पोते से पूछा कि तुम्हारा पसंदीदा देवता कौन है? उसने जवाब दिया कि यह माँ दुर्गा है। माँ दुर्गा हमारे जीवन में बहुत ही सर्वव्यापी है।

अर्थशास्त्री सेन ने कहा, "जो मुझे लगता है कि जय श्री राम के नारे लगाए जाते हैं, उन्हें लोगों को पीटने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।"

 गौरतलब है कि महान अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन की दुनिया में हैसियत है। भारत के लोग उन्हें बड़े ही सम्मानित नजरिए से देखते हैं। लेकिन विद्वत जनों का मानना है कि धर्म और संस्कृति के मामले में अमर्त्य सेन का ज्ञान अधूरा है। उन्हें और पढ़ने की जरूरत है।उन्हें बंगाली संस्कृति या भारतीय संस्कृति का ज्ञान नहीं है। भगवान राम इस चराचर जगत के कण कण में व्याप्त है। हिंदुस्तान ही क्या पूरे विश्व में उनकी पूजा होती है। हमारे यहां तो जन्म से मृत्यु तक राम नाम का ही माला है।

बंगाल में जो दुर्गा पूजा मनाया जाता है, उसको हम "अकाल बोधन" कहते हैं। मोटा-मोटी ट्रांसलेट करें तो इसका मतलब है दुर्गा मां को "अकाल" बुलाना या फिर ऐसे समय पर बुलाना जब उनकी पूजा स्वाभाविक तौर पर नहीं होती।

रामायण में कहानी है कि श्री राम जब रावण से लड़ने जा रहे थे, तब मां दुर्गा के आशीर्वाद के लिए वो तपस्या पर बैठे। ये तपस्या उन्होंने 'अश्विन' महीने में की थी जबकि दुर्गा पूजा 'बसंत' ऋतु में की जाती है। बंगाल में अभी जो दुर्गा पूजा हम इतने जोर-शोर से मनाते हैं, वो भी अश्विन महीने में ही होती है।

बंगाल में काफी तगड़ा वैष्णव असर भी है। राम और कृष्ण दोनों की पूजा विष्णु के एक रूप के तौर पर की जाती थी। 

मेदिनीपुर, नदिया, हावड़ा जैसी जगहों पर श्री राम के कुछ पीठ भी हैं और 15वीं सदी में रामायण का बांग्ला वर्जन ‘कृत्तिवासी रामायण’ लिखा गया था। बांग्ला साहित्य में भी राम का जिक्र कई जगहों पर होता है। 

 तोमार नाम, आमार नाम, वियतनाम से अब तोमार नाम, आमार नाम, जय श्री राम। इस एक लाइन में पश्चिम बंगाल की 6 दशक का सियासी इतिहास समझा जा सकता है। हाल फिलहाल में यहां सियासत में राम के नाम की अहमियत बढ़ गई है और इससे कई सवाल उठते हैं।

हां यह जरूर है की पॉलिटिकल पार्टियों के लिए यह मुद्दा बने की क्या जय श्री राम "बंगाल के स्वभाव" का हिस्सा है?

क्या यहां श्रीराम को BJP लेकर आई है ? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल, राम के नाम से ममता दीदी को इतना गुस्सा क्यों आता है? क्या बंगाल में राम पूजा का कोई ऐतिहासिक महत्व है? यह हो सकता है। 

  मगर ज्ञान की बात करने वाला, ज्ञान का व्यापार करने वाला भारत में सम्मानित चेहरा विख्यात अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन का विषय नहीं हो सकता। लिहाजा आम लोगों ने अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन की बात को एक सिरे से खारिज कर दिया लेकिन उनकी बातों ने बंगाल विभाजन की याद को ताजा कर दिया।

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